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नेसेट में बहुमत गंवाने के बाद नेतन्याहू ने अरब दलों पर मढ़ा धांधली का दोषमध्य पूर्व
30 अक्तू॰ 2026, 11:06 am (5 मिनट पहले)· 0

नेसेट में बहुमत गंवाने के बाद नेतन्याहू ने अरब दलों पर मढ़ा धांधली का दोष

इज़रायल के संसदीय चुनाव में बहुमत गंवाने के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी ने अरब दलों पर धांधली का दावा किया है। वहीं 19 सीटें जीतकर अरब पार्टियां अगली सरकार तय करने के लिए अहम धुरी बन चुकी हैं।

इज़रायल की राजनीति में आम चुनाव के अंतिम आंकड़े सामने आने के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों पर चुनाव में धांधली करने का दावा किया है, जिसमें कथित रूप से विदेशी ताकतों की मदद लेने की बात कही गई है। हालांकि इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए गए हैं। मतगणना के आंकड़ों के अनुसार, संसद में सत्ताधारी गठबंधन अपना जादुई आंकड़ा गंवा चुका है। इसके विपरीत, विपक्षी खेमे का कहना है कि अरब दलों के शानदार चुनावी प्रदर्शन से घबराकर नेतन्याहू पूरे अरब समुदाय को निशाना बना रहे हैं, ताकि चुनाव की निष्पक्षता और वैधता पर संदेह खड़ा किया जा सके। इस बदली हुई तस्वीर के बीच अरब गुट संसद में बेहद निर्णायक स्थिति में पहुंच गया है, जिससे नई सत्ता समीकरणों की संभावनाएं तलाशने की कवायद शुरू हो गई है।

नेसेट में सीटों का गणित और सत्ताधारी गुट का नुकसान

इज़रायल की 120 सीटों वाली संसद यानी नेसेट में सरकार गठन के लिए 61 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है। घोषित नतीजों में बेंजामिन नेतन्याहू के गुट को महज 53 सीटें ही हासिल हुई हैं। पिछली संसद में उनके गठबंधन के पास 68 सीटें थीं, जिसके मुकाबले यह नतीजा उनके लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित हुआ है। दूसरी तरफ, नेतन्याहू के मुख्य विपक्षी गुट ने 48 सीटों पर जीत दर्ज की है। इन दोनों बड़े खेमों के अलावा, अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने कुल 19 सीटों पर कब्जा जमाया है।

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देश में वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है, लेकिन आधिकारिक तौर पर नतीजों का प्रमाणीकरण होना अभी शेष है। कानूनी प्रक्रियाओं के तहत, आने वाले बुधवार को देश के राष्ट्रपति को चुनाव परिणाम औपचारिक रूप से सौंपे जाने हैं। इज़राइली कानून के मुताबिक नतीजों को प्रमाणित करने की अंतिम तारीख 4 नवंबर तय की गई है। इस समयसीमा से पहले राजनीतिक हलकों में तीखी बयानबाजी और शक्ति प्रदर्शन का दौर जारी है।

विदेशी हस्तक्षेप के दावे और चुनावी समिति की भूमिका

मतदान समाप्त होने के तुरंत बाद आए एग्जिट पोल्स में ही प्रधानमंत्री के गठबंधन को बड़ा झटका लगने के संकेत मिल गए थे। तभी से लिकुड पार्टी लगातार चुनावी नतीजों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही थी। यह राजनीतिक विवाद उस वक्त और बढ़ गया जब चुनाव समिति के प्रमुख और सुप्रीम कोर्ट के जज नोम सोहलबर्ग ने विदेशी हस्तक्षेप से जुड़े गंभीर संदेह सामने आने की बात कही।

जज नोम सोहलबर्ग ने आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट को एक औपचारिक पत्र भेजा। इस पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया कि वे निजी तौर पर इन दावों की सत्यता की पुष्टि नहीं कर सकते हैं। फिर भी, मामले की संवेदनशीलता और लगाए गए आरोपों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सुरक्षा एजेंसी को पूरे प्रकरण की गहन जांच करने का निर्देश दिया। चुनाव आयोग ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि जांच पूरी तरह खुफिया सूचनाओं पर आधारित है और लोगों को बिना आधार वाली अटकलों से दूर रहना चाहिए। आयोग ने यह भी साफ कर दिया कि इस जांच से राष्ट्रपति को सौंपे जाने वाले नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और न ही इसका निशाना किसी विशेष समुदाय को बनाना है।

कतर पर लगाए गए आरोप और राजनयिक तकरार

लिकुड पार्टी ने तीखे तेवर अपनाते हुए बयान जारी किया कि देश में चुनावी जनादेश की चोरी की गई है। पार्टी की ओर से यह दावा किया गया कि इस कथित दखलंदाजी का वास्तविक मकसद नेसेट पर बाहरी नियंत्रण स्थापित करना, इज़रायल का इस्लामीकरण करना और मौजूदा दक्षिणपंथी सरकार को सत्ता से बेदखल करना था। पार्टी के कई नेताओं ने सीधे तौर पर कतर पर साजिश रचने का आरोप लगाया। इज़रायल के भीतर कतर को गाज़ा में सक्रिय चरमपंथी संगठन हमास का समर्थक माना जाता है।

दूसरी ओर, कतर ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें बेतुका और बेहद खतरनाक करार दिया है। इस बीच, विपक्षी नेताओं ने इस पूरे मामले को लेकर नेतन्याहू पर तीखा तंज कसा है। मुख्य विपक्षी नेता और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट ने कहा कि लिकुड पार्टी सिर्फ इसलिए नतीजों की वैधता को कठघरे में खड़ा कर रही है क्योंकि वह चुनाव हार चुकी है। आइसेनकोट ने तंज कसते हुए टिप्पणी की कि वे इस बात का स्वागत करते हैं कि नेतन्याहू आखिरकार इज़रायल के आंतरिक मामलों में कतर के दखल की निंदा करने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि नेतन्याहू पर पहले से यह आरोप लगते रहे हैं कि उनके पूर्व करीबी सहयोगियों ने कतर से वित्तीय लाभ लिए थे।

अरब दलों की बढ़त और वोटरों की लामबंदी

इज़रायल की कुल आबादी में फिलिस्तीनी मूल के अरब नागरिक लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। गाज़ा और वेस्ट बैंक के अन्य फिलिस्तीनियों के प्रति सहानुभूति रखने के कारण इस वर्ग को अक्सर संदेह के दायरे में देखा जाता रहा है। मतदान से पूर्व चुनाव अभियान के दौरान नेतन्याहू और उनकी पार्टी ने लगातार अरब-नेतृत्व वाले दलों को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयानबाजी अरब नागरिकों को मुख्यधारा से दूर करने की एक सोची-समझी रणनीति थी।

कट्टर दक्षिणपंथी सरकार द्वारा समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिशों और लगातार हमलों से आहत होकर अरब मतदाता इस बार असाधारण उत्साह के साथ पोलिंग बूथों तक पहुंचे। भारी मतदान के दम पर अरब पार्टियों ने 19 सीटें जीतकर अब तक का सबसे मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया। नतीजों के बाद अरब-नेतृत्व वाली जॉइंट लिस्ट पार्टी ने पलटवार करते हुए कहा कि वास्तव में नेतन्याहू स्वयं चुनाव चुराने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं, अरब-नेतृत्व वाली राअम पार्टी के मुखिया मंसूर अब्बास ने हस्तक्षेप की किसी भी जांच का स्वागत किया और साफ किया कि उनकी पार्टी का ऐसे मामलों से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री जानबूझकर जनता को भड़काने की मुहिम चला रहे हैं।

राष्ट्रपति का संदेश और गठबंधन की कठिन राह

इस गंभीर संवैधानिक मोड़ पर राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने वर्तमान हालात को एक बेहद संवेदनशील क्षण बताया और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की पैरवी की। उन्होंने सार्वजनिक रूप से आगाह किया कि जिस पूरे समुदाय ने अपने लोकतांत्रिक मताधिकार का प्रयोग कर व्यवस्था में हिस्सेदारी निभाई है, उसे किसी भी सूरत में बदनाम नहीं किया जाना चाहिए।

अब सबसे बड़ा पेच नई सरकार के गठन को लेकर फंसा हुआ है। नेतन्याहू का धार्मिक और राष्ट्रवादी सहयोगियों वाला गठबंधन 53 सीटों पर सिमट गया है, जबकि उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष विरोधी दल 48 सीटों पर हैं। दोनों ही खेमे 61 के जादुई आंकड़े से दूर हैं। ऐसे में 19 सीटों वाला अरब गुट किंगमेकर बन गया है। यदि विपक्षी दल अरब दलों से हाथ मिलाते हैं, तो वे संसद में स्पष्ट बहुमत हासिल कर सकते हैं। हालांकि इज़राइली राजनीति के इतिहास में यह एक दुर्लभ और बेहद जोखिम भरा कदम माना जाएगा, विशेषकर ऐसे समय में जब गाज़ा और वेस्ट बैंक पर सेना के सैन्य अभियान जारी हैं।

संसदीय रणनीति और कानूनी जवाबदेही का डर

गादी आइसेनकोट ने संकेत दिए हैं कि वे कुछ तय शर्तों के आधार पर अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ मिलकर आगे बढ़ने को तैयार हैं। अरब-नेतृत्व वाली संयुक्त सूची के प्रमुख नेता अहमद तिबी ने पुष्टि की है कि विपक्षी खेमे ने नेसेट के नए अध्यक्ष के चुनाव को लेकर उनसे संपर्क साधा था और उनकी पार्टी विपक्षी उम्मीदवार का समर्थन करने के लिए सहमत है। इस बीच, तेल अवीव और यरुशलम के कई इलाकों में अरब दलों को शामिल करते हुए नई सरकार बनाने के समर्थन में जन रैलियां भी देखने को मिली हैं।

यदि औपचारिक गठबंधन नहीं भी बनता है, तब भी अरब दल संसद में नेतन्याहू विरोधी ताकतों का समर्थन कर विधायी एजेंडे पर नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं। वे नया स्पीकर चुन सकते हैं और नई सरकार बनने से पहले अहम कानून पारित करवा सकते हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नेतन्याहू चुनाव प्रक्रिया को विवादित बनाकर विपक्ष और अरब दलों के बीच तालमेल को देशद्रोह का रंग देना चाहते हैं। यदि नेतन्याहू सत्ता से बाहर होते हैं, तो उनके खिलाफ वर्षों से लंबित भ्रष्टाचार के मामलों में कानूनी शिकंजा कस सकता है। साथ ही, 7 अक्टूबर 2023 को हमास के घातक हमले के समय हुई गंभीर सुरक्षा चूकों की विस्तृत जांच का रास्ता भी खुल जाएगा।

पुनर्मतदान का संकट

यदि विभिन्न दलों के बीच सरकार बनाने को लेकर कोई सहमति नहीं बन पाती है, तो देश को अगले साल की शुरुआत में फिर से नए आम चुनावों का सामना करना पड़ सकता है। राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग और विपक्षी नेता गादी आइसेनकोट दोनों ने संकेत दिए हैं कि वे देश को दोबारा चुनाव में धकेलने से बचना चाहते हैं।

यदि दोबारा चुनाव होते हैं, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अरब नागरिक इसी तरह भारी संख्या में बाहर निकलेंगे और क्या मतदान के लिए विदेश से वतन लौटे वे तमाम इज़राइली दोबारा मतदान करने आएंगे, जिन्होंने नेतन्याहू को हटाने के संकल्प के साथ अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। फिलहाल पूरे देश की निगाहें 4 नवंबर की समयसीमा और राष्ट्रपति के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

सवाल-जवाब

इज़रायल के चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू के गुट को कितनी सीटें मिली हैं?
120 सदस्यों वाली संसद में नेतन्याहू के गुट को 53 सीटें मिली हैं, जो पिछली बार की 68 सीटों से काफी कम हैं।
चुनाव में सरकार बनाने के लिए कितनी सीटों की आवश्यकता होती है?
इज़रायल की संसद नेसेट में बहुमत वाली सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों के समर्थन की जरूरत होती है।
अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने चुनाव में कितनी सीटें जीती हैं?
अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए कुल 19 सीटों पर जीत हासिल की है।
नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने चुनाव को लेकर क्या आरोप लगाए हैं?
लिकुड पार्टी ने बिना साक्ष्य के आरोप लगाया है कि अरब दलों ने विदेशी मदद, विशेषकर कतर के सहयोग से चुनाव में धांधली की है।
कतर ने इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
कतर ने नेतन्याहू की पार्टी के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें बेतुका और खतरनाक करार दिया है।
मुख्य विपक्षी नेता गादी आइसेनकोट ने इन दावों पर क्या कहा?
गादी आइसेनकोट ने कहा कि लिकुड पार्टी चुनाव हारने की वजह से नतीजों की वैधता पर बेबुनियाद सवाल खड़े कर रही है।
इज़रायल में चुनाव नतीजे प्रमाणित करने की समयसीमा क्या है?
इज़राइली कानून के तहत 4 नवंबर तक चुनाव नतीजों का प्रमाणित होना आवश्यक है।
यदि कोई भी दल बहुमत साबित नहीं कर पाया तो क्या होगा?
यदि सरकार बनाने के सारे प्रयास विफल हो जाते हैं, तो इज़रायल को अगले साल की शुरुआत में दोबारा आम चुनाव का सामना करना पड़ेगा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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