कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) अपने सामाजिक सुरक्षा दायरे का विस्तार करने की तैयारी कर रहा है, जिससे निजी क्षेत्र में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों को सीधे फायदा होगा। प्रस्तावित नए सेवानिवृत्ति बचत ढांचे के तहत अनिवार्य ईपीएफ (EPF) कवरेज के लिए मासिक मूल वेतन सीमा को वर्तमान 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये करने की योजना है। इस कदम से मध्यम आय वर्ग के नौकरीपेशा लोगों का एक बड़ा हिस्सा अनिवार्य रूप से पेंशन और भविष्य निधि बचत योजना से जुड़ जाएगा, जिससे उनके भविष्य की वित्तीय सुरक्षा अधिक मजबूत होगी।
वित्त मंत्रालय की मंजूरी और कैबिनेट के अंतिम फैसले का इंतजार
वेतन सीमा बढ़ाने का यह अहम प्रस्ताव वित्त मंत्रालय से मंजूर हो चुका है और अब अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के पास लंबित है। इससे पहले नीति निर्माताओं के बीच वेतन सीमा को लेकर कई स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। शुरुआती चर्चाओं में इस सीमा को और अधिक बढ़ाते हुए 30,000 रुपये प्रति माह तक करने का विकल्प भी देखा गया था। हालांकि वित्तीय प्रभाव और नियोक्ताओं पर पड़ने वाले बोझ का सही आकलन करने के बाद अंततः 25,000 रुपये की सीमा तय करने पर सहमति बनी।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश और चार महीने की समयसीमा
वेतन सीमा में इस बड़े बदलाव की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से गति मिली है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन दोनों को आदेश दिया था कि वे चार महीने की समयसीमा के भीतर वेतन सीमा संशोधन पर अंतिम फैसला लें। इस न्यायिक हस्तक्षेप का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा अधिकारों से जुड़े इस फैसले में बेवजह की देरी न हो और निजी क्षेत्र की कंपनियों तथा कर्मचारियों को स्पष्टता मिल सके।
भविष्य निधि वेतन सीमा का ऐतिहासिक इतिहास
पिछले ढाई दशकों के इतिहास पर नजर डालें तो ईपीएफ के तहत अनिवार्य वेतन सीमा में संशोधन बहुत कम देखने को मिले हैं। लगभग 25 वर्षों के लंबे अंतराल में इस सीमा में केवल दो बार ही बदलाव किया गया है। कई वर्षों तक यह सीमा महज 6,500 रुपये प्रति माह पर स्थिर बनी रही थी। इसके बाद सितंबर 2014 में सरकार ने इसे बढ़ाकर 15,000 रुपये प्रति माह किया था। यदि अब इसे बढ़ाकर 25,000 रुपये किया जाता है, तो यह पिछले दो दशकों से अधिक समय में तीसरा बड़ा संशोधन होगा, जो बदलते आर्थिक माहौल और बढ़ते वेतन स्तर को दर्शाता है।
अनिवार्य ईपीएफ और ईपीएस कवरेज का गणित
मौजूदा नियमों के अनुसार, जब कोई कर्मचारी किसी संस्था में शामिल होता है और उसका शुरुआती मूल वेतन 15,000 रुपये या उससे कम होता है, तो उसके लिए ईपीएफ और उससे जुड़ी कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) में शामिल होना अनिवार्य होता है। जिन कर्मचारियों का मूल वेतन इस सीमा से अधिक होता है, वे अनिवार्य कवरेज से बाहर रहते हैं, हालांकि कुछ कंपनियां अपनी इच्छा से उन्हें भी यह सुविधा देती हैं। नई सीमा लागू होने के बाद 15,000 रुपये से 25,000 रुपये के बीच मूल वेतन पाने वाले कर्मचारियों का ईपीएफ और ईपीएस में योगदान ऐच्छिक के बजाय पूरी तरह अनिवार्य हो जाएगा।
कर्मचारियों और कंपनियों पर इस फैसले का प्रभाव
इस संशोधन से उन कर्मचारियों को सीधा लाभ मिलेगा जिनका मूल वेतन 15,000 रुपये से 25,000 रुपये के बीच है। अनिवार्य कवरेज लागू होते ही नियोक्ताओं को इन कर्मचारियों के ईपीएफ खाते में नियमानुसार बराबरी का योगदान देना होगा। इसके अतिरिक्त नियोक्ता के योगदान का एक हिस्सा सीधे कर्मचारी पेंशन योजना में जमा होगा, जिससे कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद पक्की मासिक पेंशन का लाभ मिलेगा। ईपीएफओ अपनी प्रणालियों को इस नए नियम के अनुकूल ढालने के लिए तैयार कर रहा है ताकि कैबिनेट की मंजूरी मिलते ही इसे सुचारू रूप से लागू किया जा सके।



















