उत्तर प्रदेश के कानपुर प्राणी उद्यान परिसर में स्थित झील में पिछले कुछ दिनों के भीतर दो बार बड़ी संख्या में मछलियों के अचानक मृत पाए जाने से हड़कंप मच गया है। जिस झील में पहले रंग-बिरंगी मछलियों की चहल-पहल और अठखेलियां पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र हुआ करती थीं, वहां अब सन्नाटा और संकट पसरा हुआ है। सैकड़ों की तादाद में मछलियों की जान जाने के बाद चिड़ियाघर प्रबंधन हरकत में आ गया है और जल निकाय को बचाने के लिए आपातकालीन कदम उठाए जा रहे हैं। झील के पानी में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने और उसकी गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए कई मोर्चों पर काम शुरू किया गया है।
बाहरी दूषित पानी और बढ़ती आबादी से बढ़ा दबाव
जलाशय में अचानक पैदा हुए इस जल संकट की पड़ताल करने पर मुख्य रूप से दो बड़े कारण सामने आए हैं। पहला कारण झील के भीतर मछलियों की संख्या का अत्यधिक बढ़ जाना यानी ओवरपॉपुलेशन है। सीमित दायरा होने की वजह से पानी में मौजूद प्राकृतिक रूप से घुली हुई ऑक्सीजन पर जलीय जीवों का जैविक दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया था। इसी संवेदनशील स्थिति के बीच बाहर से बहकर आए दूषित पानी के झील में प्रवेश करने से स्थिति पूरी तरह बिगड़ गई। गंदे पानी के मिलने से जल की शुद्धता समाप्त हो गई और उसमें घुली हुई ऑक्सीजन का स्तर गिरकर बेहद खतरनाक निचले स्तर पर पहुंच गया। विशेषज्ञों के अनुसार जल में ऑक्सीजन की भारी कमी किसी भी जलीय जीव के लिए तत्काल जानलेवा साबित होती है, जिसके चलते बड़ी संख्या में मछलियों ने दम तोड़ दिया।
ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए तैरते फव्वारों का सहारा
पानी में घुली ऑक्सीजन के स्तर को तुरंत सामान्य बनाने के लिए चिड़ियाघर प्रशासन ने यांत्रिक और जैविक दोनों तरह के उपाय अपनाए हैं। झील में विशेष प्रकार के तैरते हुए फव्वारे यानी फ्लोटिंग फाउंटेन लगाए जा रहे हैं। ये फाउंटेन पानी की ऊपरी सतह पर तैरते रहेंगे और लगातार नीचे के पानी को ऊपर उछालकर फव्वारे के रूप में हवा में फेंकेंगे। जब पानी की बूंदें सीधे वायुमंडल के संपर्क में आएंगी, तो उनमें हवा की ऑक्सीजन प्राकृतिक रूप से घुल जाएगी। इस प्रक्रिया से झील का पानी स्थिर नहीं रहेगा बल्कि लगातार बहता और गतिमान बना रहेगा। स्थिर पानी की तुलना में गतिमान पानी में ऑक्सीजन सोखने की क्षमता ज्यादा होती है, जिससे जलजीवों के सांस लेने के लिए अनुकूल माहौल तैयार होता है।
टैबलेट और टॉक्सिन बाइंडर से पानी की सफाई
फ्लोटिंग फाउंटेन के साथ-साथ जल के रासायनिक उपचार पर भी जोर दिया जा रहा है। झील में ऑक्सीजन बढ़ाने वाली विशेष प्रकार की टैबलेट्स मिलाई जा रही हैं, जो पानी में घुलकर तुरंत ऑक्सीजन रिलीज करती हैं। इसके अलावा पानी में मौजूद विषैले तत्वों को निष्क्रिय करने के लिए टॉक्सिन बाइंडर का छिड़काव किया जा रहा है। टॉक्सिन बाइंडर हानिकारक रसायनों और प्रदूषकों को बांधकर उनके असर को खत्म कर देता है, जिससे मछलियों को जहर से बचाया जा सके।
अतीत में भी आ चुकी है ऐसी समस्या
कानपुर प्राणी उद्यान की झील में ऑक्सीजन संकट का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी झील में जलकुंभी और अन्य जलीय खरपतवारों के अत्यधिक फैल जाने की वजह से ऑक्सीजन की भारी कमी दर्ज की गई थी। उस दौरान भी जल शोधन के लिए बड़े पैमाने पर उपाय किए गए थे, जिसमें 25 किलोग्राम ओटू मैक्स टैबलेट्स और 40 किलोग्राम टॉक्सिन बाइंडर के घोल का इस्तेमाल किया गया था। इस बार भी उसी तरह के कारगर वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर झील के पर्यावरण को दोबारा बहाल करने का प्रयास किया जा रहा है।
निदेशक का वक्तव्य और भविष्य की योजना
घटनाक्रम पर बात करते हुए कानपुर प्राणी उद्यान के निदेशक डॉ. कन्हैया पटेल ने बताया, "झील में मछलियों की संख्या अधिक होने और बाहर से आए दूषित पानी के कारण पानी में ऑक्सीजन की कमी की स्थिति बनी थी।" उन्होंने स्पष्ट किया कि झील की स्थिति में सुधार के लिए जल उपचार का काम तेजी से किया जा रहा है और उसमें ऑक्सीजन बढ़ाने वाली टैबलेट्स तथा अन्य जरूरी सामग्री डाली जा रही है। इसके साथ ही पानी में निरंतर गति बनाए रखने के लिए फ्लोटिंग फाउंटेन स्थापित किए जा रहे हैं। चिड़ियाघर प्रशासन अब झील के पानी के मापदंडों की नियमित रूप से निगरानी करेगा ताकि भविष्य में जलीय जीवों को इस प्रकार के संकट का सामना न करना पड़े।



















