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हरिद्वार के मोती बाजार में देसी घी के समोसे और पारंपरिक मिठाइयों की महक, ब्रिटिश काल से कायम है स्वाद की यह विरासतउत्तराखंड
20 सित॰ 2026, 6:35 pm (2 दिन पहले)· 1

हरिद्वार के मोती बाजार में देसी घी के समोसे और पारंपरिक मिठाइयों की महक, ब्रिटिश काल से कायम है स्वाद की यह विरासत

हर की पौड़ी से कुछ ही दूरी पर स्थित सौ साल पुरानी दुकान अपने शुद्ध देसी घी में तैयार समोसों, चंद्रकला और खास मिठाइयों के लिए आज भी श्रद्धालुओं की पहली पसंद बनी हुई है.

तीर्थनगरी हरिद्वार में गंगा दर्शन और पवित्र स्नान के बाद अक्सर श्रद्धालुओं के कदम शहर की ऐतिहासिक गलियों और पारंपरिक खानपान के ठिकानों की ओर मुड़ जाते हैं. धार्मिक अनुष्ठानों के समापन के पश्चात जब सात्विक और लजीज भोजन की इच्छा जागती है, तो स्थानीय बाजारों की पुरानी दुकानें अपनी अनोखी महक से भक्तों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं. हरिद्वार का स्वाद उसकी सदियों पुरानी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी वही प्रामाणिक जायका आज भी सुरक्षित रखा गया है. हर की पौड़ी पर आस्था की डुबकी लगाने वाले देश के कोने-कोने से पहुंचे तीर्थयात्रियों के लिए यह पारंपरिक खानपान यात्रा का एक अनिवार्य अनुभव बन जाता है.

मोती बाजार की संकरी गलियों में एक सदी का इतिहास

प्रसिद्ध हर की पौड़ी घाट से बमुश्किल दस मिनट पैदल चलकर जब बड़ा बाजार को पार करते हैं, तो आगे मोती बाजार का जीवंत इलाका शुरू होता है. इसी मोती बाजार की पतली गलियों के बीच ठंडे कुएं के समीप 'प्राचीन मथुरा वाले' नाम का एक पारंपरिक मिष्ठान भंडार मौजूद है. इस दुकान की शुरुआत ब्रिटिश हुकूमत के दौर में हुई थी और इसने समय के कई उतार-चढ़ाव देखते हुए अपने सफर का एक शतक पूरा कर लिया है. पिछले सौ वर्षों में जहां दुनिया का तौर-तरीका पूरी तरह बदल गया, वहीं इस प्रतिष्ठान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहां समोसे से लेकर सभी तरह की पारंपरिक मिठाइयां आज भी पूरी निष्ठा के साथ शुद्ध देसी घी में ही बनाई जाती हैं.

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काजू-किशमिश और खास चटनी वाले देसी घी के समोसे

इस ऐतिहासिक दुकान पर तैयार होने वाले नमकीन व्यंजनों में शुद्ध देसी घी के समोसे सबसे ज्यादा मांग में रहते हैं. कड़ाही से गरमा-गरम छनकर निकलने वाले इन समोसों के अंदर आलू की विशेष मसालेदार पिट्ठी के साथ भरपूर मात्रा में काजू और किशमिश भरा जाता है. देसी घी में तलने के कारण इनकी बाहरी परत बेहद कुरकुरी होती है, जिसमें भारीपन के बजाय शुद्धता का एहसास मिलता है. इन समोसों को प्रतिष्ठान की खास ताजी चटनी के साथ परोसा जाता है, जो इसके जायके को और अधिक चटपटा और संतुलित बना देती है. सुबह से लेकर शाम तक इस खास स्वाद को चखने के लिए दूर-दराज से आए लोगों का तांता लगा रहता है.

चाशनी में डूबी चंद्रकला और मावे की मिठास

मिठाइयों की श्रेणी में 'प्राचीन मथुरा वाले' की चंद्रकला सबसे ज्यादा लोकप्रिय और सराही जाने वाली पेशकश है. शुद्ध देसी घी में धीमी आंच पर तैयार की जाने वाली चंद्रकला की ऊपरी परत खस्ता और कुरकुरी होती है. इसके भीतरी हिस्से में शुद्ध मावा, केसर के धागे और बारीक कटे सूखे मेवों का समृद्ध मिश्रण भरा जाता है. चाशनी की सौंधी मिठास में डूबी यह चंद्रकला खाने पर मुंह में घुल जाती है और इसमें केसर तथा मावे का संतुलित स्वाद उभरकर सामने आता है. गंगा दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु न केवल इस मिठाई का यहां आनंद लेते हैं, बल्कि अपने परिजनों और रिश्तेदारों के लिए भी इसे पैक करवाकर साथ ले जाते हैं.

धीमी आंच पर घंटों पकती है सात्विक लौकी की लौज

सब्जियों और मेवों के मेल से बनने वाली पारंपरिक मिठाइयों में यहां की लौकी की लौज यानी लौकी की मिठाई अपनी ताजगी के लिए जानी जाती है. इसे तैयार करने के लिए ताजी लौकी को शुद्ध मावे और देसी घी के साथ धीमी आंच पर घंटों तक पकाया जाता है, ताकि इसका पानी पूरी तरह सूख जाए और घी की महक भीतर तक समा जाए. इस मिठाई में चीनी की मात्रा बहुत संतुलित रखी जाती है, जिससे लौकी का अपना स्वाभाविक और प्राकृतिक स्वाद खत्म नहीं होता. उपवास और त्योहारों के मौकों पर श्रद्धालु इस शुद्ध और सात्विक मिठाई को पूर्ण विश्वास के साथ खरीदते हैं.

भुने बेसन की सौंधी महक और मुलायम लड्डू

दुकान पर बेसन से बनने वाली मिठाइयों को भी पारंपरिक विधियों के अनुसार ही कड़ाही में तैयार किया जाता है. शुद्ध देसी घी में धीमी आंच पर लंबे समय तक भुने गए बेसन की सौंधी खुशबू पूरे बाजार में फैल जाती है. बेसन के लड्डू अपनी बनावट और कोमलता के लिए प्रसिद्ध हैं. देसी घी और भुने बेसन का यह मेल इतना कोमल होता है कि लड्डू मुंह में रखते ही घुल जाता है. एक सदी पुरानी यह पाक कला आज भी उसी शुद्धता के साथ जीवित है, जिसके कारण दशकों से ग्राहक इस स्वाद के मुरीद बने हुए हैं.

भगवान गणेश को प्रिय मोदक और विरासत का एहसास

विघ्नहर्ता भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय माने जाने वाले मोदक भी यहां विशेष रूप से देसी घी और मावे के मिश्रण से बनाए जाते हैं. मोती बाजार की इस प्राचीन दुकान में बनने वाले प्रत्येक पकवान में आज भी वही पुराना ब्रिटिश कालीन स्वाद महसूस किया जा सकता है. सौ वर्षों से अपने स्वाद और शुद्धता के मानकों से कोई समझौता न करने वाली यह दुकान आज केवल एक कारोबारी प्रतिष्ठान नहीं, बल्कि हरिद्वार के खानपान की एक जीवित विरासत बन चुकी है, जहां पहुंचकर लोग न केवल अपनी भूख शांत करते हैं बल्कि बीते दौर की मिठास को भी महसूस करते हैं.

सवाल-जवाब

मोती बाजार में यह ऐतिहासिक दुकान किस नाम से जानी जाती है?
यह 100 साल पुरानी दुकान 'प्राचीन मथुरा वाले' के नाम से प्रसिद्ध है.
यह दुकान हरिद्वार में किस स्थान पर स्थित है?
यह दुकान हर की पौड़ी से करीब 10 मिनट की पैदल दूरी पर मोती बाजार में ठंडे कुएं के पास स्थित है.
यहां मिलने वाले समोसों के अंदर क्या भरा जाता है?
शुद्ध देसी घी में तले जाने वाले इन समोसों में विशेष आलू की पिट्ठी के साथ काजू और किशमिश भरी जाती है.
दुकान की सबसे लोकप्रिय पारंपरिक मिठाई कौन सी है?
यहां की पारंपरिक चंद्रकला सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, जिसके अंदर मावा, केसर और सूखे मेवे भरे होते हैं.
व्रत और उपवास के लिए यहां कौन सी मिठाई विशेष रूप से पसंद की जाती है?
धीमी आंच पर शुद्ध मावे और देसी घी में बनने वाली लौकी की लौज को श्रद्धालु व्रत के दौरान खूब पसंद करते हैं.
भगवान गणेश के प्रिय कौन से व्यंजन यहां मिलते हैं?
दुकान पर विशेष रूप से शुद्ध देसी घी और मावे से तैयार किए गए मोदक उपलब्ध रहते हैं.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Neha Verma@neha-verma·1 दिन पहले

लाइफस्टाइल और हेरिटेज टूरिज्म के इस दौर में, पारंपरिक स्वाद केवल भोजन नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुके हैं। ब्रिटिश काल से चली आ रही यह विरासत दर्शाती है कि आज भी शुद्धता और प्रामाणिक अनुभव आधुनिक जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। आज के यात्री और लाइफस्टाइल प्रेमी केवल किसी जगह को देखने नहीं, बल्कि वहां की सदियों पुरानी विरासत को महसूस करने और उसका स्वाद चखने जाते हैं। शुद्ध देसी घी और पारंपरिक मेवों का उपयोग इस बात का प्रमाण है कि विरासत और गुणवत्ता हमेशा से सदाबहार बनी रहती हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 दिन पहले

एक राजनीतिक और लोक नीति विश्लेषक के रूप में, मैं इस विरासत को केवल स्वाद नहीं बल्कि स्थानीय पर्यटन अर्थव्यवस्था के एक मजबूत स्तंभ के रूप में देखता हूँ। ब्रिटिश काल से लेकर आज तक इस दुकान का टिके रहना हमारे स्थानीय सूक्ष्म उद्योगों (MSMEs) की आत्मनिर्भरता और दृढ़ता को दर्शाता है। धार्मिक पर्यटन क्षेत्रों में ऐसे ऐतिहासिक केंद्र स्थानीय रोज़गार और सांस्कृतिक धरोहर के मुख्य स्रोत होते हैं। सरकार को अपनी पर्यटन नीतियों में ऐसे पारंपरिक प्रतिष्ठानों को पहचान देनी चाहिए और इन्हें विरासत गलियारों से जोड़कर संरक्षण प्रदान करना चाहिए ताकि स्थानीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो सके।

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

अर्जुन की बात को आगे बढ़ाते हुए, वित्तीय और बिज़नेस दृष्टिकोण से देखें तो इस शताब्दी पुरानी दुकान की असली ताक़त इसकी 'ब्रांड इक्विटी' और 'कंज्यूमर ट्रस्ट' में है। आज के समय में जब स्टार्टअप्स और क्विक सर्विस रेस्टोरेंट्स भारी निवेश के बावजूद ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब इस पारंपरिक व्यवसाय ने अपनी गुणवत्ता को ही अपना 'इकोनॉमिक मोट' बना लिया है। ऐसे पारंपरिक ब्रांड्स में पैकेज्ड फूड्स, ऑनलाइन डिलीवरी और फ्रेंचाइजी मॉडल के जरिए वैश्विक स्तर पर स्केल करने की अपार व्यावसायिक क्षमता है, जो भारत के खाद्य बाजार के आर्थिक मूल्य को कई गुना बढ़ा सकती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

मोती बाजार जैसे संकरे और ऐतिहासिक व्यावसायिक क्षेत्रों में ऐसी प्रसिद्ध दुकानों पर जुटने वाली भारी भीड़ सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। ब्रिटिश काल की इन तंग गलियों में आपातकालीन सुरक्षा मानकों, अग्निशमन पहुंच और भीड़ नियंत्रण के नियमों का कड़ाई से पालन होना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, शुद्धता के दावों के बीच खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा नियमित जांच भी उतनी ही जरूरी है ताकि सुरक्षा और कानून सम्मत व्यवस्था बनी रहे।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

करण की बात बिल्कुल सटीक है। ऐतिहासिक धरोहर और खानपान की साख को बचाए रखने के लिए स्थानीय प्रशासन को एक व्यावहारिक नीति बनानी होगी। विशेषकर कुंभ और प्रमुख स्नान पर्वों के दौरान जब यहां लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं, तब इन संकरी गलियों में बुनियादी ढांचागत सुधार जैसे अंडरग्राउंड केबलिंग, पोर्टेबल फायर हाइड्रेंट्स और वन-वे क्राउड मूवमेंट बेहद जरूरी हैं। पर्यटन और धरोहर संरक्षण के साथ-साथ आपदा प्रबंधन और बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण ही इन ऐतिहासिक बाजारों को सुरक्षित और दीर्घकालिक बना सकता है।

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