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तलाक के बाद के संबंधों से खत्म नहीं होती पुरानी क्रूरता, कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसलाभारत
24 अग॰ 2026, 9:03 pm (1 घंटे पहले)· 3

तलाक के बाद के संबंधों से खत्म नहीं होती पुरानी क्रूरता, कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक तलाक के मामले में स्पष्ट किया है कि अलग रहने के दौरान पति-पत्नी के बीच कभी-कभार बने शारीरिक संबंध पहले की गई वैवाहिक क्रूरता को माफ किए जाने का प्रमाण नहीं बनते हैं।

कोलकाता में वैवाहिक विवादों से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट टिप्पणी की है। अदालत ने सुनवाई के दौरान यह साफ कर दिया है कि यदि पति-पत्नी अलग रह रहे हैं और इस दौरान उनके बीच छिटपुट रूप से या कभी-कभार पति-पत्नी जैसे संबंध बन भी जाते हैं, तो इसे इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि पूर्व में की गई मानसिक या वैवाहिक क्रूरता को माफ कर दिया गया है।

मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक का फैसला बरकरार

न्यायालय में यह मामला जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की संयुक्त पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया था। पीठ ने निचली यानी फैमिली कोर्ट द्वारा मानसिक क्रूरता के आधार पर पति के पक्ष में सुनाए गए तलाक के फैसले को पूरी तरह से वैध ठहराते हुए बरकरार रखा है। इस कानूनी लड़ाई के केंद्र में वह जोड़ा है जिन्होंने 18 जून 2009 को स्पेशल मैरिज एक्ट के अंतर्गत वैवाहिक जीवन में प्रवेश किया था। उनके घर अप्रैल 2013 में एक संतान का जन्म हुआ, किंतु इसके तुरंत बाद दोनों के बीच आपसी मतभेद इस हद तक बढ़ गए कि वर्ष 2014 से दोनों ने अलग रहना शुरू कर दिया था।

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पति के आरोप और फैमिली कोर्ट का रुख

अलग होने के बाद पति ने पारिवारिक न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी। पति की मुख्य दलील यह थी कि उसकी पत्नी ने उस पर और उसके पूरे परिवार पर कई प्रकार के गंभीर और निराधार आरोप लगाए हैं, साथ ही उनके विरुद्ध आपराधिक शिकायतें भी दर्ज कराई गई हैं। पति का यह भी कहना था कि पत्नी लगातार इस बात का दबाव बना रही थी कि वह अपनी विधवा मां से अलग हो जाए, जबकि वह बुजुर्ग मां पूरी तरह से उसी बेटे पर आश्रित थीं। इन सभी बिंदुओं पर विचार करने के बाद फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2021 में पति को मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक मंजूर कर लिया था।

पत्नी की दलील और अदालत की असहमति

फैमिली कोर्ट के इस आदेश से असंतुष्ट होकर पत्नी ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पत्नी के कानूनी पक्ष ने यह तर्क दिया कि अलग रहने की अवधि के दौरान भी वह कई बार अपने पति के आवास पर गई थी और वहां लगातार सात से आठ दिनों तक एक दंपती के रूप में साथ रही थी। उसका कहना था कि यदि पति को उसकी पूर्ववर्ती आदतों या हरकतों से इतनी ही तकलीफ थी, तो फिर उनके बीच इस प्रकार के शारीरिक और पारिवारिक संबंध दोबारा कैसे कायम होते। इसलिए, इस मेल-मिलाप को क्रूरता की माफी के रूप में देखा जाना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।

अदालत की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा कि अलग रहने के दौर में कभी-कभार साथ रहना या शारीरिक संबंध बनना स्वतः ही इस बात का संकेत नहीं देता कि पुरानी क्रूरता को क्षमा कर दिया गया है। अदालत के अनुसार, क्षमा या माफी तभी प्रभावी मानी जा सकती है जब क्रूरता करने वाला पक्ष भविष्य में उस आचरण को पूरी तरह छोड़ दे। केवल कुछ समय के लिए आपसी रिश्तों का सामान्य हो जाना अतीत की गंभीर घटनाओं या मानसिक प्रताड़ना को स्वतः समाप्त नहीं कर देता।

गंभीर आरोपों और सास से जुड़ा विवाद

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि पत्नी की ओर से पति और उसके परिजनों के विरुद्ध दहेज मांगने, पारिवारिक संपत्तियों के दुरुपयोग, जबरन गर्भपात कराने और सास द्वारा बच्चे के साथ दुर्व्यवहार करने जैसे अत्यंत गंभीर आरोप लगाए गए थे। अदालत ने माना कि बिना किसी ठोस या पर्याप्त साक्ष्य के इस स्तर के आरोप लगाना, जो किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और चरित्र पर आघात करते हैं, स्पष्ट रूप से मानसिक क्रूरता के दायरे में आते हैं। इसके अलावा, सास से अलग रहने की मांग पर अदालत ने टिप्पणी की कि हालांकि आज के समय में यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि पत्नी केवल परिवार की सेवा करे, लेकिन आधुनिक सोच का यह अर्थ भी नहीं निकाला जा सकता कि किसी पति को अपनी आश्रित मां का साथ छोड़ने के लिए विवश किया जाए। जहां तक सास द्वारा बच्चे के दुर्व्यवहार का प्रश्न है, अदालत को उसके समर्थन में कोई पुख्ता दस्तावेज, गवाह या उस समय की शिकायत नहीं मिली।

राहत और गुजारा-भत्ता का अधिकार

समस्त कानूनी पहलुओं और दलीलों का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय को सही ठहराया और पत्नी की अपील को नामंजूर कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी के पास कानून के प्रावधानों के तहत स्थायी गुजारा-भत्ता यानी एलिमनी प्राप्त करने के लिए आवेदन करने का अधिकार सुरक्षित है और वह इसके लिए स्वतंत्र है।

सवाल-जवाब

कलकत्ता हाईकोर्ट ने तलाक के मामले में क्या मुख्य टिप्पणी की?
कोर्ट ने कहा कि अलग रहने के दौरान कभी-कभार साथ रहने या संबंध बनने से पहले की गई वैवाहिक क्रूरता माफ नहीं हो जाती।
इस मामले में किस आधार पर तलाक दिया गया था?
फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने मानसिक क्रूरता के आधार पर पति को तलाक दिए जाने के फैसले को सही ठहराया।
पत्नी ने हाईकोर्ट में क्या दलील दी थी?
पत्नी का तर्क था कि अलग रहने के बाद भी वह कई दिनों तक पति के साथ रही थी, जिसे क्रूरता की माफी माना जाना चाहिए।
क्या पत्नी को गुजारा-भत्ता पाने का अधिकार है?
हां, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी कानून के तहत स्थायी गुजारा-भत्ता मांगने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·29 मिनट पहले

कलकत्ता उच्च न्यायालय का यह फैसला वैवाहिक न्यायशास्त्र में मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि भावनात्मक प्रताड़ना और क्रूरता के मामले में केवल अस्थायी शारीरिक संबंध या मेल-मिलाप को माफ़ी नहीं माना जा सकता। इससे पारिवारिक अदालतों में लंबित मामलों में कानूनी स्पष्टता आएगी और पीड़ितों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ेगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·29 मिनट पहले

यह न्यायिक दृष्टिकोण पारिवारिक कानून में जटिल मनोवैज्ञानिक और सामाजिक वास्तविकताओं को गहराई से समझता है। अक्सर अलगाव के दौरान मजबूरी या सुलझने की उम्मीद में बने अस्थायी संबंध कानूनी दांवपेंच का हथियार बन जाते हैं। इस फैसले से उन पति-पीडि़तों को बड़ी राहत मिलेगी जिन्हें केवल भावनात्मक मेल-मिलाप के आधार पर झूठी उम्मीदों में फंसाकर न्याय से दूर रखा जाता था। इससे भविष्य के मुकदमों में स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देश तय होंगे।

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