लद्दाख में पिछले साल 24 सितंबर 2025 को हुई पुलिस फायरिंग में चार लोगों की मौत के बाद से वहां के हालात में लगातार तनाव बना हुआ है। इस घटना के बाद से क्षेत्र का राजनीतिक और सामाजिक माहौल पूरी तरह बदल गया है। इस दौरान सोनम वांगचुक पर एनएसए लगाया गया और जंतर-मंतर पर उनका अनशन चर्चा का विषय रहा, जिसे बाद में जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह ने तुड़वाया था। इसके अलावा किरण रिजिजू ने यह बयान दिया था कि अमित शाह लद्दाख को आर्टिकल 371 (K) देने के लिए सहमत हो गए हैं। गृह मंत्रालय की ओर से भी लद्दाख के नेताओं को विधानसभा वाली यूनियन टेरिटरी बनाने का भरोसा दिया गया है, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी जमीनी स्तर पर मूल समस्या जस की तस बनी हुई है।
गृह मंत्रालय के साथ बैठकों का दौर और लिखित मांग
लद्दाख एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के प्रतिनिधियों ने 9 सितंबर को गृह मंत्रालय के अधिकारियों के साथ एक अहम बैठक की थी। इस बैठक में मुख्य रूप से लद्दाख के लिए पूर्ण स्टेटहुड की मांग पर विस्तार से चर्चा की गई। हालांकि इस दौरान आर्टिकल 371 (K) को लागू करने का केवल मौखिक आश्वासन ही मिला है, लेकिन अब लद्दाख के नेता किसी भी मौखिक वादे के बजाय एक ठोस और लिखित ड्राफ्ट की मांग कर रहे हैं, ताकि भविष्य को लेकर कोई संदेह न रहे।
सोनम वांगचुक की चेतावनी और आंदोलन की रूपरेखा
बातचीत का अहम हिस्सा रहे सोनम वांगचुक ने सरकार को एक बार फिर कड़ी चेतावनी दी है। उनका साफ कहना है कि अगर 9 सितंबर की बैठक के बाद कोई लिखित रोडमैप सामने नहीं आता है, तो क्षेत्र में दोबारा आंदोलन का दौर शुरू हो जाएगा। वांगचुक ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार की तरफ से लद्दाख के मुख्य मुद्दों पर कोई पुख्ता आश्वासन नहीं मिला, तो वे 19 से 24 सितंबर के बीच नया आंदोलन शुरू करने से पीछे नहीं हटेंगे। इस सिलसिले में एक बड़ी पदयात्रा का भी ऐलान किया गया था, जिसे फिलहाल कन्वीनर सज्जाद कारगिली ने होल्ड पर रखा हुआ है। एलएबी और केडीए का मानना है कि गृह मंत्रालय के मौखिक वादों में वजन है और एक चुनी हुई बॉडी तथा चीफ मिनिस्टर का पद मिलना स्टेटहुड की दिशा में एक सकारात्मक शुरुआती कदम साबित हो सकता है।
चीफ मिनिस्टर की शक्तियों को लेकर फंसा मुख्य पेंच
वर्तमान विवाद की असली जड़ इस बात पर टिकी है कि नए चीफ मिनिस्टर के पास प्रशासनिक और कार्यकारी शक्तियां कितनी होंगी। लद्दाख के नेता इस मामले में पुडुचेरी मॉडल की मांग कर रहे हैं, जिसके तहत पुलिस सीधे तौर पर चुनी हुई सरकार को रिपोर्ट करती है। इसके विपरीत, गृह मंत्रालय का प्रस्ताव दिल्ली मॉडल के काफी करीब नजर आता है, जहां कानून और व्यवस्था से जुड़े अधिकार सीधे लेफ्टिनेंट गवर्नर के नियंत्रण में रहते हैं। यह वैचारिक अंतर बातचीत की मेज पर एक बड़ा रोड़ा बनकर सामने आया है। इसके साथ ही, नए डिस्ट्रिक्ट काउंसिल चुनाव कराने के ऐलान ने भी स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
नए जिलों के बंटवारे और काउंसिल चुनावों की टाइमिंग पर सवाल
लेफ्टिनेंट गवर्नर वीके सक्सेना ने हाल ही में एक बड़ा कदम उठाते हुए सभी 7 जिलों में लद्दाख ऑटोनॉमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल बनाने की मंजूरी दे दी है, जबकि अब तक यह व्यवस्था केवल कारगिल और लेह तक ही सीमित थी। एलजी इसे जमीनी लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम करार दे रहे हैं। हालांकि लद्दाख के नेता यह सवाल उठा रहे हैं कि इन चुनावों को प्रस्तावित यूटी असेंबली के चुनावों के साथ ही क्यों नहीं कराया जा सकता। दूसरी तरफ, कारगिल के नेताओं को नए जिलों के प्रशासनिक बंटवारे पर भी भारी ऐतराज है। उनका तर्क है कि सांकू, शरगोल और कारगिल सबसे दूरदराज के इलाके हैं और वहां आबादी का घनत्व अधिक होने के कारण उन्हें अलग जिले का दर्जा मिलना चाहिए।
विंटर सेशन में संविधान संशोधन और आगे की राह
पिछले एक साल के दौरान केंद्र सरकार और लद्दाख के राजनीतिक दलों ने संवाद के मोर्चे पर काफी लंबा सफर तय किया है। अब स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री के स्तर से एक अंतिम राजनीतिक पहल की दरकार है। इस कदम से नॉर्दर्न फ्रंटियर के निवासियों के मन में बैठा शक हमेशा के लिए दूर हो सकता है। आने वाला एक महीना इस पूरे घटनाक्रम के लिहाज से बेहद क्रूशियल साबित होने वाला है। यदि सरकार जमीन पर आर्टिकल 371 (K) को लेकर कोई ठोस कार्रवाई करती है, तो वहां का माहौल पूरी तरह बदल जाएगा। आने वाले विंटर सेशन में अगर संविधान संशोधन विधेयक लाया जाता है, तो लद्दाख में जश्न का माहौल बन सकता है। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ये मौखिक वादे और गायब ड्राफ्ट वहां के लोगों के बीच तनाव की मुख्य वजह बने रहेंगे।



















