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प्रशांत महासागर में अल नीनो के उभार से कमजोर पड़ा मानसून, 2001 के बाद दर्ज हुई चौथी सबसे सूखी स्थितिमध्य प्रदेश
1 अक्तू॰ 2026, 7:06 am (25 मिनट पहले)· 0

प्रशांत महासागर में अल नीनो के उभार से कमजोर पड़ा मानसून, 2001 के बाद दर्ज हुई चौथी सबसे सूखी स्थिति

जून से सितंबर के दौरान देश भर में सामान्य से 13 फीसदी कम बरसात हुई, जिसमें अल नीनो प्रभाव और शुरुआती सूखे ने पूरे सीजन के वर्षा आंकड़ों को बुरी तरह प्रभावित किया।

देश भर में चार महीने तक चलने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसूनी दौर के समाप्त होने के बाद मौसम के आधिकारिक आंकड़े सामने आ चुके हैं। जून से सितंबर के दौरान भारत में दीर्घावधि औसत के मुकाबले केवल 87.4 फीसदी वर्षा दर्ज की गई। वर्ष 2001 के बाद के कालखंड पर नजर डालें तो मानसूनी सीजन में यह चौथी बार है जब देश ने इतनी गंभीर वर्षा की कमी का सामना किया है। उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में जून के महीने में पैदा हुई अल नीनो मौसमी प्रणाली इस सूखे मिजाज की सबसे बड़ी वजह बनकर उभरी, जो समय बीतने के साथ लगातार मजबूत होती चली गई।

प्रशांत महासागर का बढ़ता तापमान और अल नीनो का असर

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मौजूदा समय में अल नीनो चक्र काफी ताकतवर स्थिति में मौजूद है और इसके मार्च 2027 तक इसी प्रकार सक्रिय रहने के आसार हैं। इस वर्ष के पूरे सीजन में देश के भीतर 759.4 मिलीमीटर कुल वर्षा दर्ज की गई, जबकि सामान्य स्तर का पैमाना 868.6 मिलीमीटर माना जाता है। इस तरह वास्तविक आंकड़ा सामान्य मानक से 13 फीसदी कम साबित हुआ। इससे पहले 13 अप्रैल को जारी प्रारंभिक अनुमान में दीर्घावधि औसत की 92 फीसदी वर्षा का आकलन पेश किया गया था। बाद में 29 मई को संशोधित अनुमान पेश करते हुए चार फीसदी की संभावित मॉडल त्रुटि के साथ 90 फीसदी बारिश की उम्मीद जताई गई थी।

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जलवायु विज्ञान के नजरिए से देखें तो अल नीनो दरअसल ईएनएसओ यानी अल नीनो-दक्षिणी दोलन चक्र के तीन प्रमुख चरणों का एक हिस्सा है। यह प्रणाली धरती के तापमान को बढ़ाने का काम करती है और भारतीय उपमहाद्वीप में इसका सीधा संबंध मानसूनी घटाओं के कमजोर पड़ने से देखा जाता है। इसके उलट ला-नीना की स्थिति वातावरण को ठंडक देती है, जबकि तीसरी स्थिति पूरी तरह तटस्थ मानी जाती है।

महीने-दर-महीने वर्षा का उतार-चढ़ाव

अगर पूरे सीजन की महीनेवार स्थिति देखें तो बादलों की बेरुखी सबसे तीखी जून के दौरान रही, जहां बारिश का टोटा 35.4 फीसदी तक पहुंच गया था। इसके बाद अगस्त में 16.3 फीसदी की कमी देखी गई और सितंबर आते-आते यह घाटा सिमटकर 7.6 फीसदी रह गया। चार महीनों के इस चक्र में केवल जुलाई ही ऐसा इकलौता दौर साबित हुआ जब खेतों और कस्बों को सामान्य से एक फीसदी अधिक वर्षा का लाभ मिला।

कम दबाव के क्षेत्रों ने बचाई स्थिति

मौसम विज्ञान के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि मौसमी विक्षोभ सक्रिय न होते तो वर्षा की कमी का यह अंतर कहीं अधिक गहरा हो सकता था। उन्होंने जानकारी साझा की कि इस पूरे दौर में कुल 14 कम दबाव वाली प्रणालियां तैयार हुईं। इन प्रणालियों ने कुल 77 दिनों तक वातावरण में अपनी सक्रियता बनाए रखी, जबकि आमतौर पर यह गतिविधि मात्र 57 दिनों तक ही सीमित रहती है।

उत्तरी और पश्चिमी राज्यों से मानसूनी हवाओं की रवानगी

हवाओं के बदलते रुख के बीच मानसूनी तंत्र की वापसी की प्रक्रिया भी तेजी से आगे बढ़ रही है। डॉ. मृत्युंजय महापात्र के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के साथ-साथ पूरी दिल्ली से बादलों की विदाई पूरी हो चुकी है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और गुजरात के कई भूभागों से भी मानसूनी हवाएं अब लौट चुकी हैं।

सवाल-जवाब

इस वर्ष मानसूनी सीजन में कितनी बारिश दर्ज की गई?
इस मानसून देश में कुल 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जो सामान्य वर्षा 868.6 मिलीमीटर की तुलना में 13 फीसदी कम है।
दीर्घावधि औसत के लिहाज से बारिश का प्रतिशत कितना रहा?
पूरे सीजन में दीर्घावधि औसत की 87.4 फीसदी बारिश दर्ज की गई, जो वर्ष 2001 के बाद से चौथी सबसे कम वर्षा है।
बारिश में कमी की मुख्य वजह क्या रही?
उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में जून से लगातार मजबूत हो रही अल नीनो की स्थिति मानसूनी कमी का मुख्य कारण रही।
अल नीनो का प्रभाव कब तक बने रहने की संभावना है?
मौसम विभाग के मुताबिक अल नीनो की वर्तमान स्थिति के मार्च 2027 तक सक्रिय बने रहने की संभावना जताई गई है।
किस महीने में बारिश की सबसे भारी कमी दर्ज की गई?
जून के महीने में सबसे अधिक 35.4 फीसदी की कमी रही, जबकि जुलाई एकमात्र ऐसा महीना रहा जहां सामान्य से एक फीसदी अधिक पानी बरसा।
किन-किन क्षेत्रों से मानसूनी हवाओं की विदाई हो चुकी है?
पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पूरी दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश और गुजरात के कुछ हिस्सों से मानसूनी हवाओं की वापसी हो चुकी है।
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