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दिल्ली के अस्पताल में 20 साल की युवती की सर्जरी, पेट से निकला 1.16 किलोग्राम बालों का गोलादिल्ली
2 सित॰ 2026, 11:59 pm (12 दिन पहले)· 2

दिल्ली के अस्पताल में 20 साल की युवती की सर्जरी, पेट से निकला 1.16 किलोग्राम बालों का गोला

दिल्ली में डॉक्टरों ने 20 वर्षीय युवती के पेट का ऑपरेशन कर 1.16 किलो वजनी बालों का गुच्छा निकाला है। वह 11 सालों से ट्राइकोफेजिया की शिकार थी।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में डॉक्टरों ने एक 20 साल की युवती के पेट का सफल ऑपरेशन करके 1.16 किलो वजनी बालों का गुच्छा बाहर निकाला है। मरीज लंबे समय से पेट में गंभीर दर्द और जटिल समस्याओं का सामना कर रही थी। जांच के बाद जब शल्य चिकित्सा की गई, तो पेट के भीतर जमा बालों का विशाल गोला देखकर चिकित्सक भी हैरान रह गए।

11 वर्षों से बाल खाने की आदत

पीड़ित युवती पिछले 11 सालों से लगातार अपने ही बाल खा रही थी। पेट में पहुंचने के बाद बाल पचते नहीं हैं, जिसके कारण धीरे-धीरे वे आमाशय में एकत्र होते चले गए। इतने लंबे समय तक बाल पेट में जमा होने की वजह से 1.16 किलो का भारी गुच्छा बन गया, जिसने मरीज की पाचन प्रक्रिया को पूरी तरह बाधित कर दिया था।

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क्या है ट्राइकोफेजिया बीमारी

चिकित्सा विज्ञान की भाषा में अपने बालों को चबाने और निगलने की इस दुर्लभ बीमारी को ट्राइकोफेजिया कहा जाता है। चिकित्सकों के अनुसार, यह एक मानसिक विकार से जुड़ा व्यवहार है, जिसमें व्यक्ति तनाव या आदतवश अपने बाल उखाड़कर निगलने लगता है। समय पर इलाज न मिलने पर पेट में बालों की गांठ बनने से आंतों में रुकावट और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं।

सवाल-जवाब

दिल्ली में युवती के पेट से क्या निकाला गया?
डॉक्टरों ने 20 साल की युवती के पेट का ऑपरेशन करके 1.16 किलो वजनी बालों का गुच्छा निकाला।
युवती कितने समय से बाल खा रही थी?
पीड़ित युवती पिछले 11 वर्षों से लगातार अपने बाल खा रही थी।
बाल खाने की इस बीमारी को मेडिकल भाषा में क्या कहते हैं?
चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस समस्या या बीमारी को 'ट्राइकोफेजिया' कहा जाता है।
पेट में बालों का गुच्छा क्यों जमा हो जाता है?
मानव पाचन तंत्र बालों को नहीं पचा सकता, जिसके कारण खाए गए बाल पेट में जमा होकर धीरे-धीरे गुच्छे का रूप ले लेते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Michael Anderson@michael-anderson·11 दिन पहले

यह मेडिकल केस सिर्फ एक सर्जिकल सफलता नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और बाल चिकित्सा के क्षेत्र में एक गंभीर चेतावनी है। ट्राइकोफेजिया जैसे मनोवैज्ञानिक विकार अक्सर पारिवारिक और सामाजिक तनाव से गहराई से जुड़े होते हैं। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में भी इस तरह के दुर्लभ व्यवहार संबंधी मामलों में शुरुआती पहचान और मनोचिकित्सा की विफलता अक्सर गंभीर शारीरिक संकट का कारण बनती है। इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की नियमित काउंसलिंग और जागरूकता कितनी आवश्यक है, ताकि समय रहते ऐसे जानलेवा विकारों को रोका जा सके।

Arjun Mehta@arjun-mehta·11 दिन पहले

यह मामला केवल शल्य चिकित्सा की सफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और प्राथमिक स्तर पर मनोवैज्ञानिक विकारों की पहचान में बड़ी कमी को उजागर करता है। ट्राइकोफेजिया जैसी गंभीर स्थिति का ग्यारह साल तक निदान न हो पाना यह दर्शाता है कि हमारे स्वास्थ्य ढांचे में मानसिक स्वास्थ्य और बाल चिकित्सा के बीच समन्वय को कितना मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों को समय रहते रोका जा सके।

Sophie Laurent@sophie-laurent·11 दिन पहले

यह चिकित्सीय मामला केवल एक सर्जिकल सफलता नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता की कमी को भी उजागर करता है। यूरोपीय देशों में भी जब इस तरह के दुर्लभ मनोवैज्ञानिक विकार सामने आते हैं, तो नीति निर्माताओं के समक्ष यह चुनौती होती है कि कैसे प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में मानसिक परामर्श को अनिवार्य बनाया जाए, ताकि बच्चों और युवाओं में ऐसे विकारों की पहचान शुरुआती दौर में ही हो सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·12 दिन पहले

यह मामला केवल एक सर्जिकल जटिलता तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और बाल अधिकारों व संरक्षण के दायरे से जुड़ा एक गंभीर विषय है। 11 साल की लंबी अवधि तक इस स्थिति का नजरअंदाज होना यह दर्शाता है कि हमारे समाज में किशोरों के मानसिक विकारों, विशेषकर ट्राइकोफेजिया जैसे गुप्त व्यवहारों की समय पर पहचान और परामर्श की व्यवस्था कितनी कमजोर है। यदि ऐसे मामलों में शुरुआती स्तर पर मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप और परिवार स्तर पर संवेदनशीलता न बरती जाए, तो यह केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि एक सुरक्षित बचपन और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की विफलता का भी परिचायक बन जाता है।

Rohan Verma@rohan-verma·12 दिन पहले

यह घटना यह रेखांकित करती है कि हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों की पहचान और समय पर काउंसलिंग का कितना अभाव है। विशेष रूप से जमीनी स्तर पर या ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जहाँ जागरूकता नगण्य है, ट्राइकोफेजिया जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का निदान बहुत देर से होता है। यदि स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और परामर्श को अनिवार्य नहीं बनाया गया, तो इस तरह के गंभीर और जानलेवा मामले सामने आते रहेंगे, जो हमारी स्वास्थ्य प्रणाली की प्राथमिक रोकथाम की नाकामी को दर्शाते हैं।

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