राजधानी की लाइफलाइन कही जाने वाली ट्रेन में सफर करते समय दरवाजे दायीं तरफ खुलेंगे की गंभीर और जानी-पहचानी आवाज हर यात्री के कानों में रोज पड़ती है। कई दशकों से यात्रियों का मार्गदर्शन कर रही इस प्रतिष्ठित ध्वनि के पीछे का चेहरा दूरदर्शन के जाने-माने एंकर और वॉइस आर्टिस्ट शम्मी नारंग हैं। हाल ही में यही ऐतिहासिक आवाज एक बेहद निजी और दिल छू लेने वाले पारिवारिक अनुभव का जरिया बन गई, जब उन्होंने अपने छोटे पोते को पहली बार मेट्रो की सैर कराई।
गोद में दादा और स्पीकर से आती वही आवाज
शम्मी नारंग अपने नन्हे पोते रुशान को पहली बार मेट्रो ट्रेन की यात्रा पर लेकर निकले थे। घर में अपने दादू के साथ खेलने और रोज उनसे बातें करने वाला रुशान उस वक्त पूरी तरह हैरान रह गया, जब वही जानी-पहचानी आवाज अचानक मेट्रो के डिब्बे में लगे स्पीकरों से गूंज उठी। बच्चा उस वक्त खुद अपने दादा की गोद में बैठा हुआ था, लेकिन अपने सामने मौजूद शख्स की आवाज को ट्रेन की आधिकारिक घोषणा के रूप में सुनकर वह चकित होकर इधर-उधर डिब्बे में देखने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि जो आवाज वह सिर्फ घर की चारदीवारी में सुनता था, वह इस विशाल सार्वजनिक ट्रेन में कैसे बोल रही है।
पीढ़ियों के सफर पर भावुक हुए शम्मी नारंग
इस यादगार सफर के बाद शम्मी नारंग ने एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए अपने जज्बात बयां किए। उन्होंने कहा, "मुझे बहुत गर्व है कि मेरी आवाज एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाएगी।"
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने साझा किया कि वह खुद इन ट्रेनों में हमेशा सफर नहीं कर पाएंगे, लेकिन उनकी यह आवाज विरासत के रूप में जीवित रहेगी। उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि यह आवाज न सिर्फ उनके पोते रुशान तक, बल्कि भविष्य में शायद उसके बच्चों और पोतों तक तथा उससे भी आगे कई पीढ़ियों तक इसी तरह सफर करती रहेगी। नन्हे बच्चे के लिए यह पहला अनुभव जितना अचरज भरा था, परिवार के लिए उतना ही भावुक और यादगार बन गया।
एक आवाज जो बन चुकी है शहर की पहचान
दिल्ली मेट्रो की हिंदी उद्घोषणाओं को अपनी आवाज देने वाले शम्मी नारंग की यह ध्वनि अब केवल एक निर्देश भर नहीं है, बल्कि करोड़ों मुसाफिरों की दैनिक दिनचर्या का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। कोच के भीतर जब भी कोई सूचना प्रसारित होती है, तो लोग बिना देखे ही उस आवाज की गंभीरता और स्पष्टता को पहचान लेते हैं। ऐसे में जब परिवार की नई पीढ़ी ने सार्वजनिक व्यवस्था में अपने ही बुजुर्ग की मौजूदगी को महसूस किया, तो यह क्षण एक पारिवारिक विरासत के खूबसूरत पड़ाव में तब्दील हो गया।




















