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झारखंड के लोकगायक मधु मंसूरी ने लिखे 300 से अधिक नागपुरी गीत, पद्मश्री से हो चुके हैं सम्मानितझारखंड
7 सित॰ 2026, 7:07 am (18 दिन पहले)· 2

झारखंड के लोकगायक मधु मंसूरी ने लिखे 300 से अधिक नागपुरी गीत, पद्मश्री से हो चुके हैं सम्मानित

झारखंड के प्रसिद्ध लोकगायक मधु मंसूरी हंसमुख ने बिना किसी औपचारिक संगीत शिक्षा के 300 से ज्यादा गीत रचे हैं। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के आंदोलनों में उनके गीत आज भी गूंजते हैं।

गांव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं जैसे प्रसिद्ध गीतों के रचनाकार मधु मंसूरी हंसमुख आज झारखंड से लेकर ओडिशा और बंगाल तक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। उनके द्वारा रचे गए यह गीत पर्यावरण संरक्षण और जल, जंगल, जमीन बचाने के अभियानों की पहचान बन चुके हैं। उनके इस कलात्मक योगदान के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान के साथ-साथ झारखंड रत्न और विभूति रत्न से भी नवाजा जा चुका है।

पिता से मिली संगीत की शुरुआती सीख

महज आठ वर्ष की उम्र से गायन की शुरुआत करने वाले इस लोक कलाकार ने जीवन में कभी कोई औपचारिक संगीत प्रशिक्षण नहीं लिया है। उन्होंने संगीत की कोई कक्षा ज्वाइन नहीं की और न ही राग-ताल की कोई शास्त्रीय बारीकी सीखी। उन्हें संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने पिता से मिली जिन्हें संगीत का गहरा शौक था। वह बताते हैं कि पांच साल की उम्र से ही उनके पिता उन्हें सामने बिठाकर संगीत सिखाते थे और उन्होंने जो कुछ भी सीखा है वह सब अपने पिता से ही सीखा है। उनके पिता पर्यावरण और आसपास के लोगों के दुखों को लेकर बेहद संवेदनशील रहते थे और इन्हीं विषयों पर गीत तैयार करते थे तथा चर्चा करते थे। यही संवेदनशीलता उनकी रचनाओं में भी साफ झलकती है क्योंकि उनका मानना है कि गीत विचारों और संदेशों को दुनिया तक पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम है।

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झारखंड आंदोलन में गीतों का गूंजता स्वर

उनकी रचनाओं में हमेशा जल, जंगल, जमीन के अधिकार और प्रकृति को बचाने का संदेश प्रमुखता से झलकता है। उनके गानों में अपने वजूद की रक्षा और हक की बात होती है, जिस वजह से पड़ोसी राज्यों में भी उनके गीत काफी लोकप्रिय हैं। उनकी एकमात्र इच्छा यही है कि गीतों के माध्यम से झारखंड को आगे बढ़ाया जाए। संगीत के प्रति उनका समर्पण ऐसा है कि वह रोज सुबह तीन बजे उठकर गीत लिखते हैं और उन्हें सुरों में ढालने का अभ्यास करते हैं। नागपुरी क्षेत्रीय भाषा में आधुनिक राग और रंग लाने वाले वह पहले रचनाकार हैं। उनके लिखे गीत झारखंड के हर गांव और गली में गूंजते हैं।

नागपुरी गीतों के आधुनिक पुरोधा

राज्य के अलग राज्य आंदोलन में राजनीतिक दिग्गजों के साथ-साथ सांस्कृतिक कर्मियों ने भी अहम भूमिका निभाई थी, जिसमें उनका योगदान अतुलनीय है। उस संघर्ष के दौरान उनका लिखा गीत झारखंड में खेती बाड़ी, पटना में खलिहान काफी लोकप्रिय हुआ था। उन्होंने नागपुरी गीतों का वैज्ञानिक वर्गीकरण भी किया है। पचहत्तर वर्ष की उम्र में भी वह आराम करने के बजाय लगातार सक्रिय हैं ताकि नागपुरी गीतों की यह अनमोल परंपरा जीवित रहे और नई पीढ़ी के लोग इससे प्रेरणा लेकर आगे आएं। नागपुरी मंच के प्रेमी और श्रोता उन्हें प्यार से नागपुरी मंच का राजकुमार कहकर पुकारते हैं।

सवाल-जवाब

मधु मंसूरी हंसमुख कौन हैं?
वह झारखंड के एक प्रसिद्ध नागपुरी लोकगायक और गीतकार हैं, जिन्हें उनके योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।
उन्होंने कुल कितने गीत लिखे हैं?
उन्होंने अब तक 300 से अधिक नागपुरी गीत लिख डाले हैं।
उन्होंने संगीत की शिक्षा किससे ली थी?
उन्होंने कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया, बल्कि बचपन में उनके पिता ने उन्हें संगीत सिखाया था।
उनके कौन से गीत सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं?
गांव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं और झारखंड में खेती बाड़ी, पटना में खलिहान उनके सबसे मशहूर गीतों में शामिल हैं।
उन्हें कौन-से प्रमुख सम्मान मिले हैं?
उन्हें पद्मश्री के अलावा झारखंड रत्न और विभूति रत्न से भी सम्मानित किया जा चुका है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·17 दिन पहले

मधु मंसूरी हंसमुख जैसे लोक कलाकारों का संघर्ष सिर्फ सांस्कृतिक नहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीति और जल, जंगल, जमीन के अधिकारों का जीवंत दस्तावेज है। झारखंड के गठन और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई में लोकगीतों ने जो वैचारिक जमीन तैयार की, वह प्रशासनिक नीतियों और राजनीतिक मंचों से कहीं अधिक प्रभावी साबित हुई। 75 वर्ष की उम्र में भी उनका सक्रिय रहना यह बताता है कि क्षेत्रीय कला और जन-आंदोलन कैसे एक-दूसरे के पूरक हैं। आने वाले समय में इन लोक विधाओं का वैज्ञानिक वर्गीकरण और दस्तावेजीकरण न केवल नागपुरी भाषा को संरक्षित करेगा, बल्कि जनजातीय समाज के राजनीतिक व सामाजिक अधिकारों की लड़ाई को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम भी बनेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·17 दिन पहले

मधु मंसूरी जी का योगदान केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि जनजातीय अधिकारों और क्षेत्रीय अस्मिता की कानूनी और राजनीतिक लड़ाई का मजबूत आधार है। एक क्राइम और न्याय व्यवस्था के संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि जल, जंगल और जमीन के जिन मुद्दों को उनके गीतों ने स्वर दिया, वे आज भी सरकारी नीतियों, भूमि अधिग्रहण और विस्थापन जैसे गंभीर कानूनी मामलों के केंद्र में हैं। 75 वर्ष की उम्र में भी उनकी सक्रियता और नागपुरी गीतों का वैज्ञानिक वर्गीकरण यह सुनिश्चित करता है कि आदिवासी समाज के अधिकारों का यह वैचारिक दस्तावेज आने वाली पीढ़ियों के पास सुरक्षित रहे, जो न्याय और सामाजिक सुरक्षा की बहसों को वैधानिक और सांस्कृतिक संबल प्रदान करेगा।

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