अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार एक बार फिर गंभीर अनिश्चितता के दौर में घिर गया है, जहां पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक उथल-पुथल ने वैश्विक आपूर्ति तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष के चलते दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन मार्गों में से एक पर जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। यद्यपि अर्थशास्त्री अभी तत्काल पूर्ण वैश्विक मंदी की आशंका नहीं जता रहे हैं, लेकिन कच्चे तेल के तेजी से चढ़ते दाम दुनिया भर के नीति निर्माताओं और केंद्रीय बैंकों के लिए सिरदर्द बन चुके हैं। तेल की बढ़ती कीमतों से पैदा होने वाला मुद्रास्फीति का दबाव लंबे समय तक उच्च ब्याज दरों को बनाए रखने के लिए मजबूर कर सकता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी होने का जोखिम बढ़ गया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में गहराता संकट और समुद्री यातायात का ठहराव
वर्तमान ऊर्जा संकट के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य स्थित है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला एक संकरा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस ताजा सैन्य संघर्ष के भड़कने से पहले, इस जलमार्ग से प्रतिदिन लगभग 20.9 मिलियन बैरल कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का परिवहन होता था, जो पूरे विश्व की कुल पेट्रोलियम खपत के लगभग पांचवें हिस्से के बराबर था। इस मार्ग से गुजरने वाले कच्चे तेल और कंडेनसेट का लगभग 89 प्रतिशत हिस्सा सीधे एशियाई बाजारों की ओर जाता है, जिसके कारण एशियाई अर्थव्यवस्थाएं इस व्यवधान की सबसे सीधी शिकार बन रही हैं।
समुद्री परिवहन से जुड़े हालिया आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि इस रास्ते पर वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही कितनी नाटकीय रूप से थम चुकी है। 21 सितंबर को होर्मुज जलमार्ग से केवल दो कमोडिटी जहाजों ने पारगमन किया, जबकि इससे ठीक एक दिन पहले 10 जहाज यहां से गुजरे थे। फरवरी में संघर्ष के तेज होने से पहले की स्थिति से तुलना की जाए, तो उस समय इस मार्ग से दैनिक आधार पर लगभग 125 बड़े वाणिज्यिक जहाज निर्बाध रूप से गुजरते थे। इस भारी कमी की भरपाई किसी अन्य वैकल्पिक मार्ग से पूरी तरह संभव नहीं है। यद्यपि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास जलडमरूमध्य को बाईपास करने वाली कुछ पाइपलाइनें मौजूद हैं, लेकिन उनकी संयुक्त परिचालन क्षमता इस विशाल समुद्री प्रवाह की तुलना में बेहद सीमित है।
भारत पर सीधा असर और 74.8 अरब डॉलर का आयात बिल
ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भारत दुनिया की सबसे संवेदनशील और असुरक्षित बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकताओं का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करके पूरा करता है। चालू वित्त वर्ष 2026 में अप्रैल से अगस्त के पांच महीनों के दौरान ही भारत का कच्चा तेल आयात बिल सालाना आधार पर 48.4 प्रतिशत की भारी वृद्धि के साथ 74.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया। चौंकाने वाली बात यह है कि इस अवधि के दौरान आयात की कुल मात्रा में 0.4 प्रतिशत की मामूली गिरावट आई और यह 100.7 मिलियन मीट्रिक टन रही, जिसका अर्थ यह है कि आयात बिल में हुआ यह भारी उछाल पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की ऊंची कीमतों का परिणाम है।
भारत के नीति निर्माताओं के सामने अब एक कठिन नीतिगत संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी हो गई है। सरकार को आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की मार से बचाने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन साधना होगा। जब अंतरराष्ट्रीय लागत की तुलना में घरेलू खुदरा कीमतों को स्थिर रखा जाता है, तो तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बनने लगता है। इसके साथ ही, यदि ईंधन की बढ़ती लागत का असर व्यापक अर्थव्यवस्था में फैलता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक को मौद्रिक नीति में ब्याज दरों को लेकर सख्त और कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं।
रेटिंग एजेंसियों का भारत पर भरोसा और विकास की संभावनाएं
तेल के इस गंभीर झटके के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती पर अपना भरोसा बनाए रखा है। एसएंडपी, फिच और मूडीज ने अपनी ताजा रिपोर्टों में वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर के अनुमानों में बढ़ोतरी की है। इन प्रमुख वैश्विक संस्थाओं का मानना है कि भारत आने वाले वर्ष में भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। हालांकि, मुद्रास्फीति के दबाव के कारण मौद्रिक सख्ती को विकास के लिए मुख्य जोखिम माना जा रहा है, जिस पर विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनौती से स्थिति सामने आने पर ही निपटा जाएगा। घरेलू स्तर पर शुरू हो रहा त्योहारी सीजन व्यावसायिक गतिविधियों और उपभोक्ता मांग को मजबूत सहारा देने की उम्मीद जगाता है।
परिवहन लागत, माल ढुलाई और व्यापक अर्थव्यवस्था पर दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरी उत्पादन श्रृंखला पर पड़ता है। तेल परिवहन, औद्योगिक विनिर्माण, विमानन और पेट्रोकेमिकल उद्योगों के लिए प्राथमिक कच्चा माल है। जब कच्चे तेल के दाम चढ़ते हैं, तो आपूर्ति श्रृंखलाएं बढ़ी हुई लागत को आगे उपभोक्ताओं की ओर बढ़ा देती हैं, जिससे रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ जाते हैं। भारत और अन्य विकासशील देशों में डीजल सड़क माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स की जीवन रेखा है। यदि डीजल की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है, तो खाद्य पदार्थों, सब्जियों और आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की ढुलाई लागत बढ़ना तय है, जो सीधे खुदरा महंगाई को भड़काएगा।
ऊर्जा आपूर्ति के अलावा, समुद्री मार्ग में रुकावट आने से माल ढुलाई के भाड़े में बेतहाशा बढ़ोतरी होती है, जिससे देशों का व्यापार घाटा चौड़ा हो जाता है और विदेशी मुद्रा बाजार में राष्ट्रीय मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है। जहाजों के लंबे और वैकल्पिक रास्तों से जाने के कारण आपूर्ति में देरी होती है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की जटिलताएं और अधिक बढ़ जाती हैं। ऊर्जा लागत से शुरू होने वाला यह दबाव धीरे-धीरे दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में सामान्य मुद्रास्फीति के आंकड़ों को ऊपर की ओर धकेल रहा है।
चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे प्रमुख एशियाई देशों की स्थिति
एशिया के अन्य बड़े आयातक देश भी इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। चीन अपनी कुल कच्चे तेल की आपूर्ति के एक-तिहाई से अधिक हिस्से के लिए सामान्यतः होर्मुज मार्ग पर निर्भर करता है। यद्यपि चीन के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार हैं और उसके पास कई अन्य देशों से तेल खरीदने का व्यापक आपूर्ति नेटवर्क है जो एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है, फिर भी ऊर्जा और परिवहन के ऊंचे दाम उसके विशाल औद्योगिक कारखानों की उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकते हैं। यह स्थिति पूरे एशिया में निर्यात, औद्योगिक उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर असर डालेगी।
दूसरी ओर, जापान लगभग पूरी तरह से आयातित ऊर्जा पर निर्भर है, जिससे उसके पास तेल और प्राकृतिक गैस के उछलते दामों से बचने के साधन बेहद सीमित हैं। ईंधन की ऊंची कीमतें वहां के घरेलू उपभोक्ताओं, बिजली बिलों और विनिर्माण कारखानों को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही हैं। जापान की एयरलाइंस और परिवहन कंपनियां भी भारी परिचालन लागत का सामना कर रही हैं। दक्षिण कोरिया भी आयातित ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भर होने के कारण इसी प्रकार के गंभीर आर्थिक जोखिमों से जूझ रहा है। चूंकि होर्मुज से निकलने वाले अधिकांश तेल की दिशा एशियाई देशों की तरफ है, इसलिए इस तात्कालिक झटके का सबसे बड़ा बोझ एशिया ही उठा रहा है।
यूरोप और अमेरिका के बाजारों में बढ़ती लागत का प्रभाव
पश्चिमी गोलार्ध में भी इस व्यवधान के असर साफ देखे जा सकते हैं। यूरोप ऊर्जा और परिवहन की बढ़ती लागत से जूझ रहा है। विशेष रूप से जर्मनी का विशाल औद्योगिक ढांचा भारी मात्रा में ऊर्जा की खपत करता है, जहां तेल और गैस का महंगा होना कारखानों और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के मुनाफे पर भारी पड़ रहा है। यूनाइटेड किंगडम भी महंगे ईंधन और घरेलू ऊर्जा बिलों के जरिए इसी प्रकार के आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है। यूरोपीय कंपनियों के लिए जहाजों का चक्कर लगाकर आना अतिरिक्त माल ढुलाई लागत और डिलीवरी में देरी की नई बाधाएं पैदा कर रहा है।
इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थिति ऊर्जा आयात के मामले में काफी अलग है क्योंकि वह स्वयं तेल और गैस का एक बहुत बड़ा उत्पादक देश है। वर्ष 2025 की पहली छमाही में, अमेरिकी कच्चे तेल और कंडेनसेट आयात का केवल 7 प्रतिशत हिस्सा यानी लगभग 0.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन फारस की खाड़ी के मार्गों से आया था। इस कम प्रत्यक्ष निर्भरता के बावजूद, अमेरिकी घरेलू उपभोक्ता अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों से पूरी तरह अछूते नहीं रह सकते। 21 सितंबर को अमेरिका में नियमित पेट्रोल की औसत कीमत लगभग 4.47 से 4.48 डॉलर प्रति गैलन दर्ज की गई।
समग्र रूप से देखा जाए तो दुनिया भर में आर्थिक विकास और मुद्रास्फीति एक-दूसरे के विपरीत दिशा में खिंच रहे हैं। यद्यपि वैश्विक मंदी अभी आम सहमति वाला परिदृश्य नहीं है, लेकिन ऊर्जा की ऊंची कीमतें नीति निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। केवल पांच महीनों में भारत का करीब 75 अरब डॉलर का भारी-भरकम आयात बिल इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बाहरी झटके अर्थव्यवस्था पर कितना भारी दबाव डालते हैं। आने वाले महीनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि यह सैन्य संघर्ष कितने समय तक खिंचता है और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार कितनी जल्दी स्थिरता हासिल करते हैं।



















