बॉम्बे हाईकोर्ट ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) के पूर्व छात्र कामाख्या दास को राहत देते हुए 31 अगस्त तक उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह मामला 12 अक्टूबर 2025 को टीआईएसएस परिसर में दिल्ली विश्वविद्यालय के दिवंगत प्रोफेसर जीएन साईबाबा की याद में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम के समर्थन में कथित नारेबाजी से जुड़ा हुआ है। न्यायमूर्ति प्रफुल्ला खुबलकर की एकल पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि जांच एजेंसी आरोपी का मोबाइल फोन और लैपटॉप पहले ही अपने कब्जे में ले चुकी है, इसलिए वर्तमान चरण में आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आरोपी को पुलिस जांच में पूरी तरह से सहयोग करना होगा और निर्धारित तिथियों पर पुलिस स्टेशन के समक्ष उपस्थित होना होगा।
बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश और पुलिस उपस्थिति की शर्तें
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कामाख्या दास की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें राहत दी, लेकिन इसके साथ ही कुछ सख्त शर्तें भी लागू की हैं। अदालत के निर्देशों के अनुसार, दास को 19 अगस्त और 24 अगस्त को सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच संबंधित ट्रॉम्बे पुलिस स्टेशन में जांच अधिकारी के सामने पेश होना अनिवार्य होगा। इसके अतिरिक्त, जब भी जांच एजेंसी उन्हें पूछताछ या जांच प्रक्रिया के लिए समन भेजेगी, उन्हें पुलिस के समक्ष हाजिर होना पड़ेगा। पीठ ने कहा कि चूंकि आरोपी के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पहले ही जब्त किए जा चुके हैं, इसलिए फिलहाल हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं है। इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई अब 31 अगस्त को तय की गई है, तब तक के लिए अंतरिम संरक्षण प्रभावी रहेगा।
बचाव पक्ष की दलीलें और 'Gen-Z' का संदर्भ
अदालत में सुनवाई के दौरान कामाख्या दास की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई ने मजबूत दलीलें पेश कीं। उन्होंने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल ने जांच एजेंसी के बुलावे पर अब तक पांच बार पेश होकर जांच में पूरा सहयोग दिया है और उनका कोई भी पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है। एडवोकेट देसाई ने तर्क दिया कि किसी दिवंगत व्यक्ति के श्रद्धांजलि सभा में हिस्सा लेना अथवा 'रेस्ट इन पावर' जैसे शब्दों का प्रयोग करना अपने आप में कोई आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने नई पीढ़ी यानी जेन-ज़ी (Gen-Z) के युवाओं की मानसिकता और व्यवहार का उल्लेख करते हुए कहा कि इस उम्र के युवा अक्सर जोश और भावना में आकर ऐसी बातें कह देते हैं, जिनके व्यापक निहितार्थों या बारीकियों को वे शायद पूरी तरह समझते भी न हों। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या महज ऐसे बयानों या उपस्थिति के आधार पर किसी युवा छात्र को जेल भेज दिया जाना उचित होगा? उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कामाख्या दास अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और वर्तमान में एक नई जगह पर नौकरी कर रहे हैं, जिससे उनके भागने या जांच से बचने की कोई संभावना नहीं है।
टीआईएसएस परिसर की घटना और एफआईआर की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के परिसर में हुई एक घटना से शुरू हुआ था। टीआईएसएस के रजिस्ट्रार की आधिकारिक शिकायत के आधार पर ट्रॉम्बे पुलिस स्टेशन में इस संबंध में प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 12 अक्टूबर 2025 को कुल नौ छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय के दिवंगत प्रोफेसर जीएन साईबाबा को श्रद्धांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से संस्थान के परिसर में एकत्र हुए थे।
पुलिस में दर्ज मामले के मुताबिक, इस कार्यक्रम के दौरान मोमबत्तियां जलाई गई थीं, क्रांतिकारी कविताएं पढ़ी गई थीं और कथित तौर पर जेल में बंद कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई की मांग को लेकर नारेबाजी की गई थी। इस एफआईआर में नामजद होने के बाद कामाख्या दास ने गिरफ्तारी से बचने के लिए सत्र अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की थी। हालांकि, सत्र अदालत द्वारा उनकी याचिका खारिज कर दिए जाने के बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां से उन्हें यह राहत प्राप्त हुई है।
सरकारी वकील के दावे और 'हिमखंड' का सिद्धांत
दूसरी ओर, महाराष्ट्र सरकार की तरफ से पेश मुख्य लोक अभियोजक शिशिर हिराय ने कामाख्या दास को अंतरिम सुरक्षा प्रदान किए जाने का कड़ा विरोध किया। राज्य के वकील ने अदालत के समक्ष दावा किया कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री केवल परिसर में नारेबाजी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार एक गंभीर और बड़ी साजिश से जुड़े हो सकते हैं जिसकी गहन जांच की जा रही है।
सरकारी वकील ने फोरेंसिक जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि आरोपी के उपकरणों से कुछ हटाए गए (डिलीट किए गए) एप्लिकेशन और ऐसी डिजिटल पुस्तकें बरामद हुई हैं, जिनमें अलगाववाद, खालिस्तान आंदोलन और प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) की विचारधारा से संबंधित सामग्री मौजूद होने का दावा किया गया है। इसके साथ ही अभियोजन पक्ष ने यह संगीन आरोप भी लगाया कि जांच प्रक्रिया के दौरान आरोपी ने एक पुलिस अधिकारी को धमकी भी दी थी।
'हिमखंड' की उपमा और अभियोजन की मांग
अदालत में अपनी दलीलों को आगे बढ़ाते हुए मुख्य लोक अभियोजक शिशिर हिराय ने एक उपमा का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि जब किसी मामले में व्यापक और गहरी साजिश की जांच चल रही होती है, तो शुरुआती एफआईआर में दर्ज तथ्य केवल पूरी घटना का एक छोटा सा हिस्सा होते हैं। उन्होंने इसकी तुलना समुद्र में तैरते 'हिमखंड' (आइसबर्ग) से की और कहा कि एफआईआर में दिखाई देने वाली जानकारी पानी के ऊपर दिखने वाले छोटे से हिस्से के समान है, जबकि पानी के नीचे एक बहुत बड़ा हिस्सा छिपा हो सकता है। इसी आधार पर अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है और उन्हें अंतरिम राहत नहीं दी जानी चाहिए। बहरहाल, उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों के तर्कों का विश्लेषण करने के पश्चात दास को शर्तों के साथ 31 अगस्त तक गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान कर दी।



















