उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में बदलते मौसम, रासायनिक खादों के बढ़ते इस्तेमाल और खेतों की मिट्टी में लगातार घटती उर्वरता ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. इसी समस्या से निपटने के लिए शुरू किए गए 'खेत बचाओ अभियान' के जरिए किसानों को मिट्टी की सेहत सुधारने, खेती की लागत घटाने और फसल उत्पादन बढ़ाने के आसान और असरदार तरीके बताए जा रहे हैं.
हर 2-3 साल में मिट्टी की जांच जरूरी
कृषि विज्ञान केंद्र गोपाल ग्राम के अध्यक्ष और वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. चंद्रमणि त्रिपाठी के मुताबिक, किसानों को अपने खेत की मिट्टी की जांच हर दो से तीन साल में जरूर करानी चाहिए. यह जांच बताती है कि जमीन में किन पोषक तत्वों की कमी है और किनकी मात्रा पहले से ठीक है, ताकि उसी हिसाब से खाद और उर्वरक डाले जा सकें. बिना जांच कराए अंदाजे से खाद डालने पर या तो जरूरत से ज्यादा खर्च हो जाता है या फसल को सही पोषण नहीं मिल पाता. मिट्टी जांच के बाद सही मात्रा में खाद डालने से फसल को पूरा पोषण मिलता है और किसान का बेवजह का खर्च भी बचता है.
रासायनिक खाद घटाएं, जैविक खाद बढ़ाएं
डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि रासायनिक खादों का लगातार और ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता को धीरे-धीरे कमजोर करता जाता है. लंबे समय तक ऐसा चलते रहने से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता खत्म होने लगती है. इसलिए किसानों को गोबर की सड़ी खाद, वर्मी कंपोस्ट और हरी खाद जैसी जैविक खादों का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए. इनके इस्तेमाल से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, जिससे खेत की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है और मिट्टी की संरचना भी बेहतर होती है.
फसल चक्र अपनाएं, अवशेष न जलाएं
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, अगर एक ही खेत में साल दर साल एक जैसी फसल लगाई जाती रहे तो मिट्टी में कुछ खास पोषक तत्वों की कमी होने लगती है, क्योंकि हर फसल जमीन से अलग-अलग तत्व खींचती है. इससे बचने के लिए किसानों को फसल चक्र अपनाना चाहिए, यानी हर सीजन में अलग-अलग तरह की फसलें लगानी चाहिए. इसके साथ ही, फसल कटने के बाद बचे अवशेषों को खेत में जलाने के बजाय मिट्टी में ही मिला देना चाहिए. इससे न सिर्फ मिट्टी की सेहत सुधरती है, बल्कि पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण भी कम होता है.
बेहतर पैदावार और कम लागत का रास्ता
डॉ. चंद्रमणि त्रिपाठी का कहना है कि खेत बचाओ अभियान को अपनाने से मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है, जिससे फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है, उत्पादन बढ़ता है और खेती की लागत घटती है. उन्होंने किसानों से अपील की कि वे वैज्ञानिक सलाह के मुताबिक खेती करें और मिट्टी बचाने के लिए संतुलित उर्वरकों के साथ-साथ जैविक खाद का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें. उनका मानना है कि स्वस्थ मिट्टी ही बेहतर पैदावार और किसानों की अच्छी कमाई की सबसे मजबूत नींव है, इसलिए मिट्टी की देखभाल को किसान अपनी खेती का सबसे जरूरी हिस्सा मानें.
8 ब्लॉक और गांवों तक पहुंची जानकारी
डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि खेत बचाओ अभियान के तहत दीनदयाल संस्थान की मदद से गोंडा जिले के 8 ब्लॉक में किसानों को इस अभियान की जानकारी दी गई है. इसके अलावा हर दिन 2 ग्राम सभाओं में भी खेत बचाओ अभियान से जुड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है, ताकि गांव-गांव तक यह संदेश पहुंचे और ज्यादा से ज्यादा किसान मिट्टी बचाने के इस अभियान से जुड़ सकें.



















