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झारखंड के कोडरमा में दिव्यांगों को बांटे जाएंगे निःशुल्क कृत्रिम अंग, तीन दिवसीय शिविर की तैयारियां तेजझारखंड
20 सित॰ 2026, 4:37 pm (5 दिन पहले)· 1

झारखंड के कोडरमा में दिव्यांगों को बांटे जाएंगे निःशुल्क कृत्रिम अंग, तीन दिवसीय शिविर की तैयारियां तेज

रोटरी क्लब कोडरमा की उम्मीद की किरण पहल के तहत 25 से 27 सितंबर तक कटे हाथ, पैर और उंगलियों वाले जरूरतमंद दिव्यांगों को निःशुल्क कृत्रिम अंग मुहैया कराए जाएंगे।

शारीरिक रूप से अक्षम और आर्थिक तंगी से जूझ रहे व्यक्तियों को सामान्य जीवन की मुख्यधारा में लौटाने के उद्देश्य से झारखंड के कोडरमा में एक व्यापक सेवा अभियान शुरू किया जा रहा है। रोटरी क्लब कोडरमा अपने सेवा प्रकल्प उम्मीद की किरण के अंतर्गत तीन दिवसीय निःशुल्क कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण शिविर आयोजित करने जा रहा है। यह आयोजन 25, 26 और 27 सितंबर को रोटरी क्लब कोडरमा के सभागार में संपन्न होगा। शिविर के दौरान तीनों दिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक पात्र व्यक्तियों का पंजीकरण, स्वास्थ्य जांच और कृत्रिम अंगों का निर्माण कार्य समानांतर रूप से चलेगा।

हाथ, पैर या उंगलियां गंवाने वाले जरूरतमंदों को मिलेगी प्राथमिकता

प्रोजेक्ट डायरेक्टर रोटेरियन नवीन जैन के अनुसार इस शिविर की रूपरेखा विशेष रूप से ऐसे दिव्यांगजनों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, जिन्होंने किसी दुर्घटना अथवा बीमारी के चलते अपने हाथ, पैर या उंगलियां खो दी हैं। खुले बाजार में ऐसे उन्नत कृत्रिम अंगों की सामान्य दरें 20 से 25 हजार रुपये या उससे भी अधिक तक पहुंच जाती हैं, जिसके कारण कमजोर आय वर्ग के परिवारों के लिए इन्हें खरीद पाना संभव नहीं हो पाता। इस आर्थिक बाधा को समाप्त करने के लिए ही इस शिविर में सभी चयनित लाभार्थियों को पूरी तरह मुफ्त कृत्रिम अंग प्रदान किए जाएंगे। प्रक्रिया में शामिल होने के लिए लाभार्थियों का आधार कार्ड के जरिए पंजीकरण किया जाएगा और उन्हें एक औपचारिक रजिस्ट्रेशन कार्ड जारी होगा।

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गोरखपुर से पहुंचेगी डॉक्टरों की टीम, सभागार में ही बनेंगे कृत्रिम अंग

शिविर की तकनीकी प्रक्रिया की जानकारी देते हुए नवीन जैन ने स्पष्ट किया कि कार्यक्रम के पहले दिन उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से डॉक्टरों और तकनीकी विशेषज्ञों का एक विशेष दल कोडरमा पहुंचेगा। यह टीम प्रत्येक लाभार्थी की शारीरिक बनावट और व्यक्तिगत जरूरत के मुताबिक नाप लेगी। इसके तुरंत बाद आधुनिक उपकरणों और मशीनों की सहायता से रोटरी क्लब कोडरमा के सभागार में ही इन कृत्रिम अंगों को तैयार किया जाएगा। आवश्यक मशीनरी और कच्चा माल भी गोरखपुर की तकनीकी टीम अपने साथ ला रही है। कृत्रिम अंग लग जाने के बाद दिव्यांगजनों को चलने-फिरने तथा दैनिक कार्यों को स्वयं करने में सहूलियत मिलेगी, जिससे उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

अन्य जिलों से पहुंचने वाले लोगों के लिए मुफ्त आवास और भोजन

शिविर के रजिस्ट्रेशन चेयर सिमरनजीत सिंह ने जानकारी दी कि इस कल्याणकारी पहल का लाभ उठाने के लिए केवल कोडरमा ही नहीं, बल्कि झारखंड के अन्य हिस्सों और पड़ोसी राज्य बिहार के विभिन्न जिलों से भी जरूरतमंद लोग अपना नामांकन करा रहे हैं। दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को किसी तरह की असुविधा न हो, इसके लिए रोटरी क्लब कोडरमा परिसर में उनके ठहरने और निःशुल्क भोजन का समुचित प्रबंध किया गया है। संस्था के पदाधिकारियों का कहना है कि इस पूरे अभियान का केंद्रीय ध्येय निर्धन दिव्यांगजनों को आर्थिक दबाव से मुक्त कर उन्हें समाज में स्वाभिमान और गरिमा के साथ जीने का अवसर प्रदान करना है।

सवाल-जवाब

कोडरमा में निःशुल्क कृत्रिम अंग शिविर कब और कहां आयोजित होगा?
यह शिविर 25, 26 और 27 सितंबर को रोटरी क्लब कोडरमा के सभागार में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक आयोजित किया जाएगा।
इस शिविर में किन लोगों को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराए जाएंगे?
ऐसे जरूरतमंद दिव्यांगजन जिनके हाथ, पैर या उंगलियां कट चुकी हैं और जो आर्थिक तंगी के कारण इन्हें बाजार से नहीं खरीद पाते, वे इसके पात्र हैं।
पंजीकरण के लिए कौन सा दस्तावेज आवश्यक है?
शिविर में पंजीकरण कराने और रजिस्ट्रेशन कार्ड बनवाने के लिए लाभुकों को अपना आधार कार्ड साथ लाना अनिवार्य है।
कृत्रिम अंगों का निर्माण कहां और किसके द्वारा किया जाएगा?
गोरखपुर से आने वाली विशेषज्ञ चिकित्सकों और तकनीशियनों की टीम आधुनिक मशीनों से रोटरी क्लब सभागार में ही अंग तैयार करेगी।
बाहर से आने वाले मरीजों के लिए क्या सुविधाएं हैं?
झारखंड के अन्य जिलों और बिहार से आने वाले लाभुकों के लिए रोटरी क्लब कोडरमा की ओर से निःशुल्क भोजन और ठहरने की व्यवस्था की गई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·4 दिन पहले

सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिए से, यह पहल ग्रामीण क्षेत्रों में सहायक तकनीकों की भारी कमी को दूर करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। सरकारी स्तर पर पुनर्वास सेवाओं की सीमित पहुंच के कारण ऐसे स्वयंसेवी शिविर अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। गोरखपुर की तकनीकी टीम द्वारा मौके पर ही व्यक्तिगत नाप के अनुसार कृत्रिम अंग तैयार करना एक बेहतरीन नीति है, क्योंकि यह मरीजों के लिए फिटिंग से जुड़े समय को कम करती है। शारीरिक पुनर्वास सीधे तौर पर मानसिक स्वास्थ्य और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जुड़ा है। भविष्य में ऐसे जमीनी कार्यक्रमों को स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से भी जोड़ा जाना चाहिए ताकि मरीजों को भविष्य में भी निरंतर तकनीकी सहायता मिल सके।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

यह रिपोर्ट केवल एक परोपकारी कार्य को नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मानव पूंजी के पुनर्निर्माण को दर्शाती है। 20 से 25 हजार रुपये की भारी लागत के कारण जो दिव्यांग आर्थिक रूप से मुख्यधारा से बाहर थे, उन्हें यह पहल पुनः आत्मनिर्भर बनाएगी। झारखंड और बिहार के पिछड़े जिलों से आ रहे लोगों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था इस सामाजिक निवेश को और अधिक प्रभावी बनाती है। इस तरह के प्रयास क्षेत्रीय श्रम शक्ति की भागीदारी को बढ़ाने में मददगार साबित होते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

रविकेश की बात को आगे बढ़ाते हुए, नीतिगत दृष्टिकोण से यह पहल दर्शाती है कि नागरिक समाज कैसे लोक कल्याण में राज्य की पूरक भूमिका निभाता है। झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में, जहाँ जमीनी स्तर पर दिव्यांग अनुकूल बुनियादी ढाँचा और पुनर्वास सेवाएँ सीमित हैं, ऐसे आयोजन स्वास्थ्य सेवाओं के विकेंद्रीकरण की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। शासन के स्तर पर, ऐसी पहलों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए ताकि कृत्रिम अंगों की उपलब्धता केवल सामयिक शिविरों तक सीमित न रहकर एक स्थायी ढांचागत अधिकार बन सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

सड़क दुर्घटनाओं, कार्यस्थल की त्रासदियों या हिंसक वारदातों में अंग गंवाने वाले पीड़ितों के लिए न्याय व्यवस्था और दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण से वित्तीय मुआवजा मिलने में अक्सर लंबा कानूनी विलंब होता है। ऐसे में आर्थिक तंगी से जूझ रहे पीड़ितों के लिए यह शिविर तत्काल पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा का एक मजबूत जरिया बनता है। कानूनी और सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि स्थानीय प्रशासन और जांच एजेंसियां ऐसे कल्याणकारी अभियानों के साथ समन्वय रखें, जिससे गंभीर हादसों के शिकार लोग अदालती प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही अपनी गतिशीलता और आत्मनिर्भरता वापस पा सकें।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

गोरखपुर से तकनीकी टीम का कोडरमा पहुंचना अंतर-राज्यीय सामाजिक समन्वय को दर्शाता है। सार्वजनिक नीति के लिहाज से, केवल स्वयंसेवी संस्थाओं पर निर्भर रहने के बजाय सरकारों को ऐसी पुनर्वास सेवाओं को अपनी मुख्यधारा की स्वास्थ्य योजनाओं से जोड़ना चाहिए। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे पड़ोसी राज्यों के बीच ऐसे चिकित्सा अभियानों का सरकारी स्तर पर ढांचागत विस्तार होना चाहिए। इससे गंभीर दुर्घटनाओं या अपराधों के शिकार लाचार लोगों को अदालती मुआवजे की लंबी कानूनी प्रतीक्षा के दौरान तत्काल गरिमापूर्ण जीवन और आत्मनिर्भरता मिल सकेगी।

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