अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी का सिलसिला बना हुआ है और दोनों प्रमुख बेंचमार्क, अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड और ब्रेंट क्रूड, तीन महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। क्रूड ऑयल की कीमतें अब 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को छूने के बेहद करीब आ गई हैं। इस ताजा तेजी के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए हमलों का सीधा हाथ है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर होने के बावजूद, हर दिन लगभग 7 लाख बैरल कच्चा तेल और रिफाइंड उत्पाद इस रास्ते से होकर गुजर रहे हैं।
इसके बावजूद, तेल की बढ़ती ये कीमतें वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी हैं और भारत पर भी इसका भारी दबाव देखने को मिलेगा। पिछले वित्त वर्ष के दौरान भारत की कच्चे तेल की आयात निर्भरता बढ़कर 88.7 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, और वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में भी इसमें काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आइए विस्तार से जानते हैं कि कच्चे तेल की इन बढ़ती कीमतों का भारतीय शेयर बाजार और पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, पीएनजी तथा सीएनजी जैसे पेट्रोलियम उत्पादों पर किस तरह का असर पड़ सकता है।
100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा कच्चा तेल
आठ सितंबर 2026 की सुबह के शुरुआती घंटों में अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड ऑयल फ्यूचर्स 92.4 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा था, जो इसका पिछले तीन महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। वहीं दूसरी ओर, ब्रेंट क्रूड की कीमत भी 97 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है और यह 100 डॉलर के जादुई आंकड़े से महज 3 डॉलर दूर है। ब्रेंट क्रूड फिलहाल छह हफ्ते के सबसे ऊपरी स्तर पर ट्रेड कर रहा है। पिछले दो सत्रों से लगातार क्रूड में करीब 2 प्रतिशत की तेजी आई है। महीने-दर-महीने के आधार पर अमेरिकी डब्ल्यूटीआई और ब्रेंट में क्रमशः 13 प्रतिशत और 11 प्रतिशत की भारी उछाल आई है। फरवरी 2026 के अंत में जब अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष शुरू हुआ था, तब से लेकर अब तक तेल की कीमतों में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। पश्चिम एशिया के युद्ध के कारण आई इस तेजी की वजह से साल-दर-साल के आधार पर अमेरिकी डब्ल्यूटीआई में 48 प्रतिशत और ब्रेंट में 46 प्रतिशत से अधिक का जबरदस्त उछाल आया है।
ताजा घटनाक्रमों के तहत, ईरान जल्द ही होर्मुज जलडमरूमध्य से शिपिंग के लिए ओमान के साथ एक समझौता करने की योजना बना रहा है। इस बात से इस मुख्य जलमार्ग पर तेहरान का नियंत्रण बढ़ने की चिंताएं और अधिक गहरी हो गई हैं। गौरतलब है कि वैश्विक तेल और गैस की आपूर्ति का कम से कम 20 प्रतिशत हिस्सा इसी होर्मुज मार्ग से होकर गुजरता है। दूसरी तरफ, अमेरिका अपने नौसेना बलों के जरिए ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी किए हुए है ताकि इस्लामिक शासन के तहत होने वाले निर्यात को रोका जा सके, और उसका मुख्य फोकस होर्मुज में जलमार्ग परिवहन को युद्ध से पहले के स्तर पर वापस लाना है।
सप्ताहांत में जलडमरूमध्य में ईरानी टैंकरों पर अमेरिकी हमलों के बाद बाजार इस बात पर भी टकटकी लगाए बैठा था कि अमेरिका आगे क्या प्रतिक्रिया देगा। पिछले हफ्ते मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान की आशंकाओं के कारण तेल की कीमतों में लगभग 10 प्रतिशत का उछाल आया था। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के अनुसार, सप्ताहांत में दोनों पक्षों ने होर्मुज के आसपास जहाजों और सैन्य नौकाओं को निशाना बनाते हुए हमलों को और तेज कर दिया था। इस ताजा संघर्ष की चपेट में आने वाली कंपनियों में सऊदी अरामको की जाजान स्थित सुविधाएं भी शामिल हैं, जो लाल सागर के पास स्थित हैं। हालांकि, वहां हुआ नुकसान सीमित स्तर पर ही आंका गया है। तमाम खतरों के बावजूद, फारस की खाड़ी से तेल का परिवहन जारी है और होर्मुज के रास्ते प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल कच्चा तेल व रिफाइंड उत्पाद भेजे जा रहे हैं।
भारत पर पड़ेगा गहरा असर
एनरिच मनी के सीईओ पोमुडी आर का कहना है कि भारत के लिए लगातार उच्च बनी तेल की कीमतें एक प्रमुख जोखिम हैं, क्योंकि इनसे आयात बिल के चौड़ा होने, महंगाई के दबाव बढ़ने और चालू खाते के संतुलन पर दबाव पड़ने की पूरी संभावना है। वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में आए इस उछाल के बीच, पिछले हफ्ते तक भारत का औसत क्रूड ऑयल आयात मूल्य 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया था। ऑयल मिनिस्ट्री के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, चार सितंबर 2026 तक भारतीय क्रूड ऑयल बास्केट 101.07 डॉलर प्रति बैरल पर दर्ज की गई थी। हालांकि यह आंकड़ा अप्रैल और मई में देखे गए 114.48 डॉलर और 106.23 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से अभी कम है, लेकिन यह फिर भी काफी ऊंचा है और देश के आयात पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
युद्ध शुरू होने के बाद से भारत का कच्चे तेल का आयात बिल आसमान छू रहा है। फरवरी के अंत से लेकर अब तक सऊदी अरब के रास तनुरा से भारत जैसे मार्गों पर भारत का मालभाड़ा (फ्रेइट रेट्स) 400 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। इसके अलावा, अगस्त में इस विशेष रूट पर वेरी लार्जेस्ट क्रूड कैरियर (VLCC) के जरिए कच्चा तेल ले जाने की शिपिंग दर युद्ध से पहले के 0.85 डॉलर प्रति बैरल से 411 प्रतिशत उछलकर 4.34 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। वहीं दूसरी ओर, पिछले महीने तक रूस के उस्त-लुगा बंदरगाह से भारत आने वाले मार्ग पर सुएजमैक्स टैंकरों का मालभाड़ा फरवरी के 8.40 डॉलर की तुलना में 137 प्रतिशत बढ़कर 19.90 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। इसके अलावा, होर्मुज में एक ही यात्रा के लिए युद्ध-जोखिम बीमा (वार-रिस्क इंश्योरेंस) संघर्ष से पहले के महज 2,50,000 डॉलर की तुलना में बढ़कर 7.5 मिलियन डॉलर से 10 मिलियन डॉलर के बीच पहुंच गया है।
इस बीच, बढ़ती कीमतों के कारण भारत को वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) के दौरान कच्चे तेल के आयात के लिए कथित तौर पर 60 प्रतिशत अधिक भुगतान करना पड़ा है। साथ ही, जुलाई का आयात बिल भी पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 41 प्रतिशत अधिक दर्ज किया गया है।
भारतीय शेयर बाजार पर क्या होगा असर
पोमुडी का कहना है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के कारण भारतीय शेयर बाजार सतर्क रुख अपनाए रख सकते हैं और मैक्रो backdrop पर लगातार ऊंचे कच्चे तेल का प्रभाव हावी रहेगा। ऊर्जा बाजार में तनाव की स्थिति बनी हुई है, जहां डब्ल्यूटीआई क्रूड 93 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छूने के बाद 92 से 93 डॉलर के दायरे में कारोबार कर रहा है। उन्होंने आगे कहा कि भू-राजनीतिक परिस्थितियां अभी भी काफी नाजुक हैं क्योंकि अमेरिका-ईरान संघर्ष के कम होने के कोई खास आसार नजर नहीं आ रहे हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता और इसके पूरी तरह से दोबारा खुलने का समय अनिश्चित होने के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापक बाजार की धारणा को लेकर चिंताएं लगातार बनी हुई हैं।
एलपीजी, पीएनजी, सीएनजी और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर प्रभाव
चूंकि भारत कच्चे तेल के प्रमुख आयातकों में से एक है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय क्रूड में होने वाली कोई भी तेजी आयात बिल को महंगा बना देगी और तेल कंपनियों को पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाने पर मजबूर कर देगी। इसका विस्तृत ब्योरा इस प्रकार है
- पेट्रोल: अंतरराष्ट्रीय कीमतों और बाजार की स्थितियों के आधार पर ओएमसी (तेल विपणन कंपनियां) फैसले लेती हैं, जिससे कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बना हुआ है।
- डीजल: महंगा कच्चा तेल रिफाइनरी और इनपुट लागत को बढ़ाता है, और माल ढुलाई व परिवहन के लिए डीजल का उपयोग अत्यधिक महत्वपूर्ण होने के कारण इस पर भी कीमतों का दबाव है।
- घरेलू एलपीजी: भारत अपनी एलपीजी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। घरेलू एलपीजी को सरकारी या ओएमसी के समर्थन के जरिए अंतरराष्ट्रीय कीमत के पूरे उतार-चढ़ाव से काफी हद तक सुरक्षित रखा जाता है, हालांकि इसमें आंशिक देरी या बदलाव संभव है।
- कमर्शियल एलपीजी: कमर्शियल एलपीजी पूरी तरह से बाजार से जुड़ी होती है और अंतरराष्ट्रीय एलपीजी बेंचमार्क तथा उससे जुड़ी लागतों को सीधे तौर पर दर्शाती है, जिससे इस पर सबसे तेज असर पड़ता है।
- सीएनजी: सीएनजी की कीमतें प्राकृतिक गैस की लागत और उसकी उपलब्धता पर मुख्य रूप से निर्भर करती हैं। कच्चा तेल वैकल्पिक ईंधनों के अर्थशास्त्र को प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह सीधे तौर पर सीएनजी की कीमत तय नहीं करता।
- पीएनजी: सीएनजी की तरह ही पीएनजी के मामले में भी कच्चे तेल की तुलना में प्राकृतिक गैस की खरीद लागत अधिक सीधे तौर पर मायने रखती है।
- एटीएफ (Aviation Turbine Fuel): विमानन टरबाइन ईंधन एक प्रमुख पेट्रोलियम उत्पाद है और यह अंतरराष्ट्रीय तेल व रिफाइंड उत्पादों की कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति सीधा संवेदनशील होता है।



















