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दिल्ली के सरकारी स्कूल में बच्ची की मौत, किताब न लाने पर सजा मिलने का आरोपदिल्ली
31 अग॰ 2026, 11:28 pm (14 दिन पहले)· 2

दिल्ली के सरकारी स्कूल में बच्ची की मौत, किताब न लाने पर सजा मिलने का आरोप

ईस्ट विनोद नगर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली दस साल की छात्रा की इलाज के दौरान मौत हो गई। परिजनों ने आरोप लगाया है कि किताब न लाने पर शिक्षिका ने उसे सजा दी थी, जिसके बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के ईस्ट विनोद नगर इलाके में स्थित एक सरकारी विद्यालय से एक बेहद दुखद और हैरान करने वाली घटना प्रकाश में आई है। यहाँ दस वर्ष की एक छोटी बच्ची की अस्पताल में उपचार के दौरान मौत हो गई, जिसके बाद परिजनों और स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। इस घटना से आक्रोशित परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों ने सोमवार की सुबह स्कूल के मुख्य द्वार के सामने जोरदार प्रदर्शन किया। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए दिल्ली प्रशासन ने इस पूरे मामले की बिना किसी पक्षपात के त्वरित जाँच के आदेश दे दिए हैं।

परिजनों के गंभीर आरोप और घटनाक्रम

मृतका के परिजनों का कहना है कि यह पूरा वाकया 22 जुलाई का है। परिवार के मुताबिक, बच्ची कल्याणपुरी स्थित अपने आवास से सुबह पूरी तरह स्वस्थ और ठीक हालत में विद्यालय के लिए रवाना हुई थी। आरोप लगाया गया है कि कक्षा के भीतर किताब न ले जाने की वजह से शिक्षिका ने उसे डाँटा और दोनों हाथ ऊपर उठाकर कक्षा के पीछे खड़े रहने की सजा दी। परिजनों का दावा है कि इस मानसिक और शारीरिक डर के कारण बच्ची की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। इसके अलावा यह आरोप भी सामने आया है कि जब अन्य छात्र और अध्यापिका कक्षा से बाहर चले गए, तब बच्ची कमरे के भीतर ही बंद रह गई। बाद में जब उसके दादा और दादी स्कूल पहुँचे, तो वह खुले प्रांगण में अचेत अवस्था में मिली। होश में आने पर उसने अपनी आपबीती सुनाई और दोबारा बेहोश हो गई, जिसके बाद उसे तत्काल चिकित्सालय ले जाया गया।

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चिकित्सकों और अस्पतालों का पक्ष

तबीयत बिगड़ने के बाद बच्ची को पहले लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल ले जाया गया और बाद में बेहतर इलाज के लिए इहबास (IHBAS) में भर्ती कराया गया, जहाँ 27 अगस्त को उसने दम तोड़ दिया। हालांकि, इस मामले में डॉक्टरों ने एक अलग चिकित्सीय पहलू रखा है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, यह बच्ची पिछले आधे साल से SSPE यानी सबएक्यूट स्क्लेरोसिंग पैनएनसेफलाइटिस नामक एक बेहद जटिल और दुर्लभ मस्तिष्क संबंधी बीमारी से ग्रस्त थी। यह बीमारी मूल रूप से खसरे के संक्रमण के कारण होती है और इसमें जान जाने का खतरा पंचानवे प्रतिशत तक होता है। डॉक्टरों का तर्क है कि इसी गंभीर बीमारी के बढ़ने की वजह से बच्ची की मृत्यु हुई।

प्रशासनिक कार्रवाई और नए सुरक्षा कदम

मामले के तूल पकड़ने के बाद दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशिष सूद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के माध्यम से यह जानकारी साझा की कि घटना की पूरी और निष्पक्ष जाँच के निर्देश दे दिए गए हैं। जाँच को प्रभावित होने से बचाने के लिए संबंधित शिक्षिका का फौरन तबादला कर दिया गया है। सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि यदि जाँच के दौरान किसी भी स्तर पर किसी की भी लापरवाही सामने आती है, तो उनके खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। इस हृदयविदारक घटना से सबक लेते हुए प्रशासन ने छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के लिए एक बड़ा निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घोषणा की है कि एक पायलट प्रोजेक्ट के अंतर्गत दिल्ली के एक सौ सरकारी विद्यालयों में विशेष मेडिकल रूम स्थापित किए जाएंगे। इन कक्षों में विद्यार्थियों को प्राथमिक उपचार, बुनियादी स्वास्थ्य सहायता और परामर्श की सुविधा मिलेगी। इस महत्वाकांक्षी योजना के वास्ते पाँच करोड़ रुपये का वित्तीय आवंटन किया गया है, जिसे भविष्य में कुल एक हजार छियासी स्कूलों तक विस्तारित किया जाएगा।

सवाल-जवाब

यह घटना किस स्कूल में हुई?
यह घटना दिल्ली के ईस्ट विनोद नगर स्थित एक सरकारी स्कूल में हुई।
परिजन क्या आरोप लगा रहे हैं?
परिजनों का आरोप है कि किताब न लाने पर शिक्षिका ने बच्ची को हाथ ऊपर कर खड़े रहने की सजा दी थी।
बच्ची का इलाज किन अस्पतालों में हुआ?
बच्ची को पहले लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल और बाद में इहबास (IHBAS) में भर्ती कराया गया था।
डॉक्टरों ने मौत का क्या कारण बताया है?
डॉक्टरों के अनुसार बच्ची SSPE नाम की दुर्लभ दिमागी बीमारी से पीड़ित थी, जिसके कारण उसकी मौत हुई।
सरकार ने इस मामले में क्या कदम उठाया है?
सरकार ने निष्पक्ष जाँच के आदेश दिए हैं और संबंधित शिक्षिका का तुरंत ट्रांसफर कर दिया है।
स्कूलों में स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए क्या घोषणा की गई है?
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दिल्ली के 100 सरकारी स्कूलों में मेडिकल रूम बनाने की घोषणा की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·13 दिन पहले

यह मामला चिकित्सीय जटिलता और प्रशासनिक संवेदनशीलता का एक संवेदनशील चौराहा है। मेडिकल रिपोर्ट में सबएक्यूट स्क्लेरोसिंग पैनएनसेफलाइटिस (SSPE) जैसी दुर्लभ और घातक न्यूरोलॉजिकल बीमारी का उल्लेख किया गया है, जो खसरे के संक्रमण से जुड़ी होती है और जिसमें 95 प्रतिशत तक मृत्यु दर का जोखिम होता है। एक हेल्थ रिपोर्टर के रूप में, यह घटना इस बात को रेखांकित करती है कि बच्चों में गंभीर और छिपी हुई चिकित्सीय स्थितियों का समय पर निदान कितना आवश्यक है। साथ ही, स्कूल के माहौल में बच्चों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक दबाव और तनाव को कम करने के लिए मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह के तनावपूर्ण हालातों से बचा जा सके।

Arjun Mehta@arjun-mehta·13 दिन पहले

यह घटना सरकारी स्कूलों में स्टूडेंट वेलफेयर, टीचर-स्टूडेंट बॉन्डिंग और स्कूल सेफ्टी प्रोटोकॉल पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जब एक तरफ मेडिकल रिपोर्ट्स दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारी एसएसपीई की ओर इशारा कर रही हैं, तो दूसरी तरफ परिजनों के शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना के आरोप प्रशासनिक जवाबदेही को कटघरे में लाते हैं। इस संवेदनशील मामले में निष्पक्ष जाँच के बाद मिलने वाले निष्कर्ष ही तय करेंगे कि शिक्षा विभाग बच्चों की सुरक्षा और स्कूलों में मनोवैज्ञानिक माहौल को सुधारने के लिए भविष्य में क्या नीतिगत कदम उठाता है।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·13 दिन पहले

अर्जुन मेहता के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, अमेरिका और वैश्विक स्तर पर भी ऐसे मामलों में स्कूल सुरक्षा और बाल मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य नीति की समीक्षा करना एक अनिवार्य प्रक्रिया बन चुका है। जब एक तरफ दुर्लभ चिकित्सीय स्थिति और दूसरी तरफ अनुशासन के नाम पर अत्यधिक दबाव के आरोप आमने-सामने हों, तो पारदर्शी संस्थागत जाँच और सख्त नीतिगत सुधार ही भविष्य में ऐसी त्रादस्यों को रोक सकते हैं। अमेरिका संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि शिक्षण संस्थानों में बच्चों की सुरक्षा और मानसिक कल्याण के लिए जवाबदेही तय करने वाले कड़े प्रोटोकॉल अब वैश्विक स्तर पर एक बड़ी आवश्यकता बन गए हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·13 दिन पहले

यह घटना स्कूली अनुशासन और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के बीच के नाजुक संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जहाँ एक ओर परिजनों ने शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया है, वहीं चिकित्सा रिपोर्ट में दुर्लभ बीमारी का जिक्र स्थिति को जटिल बनाता है। ऐसे मामलों में प्रशासनिक जाँच पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए ताकि बच्चों की सुरक्षा और शिक्षकों की जवाबदेही दोनों सुनिश्चित हो सकें।

Karan Malhotra@karan-malhotra·13 दिन पहले

एक क्राइम रिपोर्टर के रूप में मेरा मानना है कि इस मामले में कानूनी और फोरेंसिक जाँच का रुख अब पुलिस की भूमिका और विसरा रिपोर्ट पर टिकेगा। आईपीसी की संबंधित धाराओं और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के प्रावधानों के तहत यह देखना अहम होगा कि शिक्षिका के कथित कृत्य और बच्ची की मेडिकल स्थिति के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित हो पाता है या नहीं। पुलिस को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या प्रताड़ना ने गंभीर बीमारी से जूझ रही बच्ची की स्थिति को और बिगाड़ा था।

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