देश के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में बड़े सुधार की तैयारी, केंद्र सरकार ने जारी किए नए लाइसेंसिंग और सुरक्षा नियमगॉल टेस्ट में चमके ऋषभ पंत, विदेशी सरजमीं पर सबसे ज्यादा छक्के जड़ने वाले बने नंबर-1 विकेटकीपरडिज्नी के D23 इवेंट में जुटोपिया 3 पर लगी मुहर, एनीमेशन सीरीज में होगी पक्षियों की नई एंट्रीउत्तर प्रदेश में बाइक पर ओवरलोडिंग को लेकर अखिलेश यादव ने जताई चिंता, लोगों से की सुरक्षित रहने की अपीलबलूच नेतृत्व ने डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग को भेजी गंभीर चिट्ठी, सुराब एयरस्ट्राइक के बाद अमेरिकी और चीनी हथियारों की सप्लाई रोकने की मांगगुजरात के सुल्तानाबाद में फार्महाउस शराब पार्टी पर छापा, 8 महिलाओं सहित 22 लोग हिरासत मेंशकुन शास्त्र के अनुसार सिर पर कौवा बैठना किस बात का संकेत माना जाता हैपिक्सार ने कोको 2 की पहली झलक दिखाई, 2029 में मिगुएल की आफ्टरलाइफ में होगी वापसीकोरापुट में अल्बिना गराडा की हत्या कर आंध्र प्रदेश में दफनाया शव, मोबाइल लोकेशन से खुला राजCFTC रिपोर्ट में विदेशी मुद्रा की रिपोजीशनिंग हावी, जिंसों के बाजार में दिखा मिला-जुला रुझान
चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय सशस्त्र बलों का 2047 रोडमैप तैयारभारत
15 अग॰ 2026, 7:24 pm (3 घंटे पहले)· 2

चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय सशस्त्र बलों का 2047 रोडमैप तैयार

भारत अपनी रक्षा व्यवस्था को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप ढाल रहा है, जिसमें थिएटर कमान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हाइपरसोनिक मिसाइलें और स्वदेशी विनिर्माण क्षमताएं शामिल हैं।

भारत की सामरिक स्थिति और उसकी सीमाओं पर मौजूद सुरक्षा समीकरण देश के सैन्य नियोजन में एक क्रांतिकारी बदलाव की मांग करते हैं। पूर्वी सीमा पर चीन पिछले दो दशकों से वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब अपना बुनियादी ढांचा तेजी से मजबूत कर रहा है। सभी मौसमों में खुली रहने वाली सड़कें, अग्रिम इलाकों में हवाई पट्टियां और सुसज्जित सीमावर्ती गांव इस बात का प्रमाण हैं कि बीजिंग बिना किसी प्रत्यक्ष संघर्ष के भी अपनी सैन्य मौजूदगी को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने में सक्षम है। गलवान घाटी की घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि सुदृढ़ इंफ्रास्ट्रक्चर की मदद से बहुत कम समय में भारी सैन्य बल की तैनाती की जा सकती है।

दूसरी ओर, पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान से पारंपरिक खतरों के साथ-साथ छद्म युद्ध और आतंकवादी नेटवर्क का निरंतर दबाव बना रहता है। ऐसी परिस्थिति में भारतीय सैन्य नेतृत्व को केवल एक मोर्चे पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय दोनों मोर्चों से एक साथ उठने वाली चुनौतियों से निपटने की रणनीति बनानी होगी। केवल अत्याधुनिक हथियार या लड़ाकू विमान हासिल कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के लिए गोला-बारूद के पर्याप्त भंडार और त्वरित आपूर्ति श्रृंखला का होना अति आवश्यक है। यदि युद्ध के तीसरे या चौथे सप्ताह में आपूर्ति बाधित होती है तो शुरुआती बढ़त निष्प्रभावी हो सकती है।

ये भी पढ़ें

त्रि-सेवा एकीकरण और थिएटर कमान की ओर बढ़ते कदम

आधुनिक समय में युद्ध केवल सीमाओं पर टैंकों और पैदल सेना की भिड़ंत तक सीमित नहीं रह गए हैं। साइबर हमले, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर चोट, आर्थिक दबाव और सूचना युद्ध ने सुरक्षा आयामों को पूरी तरह बदल दिया है। भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता 1999 के कारगिल युद्ध के बाद ही रेखांकित कर दी गई थी। कारगिल समीक्षा समिति ने तीनों सेनाओं के पृथक संचालन को एक बड़ी चुनौती माना था। हालांकि, सात दशकों से अधिक पुरानी कार्यप्रणाली और संगठनात्मक संरचना को अचानक बदलना व्यावहारिक नहीं था।

वर्ष 2020 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस के पद का सृजन इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित हुआ। इसका प्राथमिक उद्देश्य तीनों सेवाओं के बीच संयुक्त नियोजन और संसाधन आवंटन में सामंजस्य स्थापित करना था। वर्तमान में अगला सबसे बड़ा कदम थिएटर कमान का गठन है। अलग-अलग संचालन क्षेत्रों में तीनों सेनाओं की इकाइयों को एक ही कमांडर के अधीन लाना एक जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए सैन्य कमान की व्यवस्था, रणनीतिक सिद्धांतों और बल तैनाती में मौलिक सुधार किए जा रहे हैं, जो यह दर्शाते हैं कि भारत अब कागजी सुधारों से आगे बढ़कर व्यावहारिक क्रियान्वयन पर ध्यान दे रहा है।

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी आपूर्ति श्रृंखला

आत्मनिर्भर भारत की पहल को अक्सर केवल कारखानों की स्थापना, रोजगार सृजन और रक्षा निर्यात से जोड़कर देखा जाता है, परंतु इसका वास्तविक महत्व युद्धकालीन आत्मनिर्भरता में निहित है। कोई भी राष्ट्र अपने रक्षा उपकरणों, मिसाइलों और गोला-बारूद की निरंतर आपूर्ति के बिना लंबा संघर्ष नहीं झेल सकता। यदि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों या भू-राजनीतिक दबावों के कारण विदेशी आपूर्ति रुक जाती है, तो सैन्य क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है।

हालिया वैश्विक संघर्षों में यह स्पष्ट देखा गया है कि बाहरी निर्माताओं पर अत्यधिक निर्भरता संकट के समय बाधा बन सकती है। भारत, जो अतीत में दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में गिना जाता था, अब मिसाइल प्रणालियों, तोपों, उन्नत रडार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरणों का स्वदेशी स्तर पर निर्माण कर रहा है। इन उपकरणों का निर्यात न केवल देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की सामरिक संप्रभुता को भी स्थापित करता है।

प्रौद्योगिकी, निर्णय क्षमता और अंतरिक्ष में बढ़त

वर्ष 2047 तक भारतीय सशस्त्र बलों को केवल आकार में बड़ा होने के बजाय प्रौद्योगिकी, गतिशीलता और सूचनात्मक सर्वोच्चता में अग्रणी होना होगा। भविष्य के युद्धों में विजय इस बात पर निर्भर करेगी कि कौन सी सेना डेटा का विश्लेषण करके तेजी से निर्णय लेती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग सेंसर से प्राप्त विशाल डेटा को सेकंडों में संसाधित करने के लिए किया जाएगा, जिससे लक्ष्य तय करने और उस पर सटीक प्रहार करने की प्रक्रिया अत्यंत तीव्र हो जाएगी।

निर्णय लेने की गति के साथ-साथ स्वतंत्र नेविगेशन प्रणाली का होना भी अनिवार्य है। कारगिल युद्ध के समय विदेशी जीपीएस सेवा तक पहुंच न मिल पाना एक महत्वपूर्ण सीख था। इस अनुभव के बाद स्वदेशी प्रणाली जैसे NavIC को सैन्य मानकों के अनुरूप अधिक मजबूत और सटीक बनाया जा रहा है। इसी प्रकार, अंतरिक्ष भी युद्ध का नया क्षेत्र बन चुका है। निगरानी उपग्रहों, सुरक्षित उपग्रह संचार और अंतरिक्ष-आधारित प्रणालियों की सुरक्षा यह सुनिश्चित करेगी कि जमीन, समुद्र और वायु क्षेत्र में वास्तविक समय की जानकारी बिना किसी रुकावट के प्राप्त होती रहे।

आक्रामक प्रहार प्रणालियां और एकीकृत वायु रक्षा

दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए दूरस्थ क्षेत्रों में सटीक प्रहार करने वाली प्रणालियों का होना आवश्यक है। क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलें, लोइटरिंग म्यूनिशन और लंबी दूरी के हथियार भारतीय सैनिकों और पायलटों को सीधे जोखिम में डाले बिना दुश्मन के ठिकानों को नष्ट करने की क्षमता प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, यूक्रेन और नागोर्नो-काराबाख के युद्धों ने सिद्ध किया है कि सस्ते ड्रोन और उनके झुंड यानी स्वॉर्म ड्रोन महंगे टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को भी तबाह कर सकते हैं।

तदनुसार, भारत न केवल उन्नत ड्रोन विकसित कर रहा है बल्कि मजबूत एंटी-ड्रोन प्रणालियों पर भी काम कर रहा है। भविष्य में एक समर्पित ड्रोन कोर की स्थापना भी संभावित है। इसके साथ ही हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल और अत्यधिक तीव्र गति से दिशा बदलने वाली मिसाइलें पारंपरिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों को चकमा देने में सक्षम हैं। यद्यपि केवल आक्रामक क्षमता पर्याप्त नहीं है। शहरों, रणनीतिक परिसंपत्तियों और औद्योगिक केंद्रों की रक्षा के लिए एक अभेद्य एकीकृत वायु और मिसाइल रक्षा कवच का निर्माण समान रूप से महत्वपूर्ण है।

हिंद महासागर में समुद्री नियंत्रण और साइबर सुरक्षा

हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण भारत के लिए समुद्री सुरक्षा सर्वोपरि हो गई है। पश्चिम में होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर पूर्व में मलक्का जलडमरूमध्य तक की समुद्री गतिविधियों पर निरंतर नजर रखना भारत के आर्थिक और सामरिक हितों के लिए आवश्यक है। इसके लिए पनडुब्बी बेड़े का आधुनिकीकरण, विमानवाहक पोतों की परिचालन क्षमता में वृद्धि और लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमानों की तैनाती तेजी से की जा रही है।

डिजिटल युग में साइबर क्षेत्र भी एक प्रमुख मोर्चे के रूप में उभरा है। साइबर हमले भौतिक विनाश किए बिना भी बिजली आपूर्ति, जल वितरण, बैंकिंग प्रणाली और सैन्य संचार नेटवर्क को पूरी तरह ठप कर सकते हैं। भविष्य के युद्ध की शुरुआत किसी मिसाइल दागने से पहले महत्वपूर्ण राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर को प्रभावित करने वाले साइबर हमले से हो सकती है। इसलिए भारत को ऐसे साइबर विशेषज्ञों का ढांचा तैयार करना होगा जो दुश्मन के नेटवर्क को बेअसर करने के साथ-साथ स्वदेशी प्रणालियों को पूरी तरह सुरक्षित रख सकें।

भविष्य का विनिर्माण और कठिन क्षेत्रों में रोबोटिक्स

सैन्य उपकरणों और उन्नत तकनीक का प्रभाव तभी बना रह सकता है जब विनिर्माण क्षेत्र संकट की स्थिति में उत्पादन दर बढ़ाने में सक्षम हो। भारत को एक ऐसी रक्षा उत्पादन प्रणाली तैयार करनी होगी जो महीनों तक चलने वाले युद्ध के दौरान भी आवश्यक सामग्रियों की आपूर्ति निर्बाध रूप से जारी रख सके। युद्ध भंडार का स्तर ऐसा होना चाहिए जो केवल कुछ हफ्तों के संघर्ष तक सीमित न रहकर किसी भी लंबी अनिश्चितता का सामना कर सके।

हिमालयी और ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में रोबोटिक्स और स्वचलित वाहनों का उपयोग एक नया मोड़ ला रहा है। मानवरहित धरातलीय वाहन सैनिकों तक रसद पहुंचाने, खदानों को साफ करने और टोही अभियानों को अंजाम देने में सक्षम हैं। लगभग 80 वर्ष पूर्व जहां भारत अपनी सैन्य आवश्यकताओं के लिए विदेशी प्राथमिक प्रणालियों पर निर्भर था, वहीं आज देश आधुनिक हथियारों का निर्माण और निर्यात कर रहा है। 2047 का विकसित भारत केवल एक आर्थिक महाशक्ति नहीं होगा, बल्कि एक ऐसा राष्ट्र होगा जो अपने थल, जल, नभ, अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्र की संप्रभुता की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम होगा।

सवाल-जवाब

भारतीय सेना के लिए 2047 योजना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य वर्ष 2047 तक भारत को प्रौद्योगिकी, आत्मनिर्भरता, थिएटर कमान और आधुनिक हथियारों से सुसज्जित एक अग्रणी सैन्य महाशक्ति बनाना है।
थिएटर कमान प्रणाली क्या है?
थिएटर कमान के तहत थल सेना, नौसेना और वायुसेना की इकाइयों को एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में एक ही संयुक्त कमांडर के अधीन संचालित किया जाता है।
कारगिल समीक्षा समिति की क्या भूमिका रही है?
1999 के कारगिल युद्ध के बाद बनी इस समिति ने तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय और एकीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया था, जिससे सीडीएस पद का रास्ता साफ हुआ।
सैन्य दृष्टिकोण से NavIC क्यों महत्वपूर्ण है?
NavIC भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली है जो युद्ध के समय विदेशी जीपीएस पर निर्भरता खत्म करके सटीक सैन्य अभियानों में मदद करती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR