रूस के साइबेरियाई इलाके इर्कुत्स्क में स्थित एक विशेष रिसर्च संस्थान में कार्यरत अट्ठाईस वर्षीय प्रयोगशाला तकनीशियन की जान जाने के बाद संक्रामक बीमारियों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। यह घटना एक एंटी-प्लेग अनुसंधान केंद्र से जुड़ी है, जहां संदिग्ध न्यूमोनिक प्लेग के संभावित संपर्क को लेकर सतर्कता बरती जा रही है। इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है, और वाशिंगटन में ट्रंप प्रशासन भी घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए है। हालांकि किसी बड़े पैमाने पर संक्रमण फैलने की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संदिग्ध संक्रमण के स्वरूप और लैब में बैक्टीरिया के संभावित रिसाव की चर्चाओं ने वैश्विक स्तर पर निगरानी तंत्र को सक्रिय कर दिया है।
लैब में टेस्ट ट्यूब टूटने की चर्चा और कर्मी की मौत
मामले से जुड़े विवरण के अनुसार, इर्कुत्स्क एंटी-प्लेग इंस्टीट्यूट में कार्यरत महिला तकनीशियन डारिया शिपिलोवा पच्चीस सितंबर को कथित तौर पर उस समय गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं, जब न्यूमोनिक प्लेग बैक्टीरिया से भरी एक टेस्ट ट्यूब दुर्घटनावश टूट गई। इसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ती चली गई और दो अक्टूबर को उनका निधन हो गया। इस कथित दुर्घटना के बाद इलाके में हलचल तेज हो गई, क्योंकि न्यूमोनिक प्लेग बेहद संक्रामक माना जाता है और यह श्वसन प्रणाली के जरिए तेजी से असर दिखाता है।
रूसी स्वास्थ्य एजेंसी का आधिकारिक रुख और जांच के परिणाम
इस पूरे मामले में गैर-आधिकारिक दावों और रूसी स्वास्थ्य विभाग के औपचारिक बयानों में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। रूस की उपभोक्ता और जनस्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी रोस्पोट्रेबनाडज़ोर ने स्पष्ट किया है कि मृतका को अज्ञात कारणों से होने वाले निमोनिया की पुष्टि हुई थी। रूसी अधिकारियों ने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार नहीं किया है कि यह प्लेग का मामला था। इसके साथ ही स्वास्थ्य एजेंसी का कहना है कि प्रयोगशाला परीक्षणों में ऐसे कोई सूक्ष्मजीव नहीं पाए गए हैं, जो संस्थान में महिला के कामकाज या प्लेग बैक्टीरिया से जुड़े हों।
लगभग 200 संपर्क निगरानी में और अस्पतालों में पाबंदियां
भले ही संक्रमण को लेकर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर एहतियाती कदम पूरी मुस्तैदी से उठाए जा रहे हैं। महिला के संपर्क में आए संभावित लगभग दो सौ लोगों को पहचानकर उन्हें चिकित्सकीय निगरानी और आइसोलेशन में रखा गया है। इसके अलावा, क्षेत्र के अस्पतालों में संक्रमण की रोकथाम के लिए कड़े नियम लागू किए गए हैं और अतिरिक्त पाबंदियां लगाई गई हैं, ताकि यदि कोई संदिग्ध लक्षण सामने आए तो उसे तुरंत नियंत्रित किया जा सके।
वाशिंगटन की निगरानी और अमेरिकी एजेंसियों का आकलन
साइबेरिया में सामने आए इस घटनाक्रम पर अमेरिका भी पूरी सतर्कता बरत रहा है। ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी ने पुष्टि की है कि अमेरिकी सरकार इन सूचनाओं से पूरी तरह अवगत है, परिस्थितियों पर लगातार नजर रख रही है और अपने विकल्पों का आकलन कर रही है। वहीं अमेरिकी विदेश विभाग ने यह भी साझा किया है कि वह सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के साथ मिलकर इस संदिग्ध मामले की बारीकी से समीक्षा कर रहा है, जिससे किसी भी संभावित जैविक या सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम को समझा जा सके।
येर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया और प्लेग के तीन मुख्य रूप
प्लेग एक गंभीर संक्रामक रोग है, जो येर्सिनिया पेस्टिस नामक जीवाणु के कारण होता है। यह बैक्टीरिया आमतौर पर छोटे स्तनधारी जीवों और उनके पिस्सुओं में पाया जाता है। इंसानों में यह संक्रमण संक्रमित पिस्सुओं के काटने, दूषित सामग्री को छूने या फिर सांस से निकलने वाले सूक्ष्म कणों के माध्यम से पहुंचता है। चिकित्सा विज्ञान में प्लेग के तीन मुख्य स्वरूप माने गए हैं
- ब्यूबोनिक प्लेग: यह सबसे आम रूप है, जो मुख्य रूप से पिस्सुओं के काटने से लसीका ग्रंथियों में सूजन पैदा करता है।
- न्यूमोनिक प्लेग: यह सबसे गंभीर और खतरनाक स्वरूप है, जो फेफड़ों को सीधे प्रभावित करता है और इंसान से इंसान में खांसने या छींकने से फैल सकता है।
- सेप्टिसेमिक प्लेग: इस स्थिति में बैक्टीरिया सीधे रक्तप्रवाह में फैल जाता है, जिससे शरीर के अंगों को भारी नुकसान पहुंचता है।
न्यूमोनिक प्लेग इसलिए भी बेहद चिंताजनक माना जाता है क्योंकि यह फेफड़ों में पहुंचकर सांस के जरिए एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यदि न्यूमोनिक प्लेग का समय पर उपचार न किया जाए तो यह बेहद तेजी से जानलेवा साबित हो सकता है। हालांकि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में एंटीबायोटिक्स की मदद से शुरुआती चरण में इलाज शुरू होने पर मरीज की जान बचाई जा सकती है। यही वजह है कि किसी व्यापक प्रसार की पुष्टि न होने के बावजूद साइबेरिया के इस मामले को स्वास्थ्य अधिकारी पूरी गंभीरता से ले रहे हैं।
इतिहास की महामारियां और पिछले 100 साल का रिकॉर्ड
प्लेग कोई नई बीमारी नहीं है और इसने सदियों से मानव इतिहास को गहरे रूप से प्रभावित किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ऐतिहासिक आंकड़ों में तीन बड़ी महामारियों का प्रमुखता से उल्लेख मिलता है। इनमें छठी शताब्दी का जस्टिनियन प्लेग, चौदहवीं शताब्दी का ब्लैक डेथ और उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में शुरू हुई तीसरी महामारी शामिल है। चौदहवीं सदी के ब्लैक डेथ ने करोड़ों लोगों की जान ले ली थी, जबकि तीसरी महामारी 1800 के दशक के उत्तरार्ध में चीन से शुरू होकर वैश्विक स्तर पर फैली थी।
हालांकि, पिछले सौ वर्षों में दुनिया ने ऐसी कोई वैश्विक प्लेग महामारी नहीं देखी है। इस दौरान केवल क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर ही इसके प्रकोप सामने आए हैं। उदाहरण के लिए, मेडागास्कर में लगभग हर वर्ष प्लेग के मामले दर्ज किए जाते हैं। वर्ष 2017 में मेडागास्कर में एक बड़ा प्रकोप देखा गया था, जिसमें नवंबर तक 2,300 से अधिक पुष्ट, संभावित और संदिग्ध मामले दर्ज किए गए थे और दो सौ से अधिक लोगों की मौत हुई थी। उस प्रकोप में न्यूमोनिक प्लेग के मरीजों की संख्या काफी अधिक थी।
भारत में भी वर्ष 1994 में सूरत और बीड में प्लेग को लेकर बड़ा संकट उत्पन्न हुआ था। हालांकि, बाद में हुई जांचों में इस बात पर सवाल खड़े हुए कि क्या वे सभी मामले वास्तव में येर्सिनिया पेस्टिस के कारण ही थे, क्योंकि उस प्रकोप के दौरान बैक्टीरिया को अलग से अलग-थलग नहीं किया जा सका था।
वर्तमान स्थिति और वैश्विक सबक
फिलहाल साइबेरिया का यह मामला एक संदिग्ध घटना है, न कि किसी नई महामारी की शुरुआत। अब पूरा ध्यान वैज्ञानिक परीक्षणों, संपर्कों की ट्रेसिंग और यह निर्धारित करने पर केंद्रित है कि क्या मृतका का संक्रमण वास्तव में प्रयोगशाला की घटना से जुड़ा था या नहीं। यह घटना दिखाती है कि इतिहास की भयानक बीमारियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, बल्कि आधुनिक निगरानी, आइसोलेशन और एंटीबायोटिक उपचार के जरिए दुनिया अब किसी भी स्थानीय खतरे को समय रहते सीमित करने में पहले से अधिक सक्षम है।



















