गुजरात के ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के आसपास मांसाहारी व्यंजनों की बिक्री और भंडारण पर लगाई गई पाबंदी फिलहाल जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटाने की मांग करने वाले रेस्टोरेंट संचालकों की याचिका पर तुरंत राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश में किसी भी प्रकार का दखल देने से मना कर दिया, जिसके कारण मंदिर परिसर के समीप नॉनवेज के कारोबार पर रोक दोबारा लागू हो गई थी। हालांकि, अदालत ने राज्य के हाईकोर्ट को इस कानूनी विवाद का जल्द से जल्द निपटारा करने के निर्देश जरूर दिए हैं।
इस मामले की सुनवाई के दौरान बेंच के जजों ने एक रोचक टिप्पणी भी की। रेस्टोरेंट मालिकों का पक्ष रख रहे वकीलों ने तर्क दिया कि देश की एक बहुत बड़ी आबादी मांसाहारी भोजन का सेवन करती है और इस तरह के प्रतिबंधों से उनके व्यवसाय पर गंभीर संकट आ जाएगा। इस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ ने साफ किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में संतुलन साधकर चलना बेहद आवश्यक होता है। अदालत ने हल्के-फुल्के अंदाज में सुझाव दिया कि रोशनी के इस पावन पर्व पर लोगों को मिठाई का आनंद लेना चाहिए और फिलहाल वेज या नॉनवेज के विवाद को किनारे रख देना चाहिए।
कानूनी मामलों की रिपोर्टिंग करने वाले पोर्टल्स के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला अभी अपनी शुरुआती और अंतरिम प्रक्रिया में है, इसलिए इस पर कोई भी अंतिम निर्णय लेने का अधिकार मुख्य रूप से हाईकोर्ट के पास ही होना चाहिए। पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि उन्हें दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन बिठाना होगा और इस स्तर पर वे कोई बड़ा आदेश पारित नहीं करेंगे। साथ ही, अदालत ने हाईकोर्ट से यह भी आग्रह किया कि वह इस पूरी अपील पर बिना किसी देरी के अपनी सुनवाई पूरी करे और दो महीने के भीतर अपना फैसला सुनाए।
रेस्टोरेंट मालिकों के मुख्य वकील हुजेफा अहमदी ने अदालत में अपनी बात रखते हुए जोर दिया कि खानपान की आदतें पूरी तरह से व्यक्तिगत पसंद का विषय होती हैं और सरकार अपनी इच्छा किसी पर भी नहीं थोप सकती। उन्होंने दलील दी कि देश की लगभग 80 फीसदी जनता मांसाहारी है, ऐसे में प्रशासन की तरफ से इस प्रकार के आदेश जारी करना और जरूरत से ज्यादा संवेदनशीलता दिखाना समझ से परे है। वरिष्ठ वकील ने आगे कहा कि किसी भी क्षेत्र में इस तरह का स्थायी प्रतिबंध लगाना बेहद असामान्य बात है, जबकि हमारा संविधान हमेशा से सहिष्णुता और आपसी सौहार्द का संदेश देता है।
वकील ने अदालत को यह भी बताया कि प्रभावित होने वाले ये तमाम रेस्टोरेंट पिछले करीब चार दशकों से लगातार इसी इलाके में अपना कारोबार सफलतापूर्वक चला रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े किए। उन्होंने कहा कि एकल पीठ ने 30 अक्टूबर को रेस्टोरेंट मालिकों के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन उसी दिन कुछ ही घंटों के भीतर खंडपीठ ने उस पर रोक लगा दी। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इतनी जल्दबाजी दिखाने की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी।
दूसरी तरफ, गुजरात सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रेस्टोरेंट संचालकों की इस याचिका का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि इस विवाद पर हाईकोर्ट में अगली सुनवाई आगामी 25 नवंबर को तय की गई है। मेहता ने अदालत को समझाया कि मंदिर के आसपास के 500 मीटर के दायरे में प्रतिबंध का नियम पहले से ही अस्तित्व में था और बाद में सरकार द्वारा वहां एक नया कॉरिडोर विकसित किया गया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित क्षेत्रों के भीतर दुकानदारों और रेस्टोरेंट संचालकों को शाकाहारी भोजन परोसने की पूरी छूट दी गई है।
राज्य सरकार का मुख्य तर्क यह है कि त्योहारों और विभिन्न धार्मिक आयोजनों के दौरान मंदिर परिसर के नजदीक मांस, मछली या अन्य मांसाहारी व्यंजन तैयार करने या बेचने से वहां आने वाले श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हो सकती हैं। इसके अलावा, इससे दर्शनार्थियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है और आसपास के पूरे इलाके में कानून-व्यवस्था या भीड़भाड़ की समस्या पैदा हो सकती है। सरकार के इन्हीं तर्कों के आधार पर प्रशासन ने नियमों को सख्ती से लागू करने का फैसला लिया था।
इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत गत 10 अगस्त को जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी की गई एक अधिसूचना के बाद हुई थी। उस आदेश के तहत कुछ विशेष रूप से निर्धारित इलाकों की दुकानों, होटलों, रेस्टोरेंट और सड़क किनारे लगने वाले स्टॉलों पर मांसाहारी भोजन के पकाने, बेचने तथा स्टोर करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस पाबंदी के दायरे में कुल सात चिन्हित सड़कें और क्षेत्र शामिल किए गए थे, जिनमें सोमनाथ मंदिर से 500 मीटर के दायरे का पूरा भूभाग भी शामिल था।
जिला प्रशासन के इस फैसले को स्थानीय स्तर पर व्यवसाय करने वाले रेस्टोरेंट संचालकों ने गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इसके बाद 30 अक्टूबर को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला देते हुए प्रतिबंध हटाने का निर्देश जारी किया। हालांकि, इस फैसले के तुरंत बाद राज्य सरकार ने बिना वक्त गंवाए उसी दिन खंडपीठ के समक्ष अपील दायर कर दी। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कुछ ही घंटों के भीतर एकल पीठ के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसके चलते मंदिर के आसपास नॉनवेज पर लगी पाबंदी एक बार फिर प्रभावी हो गई। इसी रोक के आदेश को चुनौती देने के लिए अंततः रेस्टोरेंट मालिकों को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 25 से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण मामले का भी उल्लेख किया। जजों ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक कानूनी सवालों पर जल्द ही एक संविधान पीठ का फैसला आने की उम्मीद है, जिसका प्रभाव इस मामले पर भी पड़ सकता है। फिलहाल, 10 अगस्त को जारी हुई प्रशासनिक अधिसूचना की वैधानिकता पर गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ का अंतिम फैसला आना अभी बाकी है, जिस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।



















