सरकारी नौकरी करने वाले कर्मचारियों के लिए पिछले करीब 20 साल से सबसे बड़ी चिंता की वजह पेंशन ही रही है। 2004 में जब पुरानी पेंशन व्यवस्था खत्म की गई, उसी दिन से यह बहस शुरू हो गई थी कि रिटायरमेंट के बाद कर्मचारियों को सुरक्षित भविष्य कैसे मिलेगा। इसके बाद सरकार ने नेशनल पेंशन सिस्टम यानी एनपीएस लाया, लेकिन बाजार से जुड़ी होने और गारंटी न होने की वजह से कर्मचारियों ने इसका खुलकर विरोध किया। फिर यूनिफाइड पेंशन स्कीम यानी यूपीएस को उतारा गया, मगर गारंटीड पेंशन होने के बावजूद यह भी कर्मचारियों के गले नहीं उतरी। आज भी बड़ी संख्या में कर्मचारी पुरानी पेंशन स्कीम यानी ओपीएस की वापसी की मांग कर रहे हैं। तीन अलग अलग पेंशन योजनाएं होने से आम कर्मचारी के लिए यह तय करना मुश्किल हो गया है कि आखिर कौन सी स्कीम उसके हित में ज्यादा बेहतर है। यहां तीनों योजनाओं की खासियत और खामियां विस्तार से समझी जा सकती हैं।
पुरानी पेंशन स्कीम में गारंटी ही सबसे बड़ी ताकत
2004 से पहले तक देश के सभी सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आते थे। इसमें कर्मचारियों का अंशदान बेहद मामूली होता था, जिसे गवर्नमेंट पेंशन फंड यानी जीपीएफ कहा जाता था। खास बात यह थी कि कर्मचारी जरूरत पड़ने पर समय समय पर अपने जीपीएफ खाते से पैसा निकाल भी सकते थे। इसके बावजूद रिटायरमेंट के वक्त उनकी जो भी आखिरी टेक होम सैलरी होती थी, उसका सीधे 50 फीसदी हिस्सा पेंशन के रूप में मिलना शुरू हो जाता था। साथ ही जीपीएफ खाते में जमा पूरी राशि का एकमुश्त भुगतान भी अलग से किया जाता था। इस पेंशन पर आम सैलरी की तरह ही हर 6 महीने पर महंगाई भत्ते का लाभ भी जोड़ा जाता था, यानी समय के साथ पेंशन की रकम भी बढ़ती रहती थी। यही वजह है कि आज भी बड़ी तादाद में कर्मचारी इसी पुरानी व्यवस्था की वापसी चाहते हैं, क्योंकि इसमें न तो बाजार का कोई जोखिम था और न ही रिटायरमेंट के बाद आमदनी को लेकर कोई अनिश्चितता।
एनपीएस की सबसे बड़ी अड़चन, बाजार पर निर्भरता
सरकार ने 2004 में जैसे ही एनपीएस लागू किया, कर्मचारी संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि इस योजना में पेंशन की कोई गारंटी नहीं दी जाती। शुरुआत में इसमें कर्मचारी और सरकार, दोनों का अंशदान 10-10 फीसदी तय था, जिसे शेयर बाजार सहित दूसरे निवेश विकल्पों में लगाया जाता था। बाद में सरकार ने अपना हिस्सा बढ़ाकर 14 फीसदी कर दिया, जिसके बाद अब कर्मचारी के बेसिक और महंगाई भत्ते का कुल 24 फीसदी हिस्सा हर महीने एनपीएस खाते में निवेश होता है। इस निवेश पर जो भी रिटर्न मिलता है, वह भी कर्मचारी के कॉर्पस में जुड़ता चला जाता है। रिटायरमेंट के समय इस पूरे कॉर्पस का 60 से 80 फीसदी हिस्सा एकमुश्त निकाला जा सकता है, जबकि बाकी बची रकम से एन्यूटी खरीदना अनिवार्य होता है। इसी एन्यूटी पर मिलने वाले ब्याज को 12 बराबर हिस्सों में बांटकर हर महीने पेंशन के रूप में भुगतान किया जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि नौकरी के दौरान कर्मचारी ने कितना अंशदान किया और बाजार ने कितना रिटर्न दिया, यही इस योजना की सबसे बड़ी खामी मानी जाती है। इसके अलावा इसमें दूसरी बड़ी दिक्कत यह है कि मिलने वाली पेंशन पर महंगाई भत्ते का कोई फायदा नहीं दिया जाता, जिससे बढ़ती महंगाई में पेंशन की असली कीमत घटती चली जाती है।
यूपीएस में गारंटी तो मिली, लेकिन एकमुश्त राशि पर बड़ा पेच
कर्मचारियों की नाराजगी को देखते हुए सरकार ने एनपीएस और ओपीएस, दोनों की खूबियों को मिलाकर एक नई योजना बनाई, जिसे यूनिफाइड पेंशन स्कीम यानी यूपीएस नाम दिया गया। इसे करीब 2 साल पहले लॉन्च किया गया था। इसमें रिटायरमेंट के बाद गारंटीड पेंशन का प्रावधान तो रखा गया, लेकिन इसके साथ भी एक बड़ा पेच जुड़ा है। सरकार ने इसमें मुख्य रूप से दो बड़े प्रावधान किए। पहला, रिटायरमेंट के बाद कर्मचारी को उसकी बेसिक सैलरी का 40 फीसदी हिस्सा गारंटीड पेंशन के रूप में मिलेगा। दूसरा, इस पेंशन पर भी हर 6 महीने पर महंगाई भत्ते का लाभ जोड़ा जाएगा। यूपीएस ने भले ही गारंटी वाली पेंशन का वादा पूरा किया हो, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खामी यह है कि पेंशन की गणना सिर्फ बेसिक सैलरी के आधार पर की जाती है, जबकि कर्मचारियों की दलील है कि उनकी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा महंगाई भत्ते का भी होता है और उसे भी पेंशन तय करने का आधार बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा यूपीएस की सबसे कमजोर कड़ी रिटायरमेंट पर मिलने वाली एकमुश्त राशि को लेकर है। इस योजना में कर्मचारी और सरकार, दोनों के कुल अंशदान का करीब 70 से 80 फीसदी हिस्सा रिटायरमेंट के वक्त एकमुश्त नहीं दिया जाता। साथ ही अगर कोई कर्मचारी अपनी एकमुश्त राशि ज्यादा निकालने का विकल्प चुनता है, तो इसके बदले उसे हर महीने मिलने वाली पेंशन की रकम में कटौती झेलनी पड़ती है।
तीन योजनाओं के बीच कर्मचारियों की उलझन बरकरार
तीनों योजनाओं को साथ रखकर देखें तो साफ है कि पुरानी पेंशन स्कीम में कर्मचारियों को न तो बाजार के उतार चढ़ाव की चिंता करनी पड़ती थी और न ही एकमुश्त राशि में कटौती का डर रहता था। एनपीएस में यह पूरा जोखिम कर्मचारी के कंधों पर आ जाता है, क्योंकि पेंशन की रकम बाजार के प्रदर्शन और खुद के अंशदान पर टिकी होती है। यूपीएस इन दोनों के बीच का रास्ता निकालने की कोशिश जरूर है, इसमें गारंटीड पेंशन तो मिलती है, लेकिन बेसिक सैलरी पर सीमित गणना और एकमुश्त राशि में बड़ी कटौती की वजह से यह भी कर्मचारियों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पा रही। यही वजह है कि तीन-तीन विकल्प मौजूद होने के बावजूद कर्मचारी संगठनों की मांग आज भी पुरानी पेंशन योजना के इर्द गिर्द ही घूम रही है।



















