रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी आराम से कटे, इसके लिए एक मोटा फंड हर नौकरीपेशा इंसान चाहता है. ज्यादातर लोग यही सोचकर पीछे हट जाते हैं कि इतना बड़ा फंड बनाने के लिए हर महीने भारी रकम लगानी पड़ेगी. हकीकत इसके उलट है. अगर आप नियम और अनुशासन के साथ हर महीने एक छोटी रकम भी जोड़ते रहें, तो कंपाउंडिंग यानी ब्याज पर ब्याज की ताकत से लाखों का फंड खड़ा हो सकता है. कर्मचारी भविष्य निधि यानी EPF इसकी सबसे साफ मिसाल है, जहां हर महीने सिर्फ 1,800 रुपये की बचत 25 साल में करीब 19 लाख रुपये का फंड बना देती है.
नौकरीपेशा लोगों के लिए EPF एक सुरक्षित जरिया है, जो गारंटीड रिटर्न देता है. सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए EPF जमा पर 8.25 फीसदी ब्याज दर को मंजूरी दी है. ब्याज की यह रकम इसी महीने सब्सक्राइबर्स के खातों में जमा हो सकती है.
1,800 रुपये महीना, 25 साल और 19 लाख का हिसाब
मान लीजिए कोई कर्मचारी अपने पीएफ खाते में हर महीने सिर्फ 1,800 रुपये डालता है और बिना किसी रुकावट के पूरे 25 साल तक यह सिलसिला जारी रखता है. ऐसे में आंकड़े कुछ इस तरह बनते हैं:
- 25 साल में कुल जमा रकम: 5,40,000 रुपये
- 25 साल बाद तैयार फंड: करीब 19 लाख रुपये (मौजूदा ब्याज दर के हिसाब से)
यानी आपकी जेब से कुल मिलाकर सिर्फ 5.4 लाख रुपये गए, लेकिन ब्याज के रूप में आपको लगाई गई रकम से दोगुने से भी ज्यादा का फायदा मिल गया.
जल्दी शुरुआत ही असली ताकत है
EPF का सबसे बड़ा फायदा उन्हें मिलता है जो नौकरी की शुरुआत में ही, कम उम्र से निवेश करना शुरू कर देते हैं. शुरू के सालों में हर साल मिलने वाला ब्याज भले ही मामूली लगे, लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते हैं और खाते का बैलेंस बढ़ता है, ब्याज पर मिलने वाला ब्याज तेजी से रफ्तार पकड़ लेता है. जो लोग बीच में पीएफ का पैसा निकाले बिना सालों तक टिके रहते हैं, उनका फंड कहीं ज्यादा बड़ा हो जाता है. आगे चलकर सैलरी बढ़ने पर अगर आप पीएफ में अपना योगदान भी बढ़ा दें, तो यही फंड और भी मोटा हो सकता है.
क्या पीएफ के ब्याज पर भी टैक्स लगता है
बजट 2021 के नियमों के मुताबिक, अगर कोई कर्मचारी एक वित्त वर्ष में अपने पीएफ खाते में 2.5 लाख रुपये से ज्यादा जमा करता है, तो 2.5 लाख रुपये से ऊपर की रकम पर मिलने वाले ब्याज पर टैक्स चुकाना पड़ता है. इस सीमा में कर्मचारी का वॉलेंटरी प्रोविडेंट फंड यानी VPF भी गिना जाता है. लेकिन जो लोग हर महीने सिर्फ 1,800 रुपये या इससे भी कम का योगदान दे रहे हैं, उन्हें इस टैक्स की कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनका सालाना निवेश 2.5 लाख रुपये की सीमा से बहुत नीचे रहता है.













