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कानपुर कलेक्ट्रेट में रक्षाबंधन की अनूठी मिसाल, छात्रा इशु यादव ने जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह को बांधी राखी, अफसर ने 29 हजार की बकाया फीस चुकाकर दिलाई साइकिलउत्तर प्रदेश
27 अग॰ 2026, 11:54 pm (62 दिन पहले)· 2

कानपुर कलेक्ट्रेट में रक्षाबंधन की अनूठी मिसाल, छात्रा इशु यादव ने जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह को बांधी राखी, अफसर ने 29 हजार की बकाया फीस चुकाकर दिलाई साइकिल

कानपुर कलेक्ट्रेट में जनता दर्शन के दौरान आर्थिक तंगी से जूझ रही 12वीं की छात्रा इशु यादव ने जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह को राखी बांधी, जिसके बाद अफसर ने आधी फीस खुद जमा कर और बाकी माफ कराकर साइकिल भी भेंट की।

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में रक्षाबंधन के विशेष अवसर पर कानपुर कलेक्ट्रेट परिसर में एक अत्यंत संवेदनशील और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। प्रशासनिक अधिकारियों के नियमित जनता दर्शन कार्यक्रम के दौरान नौबस्ता निवासी एक बेबस मां अपनी 12वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी को साथ लेकर सहायता की गुहार लगाने पहुंची थी। परिवार की बिगड़ती आर्थिक स्थिति के कारण पिछले कई महीनों से छात्रा के स्कूल की फीस जमा नहीं हो पाई थी, जिससे उसकी पढ़ाई पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। अपनी पीड़ा व्यक्त करते समय छात्रा इशु यादव ने जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह को कलाई पर राखी बांधने का अनुरोध किया। प्रशासनिक अधिकारी ने छात्रा की इस पावन भावना का सहर्ष सम्मान किया और राखी बंधवाने के बाद एक जिम्मेदार भाई का धर्म निभाते हुए उसकी शिक्षा से जुड़ी सभी समस्याओं का तत्काल निवारण कर दिया।

परिवार का संघर्ष और बकाया फीस का संकट

कानपुर के नौबस्ता क्षेत्र अंतर्गत आने वाले आवास विकास हंसपुरम में रहने वाली ललिता यादव के परिवार पर संकट की शुरुआत साल 2017 में हुई थी, जब उनके पति प्रागी लाल यादव का देहांत हो गया था। गृहस्वामी के असमय निधन के पश्चात पूरे परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी ललिता यादव के कंधों पर आ गई। अपने परिवार का गुजारा चलाने और बच्चों का भविष्य संवारने के लिए वह आसपास के घरों में साफ-सफाई का काम करने लगीं। सीमित और अनिश्चित आय के बावजूद वह अपनी बेटी इशु यादव की पढ़ाई जारी रखने के लिए संघर्ष करती रहीं। इशु नौबस्ता स्थित केपी वाईजन सहयोगी इंटर कॉलेज में 12वीं कक्षा की छात्रा है। लगातार आर्थिक तंगी के चलते कॉलेज की फीस कई महीनों से जमा नहीं हो सकी थी और देखते ही देखते बकाया राशि लगभग 29 हजार रुपये तक पहुंच गई। बेटी का नाम कटने और पढ़ाई रुकने की चिंता में डूबी मां अंततः प्रशासनिक सहायता पाने के लिए जिलाधिकारी के समक्ष उपस्थित हुई।

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जिलाधिकारी ने व्यक्तिगत रूप से उठाई जिम्मेदारी

जनता दर्शन में पूरे मामले की जानकारी मिलते ही जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने त्वरित कार्रवाई की। उन्होंने बिना विलंब किए केपी वाईजन सहयोगी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य से दूरभाष पर संपर्क साधा और बकाया फीस के संबंध में विस्तृत चर्चा की। छात्रा के भविष्य को ध्यान में रखते हुए जिलाधिकारी ने बकाया 29 हजार रुपये की आधी राशि स्वयं अपने पास से जमा कराने का निर्णय लिया। इसके साथ ही उन्होंने कॉलेज प्रशासन और प्रधानाचार्य से मानवीय आधार पर बात करके शेष आधी फीस को पूरी तरह माफ करवा दिया। इस सहयोगात्मक पहल के चलते छात्रा के सिर से बकाया फीस का भारी बोझ उतर गया और उसकी 12वीं की पढ़ाई सुचारू रूप से जारी रहने का रास्ता साफ हो गया।

आवागमन की बाधा दूर करने के लिए मिली साइकिल

फीस की समस्या का समाधान करने के उपरांत जिलाधिकारी ने छात्रा से उसके दैनिक जीवन और स्कूल आने-जाने के साधनों के बारे में बातचीत की। इशु यादव ने बताया कि उसका घर नौबस्ता स्थित केपी वाईजन सहयोगी इंटर कॉलेज से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सार्वजनिक परिवहन या अन्य साधन न होने के कारण उसे रोजाना पैदल ही स्कूल आना-जाना पड़ता था, जिससे काफी समय और ऊर्जा नष्ट होती थी। छात्रा की इस व्यावहारिक कठिनाई को देखते हुए जिलाधिकारी ने उसके लिए तुरंत एक नई साइकिल की व्यवस्था कराई। 27 अगस्त को ही छात्रा को कलेक्ट्रेट परिसर में नई साइकिल सौंप दी गई, जिस पर सवार होकर वह खुशी-खुशी अपने घर के लिए रवाना हुई।

आईएएस बनने का सपना और डिप्टी कलेक्टर की मेंटरशिप

अपनी समस्या का समाधान होने और भाई के रूप में अधिकारी का स्नेह मिलने के बाद इशु यादव ने अपने भावी सपनों का खुलासा किया। उसने बताया कि उसकी तीव्र इच्छा है कि वह मन लगाकर पढ़ाई करे और भविष्य में प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण कर एक IAS अधिकारी बने। इशु ने कहा कि प्रशासनिक सेवा में आने के बाद वह भी समाज के निर्धन और जरूरतमंद लोगों की समस्याओं का समाधान करना चाहती है, जैसा आज उसके साथ हुआ। जिलाधिकारी ने छात्रा के इस बुलंद हौसले की सराहना की और उसे पूर्ण मनोयोग से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा दी। इसके अतिरिक्त उन्होंने डिप्टी कलेक्टर ज्योति शर्मा को विशेष निर्देश देकर इशु की व्यक्तिगत मेंटरशिप की जिम्मेदारी सौंपी। अब डिप्टी कलेक्टर ज्योति शर्मा छात्रा को उच्च शिक्षा, अध्ययन सामग्री तथा आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के संबंध में निरंतर मार्गदर्शन प्रदान करेंगी। रक्षाबंधन पर घटित यह घटना केवल आर्थिक मदद तक सीमित न रहकर एक जरूरतमंद छात्रा के सपनों को नई उड़ान देने का माध्यम बन गई।

सवाल-जवाब

यह घटना उत्तर प्रदेश के किस शहर में हुई?
यह घटना उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर स्थित कानपुर कलेक्ट्रेट में जनता दर्शन के दौरान हुई।
छात्रा इशु यादव की कितनी फीस बकाया थी?
छात्रा की स्कूल फीस कई महीनों से जमा न होने के कारण करीब 29 हजार रुपये बकाया थी।
जिलाधिकारी ने फीस की समस्या का समाधान कैसे किया?
जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने आधी बकाया फीस खुद जमा की और बाकी आधी फीस स्कूल के प्रधानाचार्य से बातचीत कर माफ करवा दी।
छात्रा को साइकिल किस तारीख को सौंपी गई?
छात्रा को 27 अगस्त को नई साइकिल सौंपी गई, जिससे वह अपने घर से स्कूल आ-जा सके।
छात्रा का भविष्य में क्या बनने का सपना है?
इशु यादव पढ़ाई में मेहनत करके आगे चलकर आईएएस (IAS) अधिकारी बनना चाहती है।
छात्रा के मार्गदर्शन के लिए किसे जिम्मेदारी सौंपी गई है?
जिलाधिकारी ने डिप्टी कलेक्टर ज्योति शर्मा को इशु यादव की मेंटरिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मार्गदर्शन की जिम्मेदारी दी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Priya Sharma@priya-sharma·62 दिन पहले

यह घटना प्रशासनिक संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो आधुनिक जीवन में मानवीय मूल्यों के पुनरुद्धार को दर्शाती है। एक जरूरतमंद छात्रा की शिक्षा का मार्ग प्रशस्त होना केवल व्यक्तिगत राहत नहीं है, बल्कि यह समाज में सहयेग की संस्कृति को सुदृढ़ करता है। भविष्य में इस प्रकार के प्रशासनिक सहयोग से वंचित वर्ग की बालिकाओं को उच्च शिक्षा और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित होगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·62 दिन पहले

यह घटना प्रशासनिक संवेदनशीलता और लोकनीति के बीच के उस अंतर को पाटने का उदाहरण है, जहाँ एक अधिकारी व्यक्तिगत पहल से सिस्टम की अड़चनों को दूर करता है। यद्यपि ऐसे मानवीय कार्य सराहनीय हैं, किंतु यह घटना शिक्षा के अधिकार और जरूरतमंद छात्रों के लिए संस्थागत वित्तीय सहायता तंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। इस तरह के मामलों में बार-बार व्यक्तिगत हस्तक्षेप की जगह मजबूत कल्याणकारी नीतियां होनी चाहिए।

Ravikash Gupta@ravikash·62 दिन पहले

यह घटना न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता को दर्शाती है, बल्कि भारत के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में शिक्षा और कौशल विकास के लिए कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) तथा संस्थागत निवेश की भारी कमी को भी उजागर करती है। जब निम्न आय वर्ग के परिवारों को इस प्रकार की बुनियादी वित्तीय बाधाओं का सामना करना पड़ता है, तो यह देश की आर्थिक प्रगति और मानव पूंजी निर्माण की गति को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। दीर्घकालिक रूप से, यदि हमें सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करना है, तो वित्तीय बाज़ारों और कॉर्पोरेट जगत को ऐसे जरूरतमंद छात्रों के लिए मजबूत शिक्षा कोष स्थापित करने होंगे, ताकि शिक्षा केवल व्यक्तिगत दान पर निर्भर न रहे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·62 दिन पहले

यह घटना प्रशासनिक संवेदनशीलता और जनसंवाद की सार्थकता को दर्शाती है। हालांकि, यह मामला समाज कल्याण योजनाओं और शिक्षा के अधिकार जैसे विधिक सुरक्षा तंत्रों के क्रियान्वयन में जमीनी स्तर पर मौजूद कमियों की ओर भी इशारा करता है, जहां एक जरूरतमंद परिवार को मूलभूत सहायता के लिए जिला मुख्यालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। भविष्य में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसी आर्थिक बाधाएं किसी भी छात्र की शिक्षा में अवरोध न बनें।

Rohan Verma@rohan-verma·62 दिन पहले

यह घटना दिखाती है कि प्रशासनिक अधिकारियों की व्यक्तिगत सहानुभूति संकट के समय तुरंत राहत दे सकती है, लेकिन यह व्यवस्थागत सुधार का विकल्प नहीं है। जब एक विधवा मां को अपनी बेटी की पढ़ाई बचाने के लिए सीधे जिलाधिकारी के पास गुहार लगाने आना पड़े, तो यह जिला स्तर पर शिक्षा के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन में बड़ी प्रशासनिक चूक को उजागर करता है। यदि ऐसे मामलों में स्कूल स्तर पर ही स्थानीय प्रशासन या जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर पहले ही मदद पहुंचाई जाती, तो इस तरह की नौबत ही नहीं आती।

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