बरसात के मौसम में धान की रोपाई इन दिनों पूरे जोरों पर चल रही है, और रोपाई पूरी होते ही खेतों में रासायनिक खाद के साथ-साथ कीट व रोग नियंत्रण के लिए दवाओं का छिड़काव भी शुरू हो जाएगा। इसी दौर में धान को सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बीमारियों में एक है खैरा रोग। यह रोग सबसे पहले पौधे की पत्तियों पर असर डालता है, उन्हें पीला कर देता है और आखिर में सुखा देता है, जिससे पूरे पौधे की बढ़वार थम जाती है। यही वजह है कि किसानों को सलाह दी जाती है कि पौध जड़ पकड़ते ही खेत पर बारीकी से नजर रखनी शुरू कर दें, ताकि लक्षण जल्द पकड़ में आएं और नुकसान फैलने से पहले ही इलाज हो सके।
पत्तियां पीली क्यों पड़ने लगती हैं?
खैरा रोग की जड़ में मुख्य रूप से मिट्टी में पोषक तत्वों की, खासकर जिंक की कमी मानी जाती है। कई इलाकों की मिट्टी में जिंक पहले से ही कम मात्रा में पाया जाता है, और इसी वजह से धान के खेत में बुवाई के महज 20 से 25 दिन के भीतर ही खैरा रोग के लक्षण दिखने लगते हैं। जिन खेतों की मिट्टी क्षारीय होती है या जिसमें कैल्शियम की मात्रा ज्यादा होती है, वहां खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि ऐसी मिट्टी में मौजूद जिंक भी पौधे को ठीक से नहीं मिल पाता। यही मेल हर बरसात के मौसम में इस बीमारी को बड़े इलाके में फैला देता है, और जो किसान शुरुआती लक्षण नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें आगे चलकर भारी नुकसान झेलना पड़ता है।
कैसे पहचानें खैरा रोग के लक्षण?
इस रोग की चपेट में आए पौधे की पत्तियां शुरुआत में हल्के भूरे और लाल रंग की दिखने लगती हैं, इसलिए इसे समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है। बीमारी आगे बढ़ने पर पत्तियों पर छोटे-छोटे हल्के पीले धब्बे उभर आते हैं, जो धीरे-धीरे कत्थई रंग में बदल जाते हैं। स्वस्थ पौधों के मुकाबले खैरा रोग से ग्रसित पौधा साफ तौर पर बौना रह जाता है, और उसकी जड़ों का रंग भी सफेद की बजाय कत्थई हो जाता है। ऐसे लक्षण दिखते ही किसानों को तुरंत इलाज शुरू कर देना चाहिए, क्योंकि रोग को बढ़ने दिया जाए तो पौधे की वृद्धि पूरी तरह रुक सकती है और आखिर में फसल की पैदावार पर सीधी चोट पड़ती है।
जिंक सल्फेट के घोल से मिलेगा छुटकारा
कृषि विज्ञान केंद्र, सुल्तानपुर में तैनात कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए.के. सिंह के मुताबिक, अगर धान के खेत में खैरा रोग के लक्षण नजर आएं तो 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 20 किलोग्राम यूरिया को 1000 लीटर पानी में मिलाकर घोल तैयार कर लें, और इसे एक हेक्टेयर खेत के हिसाब से धान की फसल पर छिड़क दें। डॉ. सिंह कहते हैं, "यह घोल छिड़कने से खैरा रोग का असर काफी हद तक कम हो जाता है और पौधे के विकास में कोई रुकावट नहीं आती।" उनका कहना है कि जो किसान रोपाई शुरू होते ही अपने खेत पर नजर रखते हैं और लक्षण दिखते ही यह उपाय अपना लेते हैं, वे इस सीजन अपनी धान की फसल को बड़े नुकसान से बचा सकते हैं।



















