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औरैया में सातों बहनों ने तोड़ी परंपरा की बंदिशें, मां की अर्थी को दिया कंधा और सबसे छोटी बेटी ने दी मुखाग्निउत्तर प्रदेश
6 सित॰ 2026, 3:57 pm (6 दिन पहले)· 4

औरैया में सातों बहनों ने तोड़ी परंपरा की बंदिशें, मां की अर्थी को दिया कंधा और सबसे छोटी बेटी ने दी मुखाग्नि

उत्तर प्रदेश के औरैया में सात बहनों ने रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं को पीछे छोड़ते हुए अपनी मां का अंतिम संस्कार खुद किया। सातों बहनों ने अर्थी को कंधा दिया और सबसे छोटी बेटी ने मुखाग्नि देकर समाज को बड़ा संदेश दिया।

उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में परंपरा और पुरानी रूढ़ियों को दरकिनार करते हुए एक मिसाल कायम की गई है। यहां एक मां के निधन के बाद उनकी सात बेटियों ने सदियों पुरानी सामाजिक बंदिशों को तोड़ते हुए अंतिम संस्कार की सभी जिम्मेदारियां खुद उठाईं। जब अंतिम विदाई का समय आया, तो सातों बहनों ने एक साथ मिलकर अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया और श्मशान घाट पहुंचकर सबसे छोटी बेटी ने विधि-विधान के साथ मुखाग्नि दी। बेटियों के इस साहसी और भावुक फैसले ने पूरे समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि माता-पिता के प्रति संतान का कर्तव्य लिंग देखकर तय नहीं होता।

पिता के निधन के बाद अकेले मां ने पाला था सातों बेटियों को

इस परिवार पर दुखों का पहाड़ तब टूटा था जब कई साल पहले गृहस्वामी यानी पिता का देहांत हो गया था। उस समय पुरानी सामाजिक परंपराओं के कारण पिता के अंतिम संस्कार की रस्में भतीजे से करवाई गई थीं। पति के जाने के बाद मां ने हार नहीं मानी और अकेले ही संघर्ष करते हुए अपनी सातों बेटियों का पालन-पोषण किया। उन्होंने जीवन भर अकेले मेहनत करके अपनी बेटियों को सहारा दिया, मार्गदर्शन किया और कभी किसी कमी का अहसास नहीं होने दिया। सातों बहनों के लिए उनकी मां ही उनका सबसे बड़ा सहारा और पूरी दुनिया थीं।

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रूढ़िवादी सोच को नकारते हुए उठाया बड़ा कदम

समय के साथ जब मां की भी मृत्यु हो गई, तो सातों बहनें गहरे शोक में डूब गईं। अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू होने पर रिश्तेदार पारंपरिक ढर्रे पर चलते हुए पुरुष रिश्तेदारों को बुलाने की बात करने लगे। इसी दौरान सबसे छोटी बेटी ने दृढ़ता से इस प्रथा का विरोध किया। उसने अपनी बहनों के सामने बात रखी कि जब मां ने जीवन भर उन्हें बेटों जैसा प्यार दिया और कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया, तो फिर उनकी अंतिम विदाई के समय किसी बाहरी व्यक्ति या पुरुष रिश्तेदार का सहारा क्यों लिया जाए।

सातों बहनों ने दिया अर्थी को कंधा, छोटी ने दी मुखाग्नि

अपनी छोटी बहन के इस विचार का बाकी छह बड़ी बहनों ने भी समर्थन किया और एकजुट होकर फैसला लिया। इसके बाद सातों बहनों ने मिलकर अपनी मां की अर्थी को अपने कंधों पर उठाया और श्मशान घाट तक ले गईं। वहां अंतिम संस्कार की रस्मों के बीच सबसे छोटी बेटी ने पूरे विधि-विधान के साथ मां की देह को मुखाग्नि दी। इस मार्मिक दृश्य को देखकर वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखें नम हो गईं। स्थानीय निवासियों और रिश्तेदारों ने बेटियों की इस निष्ठा और हिम्मत की सराहना की।

सामाजिक बदलाव और पूर्व के अन्य मामले

यह घटना कोई अकेली मिसाल नहीं है, बल्कि देश में अंतिम संस्कार से जुड़ी पुरानी वर्जनाओं के टूटने का संकेत है। इससे पहले उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में भी एक 60 साल की बहन ने अपने 55 साल के भाई के निधन पर मुखाग्नि देकर मिसाल कायम की थी। वहीं बिहार के मुजफ्फरपुर में सामाजिक विरोध के बावजूद बेटियों ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया था और सबसे छोटी बेटी ने अंतिम संस्कार संपन्न कराया था। औरैया का यह मामला संदेश देता है कि बच्चों का प्रेम और जिम्मेदारी किसी लिंग की मोहताज नहीं होती।

सवाल-जवाब

औरैया में सातों बहनों ने क्या उदाहरण पेश किया?
सातों बहनों ने अपनी मां के निधन पर परंपराओं को तोड़ते हुए खुद अर्थी को कंधा दिया और सबसे छोटी बेटी ने श्मशान घाट पर मुखाग्नि दी।
परिवार में पिता के निधन के समय क्या हुआ था?
कई वर्ष पहले पिता की मृत्यु के समय पुरानी सामाजिक रीति-रिवाजों के चलते भतीजे से अंतिम संस्कार कराया गया था।
पिता के जाने के बाद परिवार को किसने संभाला?
पिता के निधन के बाद मां ने अकेले ही संघर्ष करते हुए अपनी सातों बेटियों की परवरिश और मार्गदर्शन किया।
सबसे छोटी बेटी ने मुखाग्नि देने का फैसला क्यों लिया?
उसका कहना था कि जब मां ने कभी बेटों की कमी नहीं होने दी, तो अंतिम विदाई में भी किसी बाहरी पुरुष की मदद लेने की जरूरत नहीं है।
क्या उत्तर प्रदेश में पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं?
हां, सीतापुर में 60 साल की बहन ने अपने भाई को मुखाग्नि दी थी और मुजफ्फरपुर में भी बेटियों ने पिता की अर्थी उठाकर अंतिम संस्कार किया था।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·6 दिन पहले

औरैया की यह घटना उत्तर प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने में आ रहे क्रमिक बदलाव का स्पष्ट संकेत है। पितृसत्तात्मक मान्यताओं को चुनौती देते हुए बेटियों द्वारा अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभालना यह बताता है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी लैंगिक समानता की सोच अब केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारिवारिक निर्णयों में धरातल पर उतर रही है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

रोहन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह मामला केवल लैंगिक समानता का प्रतीक नहीं है, बल्कि कानूनी और सामाजिक अधिकारों के उस दायरे को भी विस्तार देता है जहाँ पारिवारिक दायित्व लिंग के आधार पर तय नहीं होते। पुलिस और स्थानीय प्रशासन स्तर पर भी ऐसे मामलों में सामाजिक विरोध न होना इस बात का प्रमाण है कि कानून-व्यवस्था और स्थानीय समुदाय अब रूढ़िवादी बाधाओं के बीच रुकावट नहीं बन रहे हैं, जिससे भविष्य में महिलाओं के लिए ऐसे पारिवारिक व कानूनी अधिकार स्वाभाविक रूप से सुरक्षित हो सकेंगे।

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