राजस्थान के नागौर जिले के खरनाल गांव में लोकदेवता वीर तेजाजी महाराज की पावन जन्मस्थली पर एक अद्वितीय और भव्य तीर्थ स्थल आकार ले रहा है। देश भर के श्रद्धालुओं के बीच यह नया निर्माण अपनी बेमिसाल वास्तुकला, पारंपरिक भारतीय शिल्प और आधुनिक इंजीनियरिंग के संतुलन के कारण व्यापक चर्चा बटोर रहा है। पूरे परिसर के निर्माण कार्य पर लगभग 200 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान तय किया गया है। इस निर्माण की मुख्य पहचान यह है कि पूरी संरचना में किसी भी अन्य पत्थर या मिश्रित सामग्री की जगह सिर्फ मकराना के शुद्ध सफेद संगमरमर का ही प्रयोग किया जा रहा है। विश्व प्रसिद्ध मकराना मार्बल की स्वाभाविक चमक और मजबूती इस पूरे मंदिर परिसर को एक अलौकिक रूप प्रदान कर रही है।
अयोध्या के शिल्पकार रमजान के हाथों में तराशने की कमान
इस ऐतिहासिक मंदिर के निर्माण और नक्काशी की निगरानी देश के बेहद अनुभवी शिल्पियों के हाथों में सौंपी गई है। अयोध्या में भगवान रामलला के भव्य गर्भगृह के निर्माण कार्य में अपने बेजोड़ हुनर का प्रदर्शन कर चुके मकराना के जाने-माने शिल्पी रमजान इस पूरे प्रोजेक्ट के मुख्य शिल्पी के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। पत्थरों को तराशने से लेकर दीवारों और खंभों पर बारीक कलाकृतियां उकेरने का काम उनकी सीधी देखरेख में चल रहा है। निर्माण प्रगति की बात करें तो अब तक पूरे मंदिर का करीब 35 से 40 प्रतिशत काम मुकम्मल हो चुका है। बेस और मुख्य ढांचे के बाद अब अगले चरण में मंदिर के भव्य शिखर, विशाल गुंबद और ऊपरी संरचना को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
सीमेंट और बजरी के बिना तांबे-पीतल की इंटरलॉकिंग तकनीक
मंदिर की संरचना को सदियों तक अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए इसकी नींव बेहद सुदृढ़ रखी गई है। धरातल पर लगभग 32 फीट गहरी मजबूत नींव तैयार की गई है, जिसका करीब 25 फीट हिस्सा जमीन के अंदर सुरक्षित है जबकि 7 फीट हिस्सा सतह से ऊपर उठाया गया है। इसी आधारशिला के ऊपर अब तक मंदिर का लगभग 20 फीट ऊंचा मुख्य ढांचा खड़ा किया जा चुका है। निर्माण प्रक्रिया की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि इसमें सीमेंट, रेत या बजरी का रत्ती भर भी उपयोग नहीं किया गया है। प्राचीन भारतीय मंदिर निर्माण शैली को अपनाते हुए मकराना संगमरमर की भारी शिलाओं को तांबे और पीतल की मजबूत पत्तियों के जरिए इंटरलॉकिंग तकनीक से एक-दूसरे के साथ मजबूती से जोड़ा जा रहा है, जिससे भूकंप या मौसमी बदलावों का असर ढांचे पर न पड़े।
108 फीट की ऊंचाई और 306 कलात्मक स्तंभों का वैभव
परियोजना के मानचित्र के अनुसार, मुख्य मंदिर तीन मंजिला होगा और इसकी कुल ऊंचाई लगभग 108 फीट प्रस्तावित की गई है। दूर से ही दिखाई देने वाला इसका गगनचुंबी शिखर श्रद्धालुओं को सहज ही आकर्षित करेगा। पूरे मंदिर में कुल 306 कलात्मक स्तंभ स्थापित किए जा रहे हैं। पत्थरों की तैयारी के लिए मकराना में एक विशेष कार्यशाला बनाई गई है, जहां मुख्य शिल्पी रमजान के मार्गदर्शन में करीब 100 कुशल कारीगर लगातार संगमरमर को तराशने में जुटे हैं। इसके साथ ही खरनाल स्थित मुख्य कार्यस्थल पर भी 15 से 20 विशेषज्ञ कारीगर पत्थरों को सही क्रम में बिठाने और धातु की इंटरलॉकिंग जोड़ने का काम कर रहे हैं। अब तक मकराना की खदानों से तराशकर लगभग 17 से 18 हजार घनफीट मार्बल खरनाल पहुंचाया जा चुका है, जबकि पूरे निर्माण में कुल मिलाकर लगभग एक लाख घनफीट सफेद संगमरमर की खपत होने का अनुमान है।
सोमनाथ, अयोध्या और दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली का अनूठा संगम
खरनाल में बन रहे इस पावन धाम की बनावट में देश के कई प्रतिष्ठित तीर्थों की स्थापत्य कला का सुंदर समन्वय दिखाई देगा। मंदिर का मुख्य गर्भगृह ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर की भव्य वास्तुकला से प्रेरित होकर गढ़ा जा रहा है, तो वहीं इसके गगनचुंबी शिखर में सांवरिया सेठ मंदिर की भव्यता और दिव्यता समाहित की जा रही है। मंदिर के भव्य सिंहद्वार यानी मुख्य प्रवेश द्वार की रूपरेखा अयोध्या के राम मंदिर के मुख्य द्वार की बनावट से मेल खाती तैयार की गई है। इसके अलावा 306 खंभों पर दक्षिण भारत की प्रसिद्ध द्रविड़ शैली की नक्काशी देखने को मिलेगी, जिन पर लोकदेवता वीर तेजाजी महाराज के त्याग, शौर्य और चमत्कारों से जुड़े प्रसंगों को सजीव रूप में उकेरा जा रहा है।
99 प्रतिशत कैल्शियम की शुद्धता, पीला नहीं पड़ेगा संगमरमर
मुख्य शिल्पी रमजान ने इस पत्थर की विशेषताओं पर रोशनी डालते हुए स्पष्ट किया है कि मंदिर में लगाया जा रहा मकराना का संगमरमर अत्यंत दुर्लभ और उच्च कोटि का है। इस सफेद पत्थर में लगभग 99 प्रतिशत प्राकृतिक कैल्शियम मौजूद है, जबकि लोहे यानी आयरन का अंश इसमें बिल्कुल नगण्य है। लोहे का अंश न होने के कारण हवा और पानी के संपर्क में आने पर भी इस पत्थर पर पीलापन नहीं चढ़ता। इसकी सबसे बड़ी वैज्ञानिक खूबी यह है कि समय बीतने के साथ, लगातार घिसाई और जल अभिषेक अथवा धुलाई से इसकी स्वाभाविक सफेदी और चमक कम होने के बजाय और ज्यादा निखरती जाती है। आगामी वर्षों में यह धाम देश के प्रमुख सांस्कृतिक और वास्तुशिल्प केंद्रों में विशिष्ट पहचान दर्ज करेगा।




















