मध्य प्रदेश में बाघों के संरक्षण को लेकर एक बड़ा सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है, लेकिन इसके साथ ही नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। राज्य के बालाघाट जिले का वह इलाका, जिसे अब तक केवल कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और पेंच राष्ट्रीय उद्यान के बीच बाघों की आवाजाही का गलियारा (कॉरिडोर) माना जाता था, अब इन बड़े मांसाहारी वन्यजीवों का स्थायी आशियाना बन चुका है। अकेले बालाघाट क्षेत्र में ही अब 200 से ज्यादा बाघों की मौजूदगी की संभावना जताई जा रही है। भारत में वर्ष 2014 से 2022 के बीच बाघों की कुल आबादी में 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी, जबकि इसी अवधि के दौरान केवल मध्य प्रदेश में बाघों का कुनबा 155 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ा था। इस अभूतपूर्व वृद्धि की वजह से मध्य प्रदेश में बाघों की कुल संख्या 1,000 के आंकड़े को पार कर चुकी है और राज्य ने 'टाइगर स्टेट' का अपना दर्जा मजबूती से बरकरार रखा है।
कैमरा ट्रैप अध्ययन में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
वन्यजीव संरक्षण संगठन डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग द्वारा तैयार की गई एक विस्तृत रिपोर्ट में दक्षिण बालाघाट के जंगलों में वन्यजीवों की बढ़ती आबादी की पुष्टि की गई है। इस अध्ययन के दौरान नवंबर 2021 में दक्षिण बालाघाट के लालबर्रा और कटंगी वन क्षेत्रों में 71 स्थानों पर कैमरा ट्रैप लगाए गए थे। इन कैमरों के जरिए 215 वर्ग किलोमीटर के वन क्षेत्र में लगातार 25 दिनों तक बारीक निगरानी रखी गई।
इस सघन निगरानी अभियान के दौरान कैमरों में बाघों की 262 और 154 अलग-अलग तस्वीरें कैद हुईं। इन तस्वीरों के विस्तृत विश्लेषण के आधार पर वन विभाग और विशेषज्ञों ने 18 विशिष्ट बाघों और 27 तेंदुओं की पहचान की। इसके अलावा, कैमरों ने इलाके में जैव विविधता की समृद्ध मौजूदगी को दर्ज किया, जिसमें 24 विभिन्न स्तनधारी प्रजातियों की गतिविधियों को देखा गया। इनमें भेड़िया, सियार, रीछ (स्लॉथ बेयर), गौर, सांभर, चीतल, नीलगाय, बार्किंग डियर और साही जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियां शामिल हैं।
कॉरिडोर के स्थायी ठिकाना बनने की मुख्य वजहें
अतीत में जब बाघों की संख्या कम हुआ करती थी, तब बालाघाट का जंगल केवल कान्हा और पेंच के बीच बाघों की सुरक्षित आवाजाही का रास्ता हुआ करता था। लेकिन समय के साथ यहां का माहौल बदल गया। बालाघाट के मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) गौरव चौधरी के अनुसार, यह क्षेत्र बाघों के प्रजनन और वंश वृद्धि के लिए बेहद अनुकूल माहौल प्रदान करता है।
जंगल के भीतर शाकाहारी जीवों की पर्याप्त उपलब्धता के कारण बाघों को आसानी से शिकार मिल जाता है। इसके अलावा, सघन वनस्पतियों के कारण उन्हें आराम करने और छिपने के लिए भी सुरक्षित जगह मिलती है। बालाघाट में घने जंगलों की सीमाएं ग्रामीण आबादी और खेतों से सटी हुई हैं। इस भौगोलिक स्थिति की वजह से बाघों को गांव के मवेशियों के रूप में आसान शिकार उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि जो इलाका कभी केवल एक गुजरने का रास्ता था, वही अब बाघों और तेंदुओं का मुख्य रिहायशी क्षेत्र बन चुका है।
टेरिटोरियल फाइट और बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष
बाघों की संख्या में हो रही इस बढ़ोतरी से जहां वन्यजीव प्रेमियों में खुशी की लहर है, वहीं बाघों की क्षेत्रीय प्रवृत्ति (टेरिटोरियल बिहेवियर) के कारण गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं। बाघ स्वभाव से अपने लिए एक निश्चित क्षेत्र तय करते हैं और उसमें किसी अन्य बाघ की घुसपैठ बर्दाश्त नहीं करते। सीमित वन क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ने से नए और युवा बाघों को अपनी नई टेरिटरी बनाने के लिए जंगलों से बाहर खेतों और रिहायशी इलाकों का रुख करना पड़ रहा है।
इस स्थिति के कारण इंसानों और वन्यजीवों के बीच सीधा टकराव हो रहा है। बीते एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो बाघों के हमलों में 5 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, जबकि 2 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। यह संघर्ष न केवल इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है, बल्कि बाघों की जान भी ले रहा है।
बाघों की मृत्यु दर और वर्चस्व की लड़ाई
मध्य प्रदेश में बाघों की बढ़ती मौतों ने चिंता बढ़ा दी है। वर्ष 2026 में शुरुआती सात महीनों के भीतर ही पूरे राज्य में 41 बाघों की मौत दर्ज की जा चुकी है। वहीं अगर केवल दक्षिण बालाघाट की बात करें, तो बीते दो वर्षों के दौरान 4 बाघों और 2 तेंदुओं की जान जा चुकी है।
हाल ही में बालाघाट के सोनेवानी वन क्षेत्र में 'सूखा' नाम के एक बाघ के शावक की मौत का मामला सामने आया है। जांच के अनुसार, इस शावक की मौत किसी बीमारी या शिकार की वजह से नहीं, बल्कि वयस्क बाघों के बीच वर्चस्व और इलाके पर कब्जे की लड़ाई (टेरिटोरियल फाइट) के कारण हुई थी। शक्तिशाली बाघ कमजोर या छोटे बाघों को अपने क्षेत्र से खदेड़ देते हैं, जिससे इस तरह की घातक भिड़ंत होती है। इसके अलावा, अवैध शिकार की कोशिशें, सड़कों पर तेज रफ्तार वाहन और खनन गतिविधियां भी बाघों की असामयिक मौत का कारण बन रही हैं।
खनन परियोजनाओं से सिकुड़ता प्राकृतिक आवास
बालाघाट जिले में पहले से ही कई औद्योगिक और खनन गतिविधियां चल रही हैं, जो जंगलों पर दबाव बढ़ा रही हैं। कान्हा नेशनल पार्क के बफर जोन से सटी कॉपर माइन्स मौजूद हैं, जबकि बालाघाट के भरवेली क्षेत्र में मैंगनीज की बड़ी खदानें संचालित हो रही हैं। इनके अलावा पूरे जिले में कई छोटी-बड़ी खदानें चल रही हैं।
जब किसी वन क्षेत्र में खनन कार्य शुरू होता है, तो केवल खदान की जमीन ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि वहां भारी वाहनों का परिवहन और लंबी सड़कों का निर्माण भी बढ़ जाता है। सड़कों के निर्माण के लिए जंगलों के बड़े हिस्सों को काटा जाता है और भारी मशीनों व वाहनों के शोर से वन्यजीवों की शांति भंग होती है। वर्तमान में बालाघाट में बॉक्साइट खनन की नई परियोजनाओं के लिए कई ब्लॉक खोलने की तैयारी की जा रही है। यदि इन खनन ब्लॉकों को मंजूरी मिलती है, तो कई हेक्टेयर घना जंगल कटाई की कगार पर आ जाएगा। पेड़ों की इस बड़े पैमाने पर कटाई से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास और अधिक सिकुड़ेगा, जिससे आने वाले दिनों में मानव-बाघ संघर्ष की घटनाओं में और इजाफा होने की आशंका है।
वन विभाग के पास ठोस कार्ययोजना का अभाव
जैसे-जैसे बाघों की आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे नई टेरिटरी बनाने का दबाव भी लगातार गहरा रहा है। बलवान बाघ कमजोर बाघों को खदेड़ रहे हैं, जिससे बाघों के बीच खूनी संघर्ष हो रहा है और उनकी जान जा रही है। दूसरी ओर, जगह की कमी के चलते बाघ लगातार इंसानी बस्तियों में दाखिल हो रहे हैं। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, बढ़ती आबादी को सुरक्षित आवास देने और इंसानों के साथ हो रहे इस घातक टकराव को रोकने के लिए वन विभाग के पास फिलहाल कोई ठोस और दूरगामी रोडमैप नजर नहीं आ रहा है।


















