मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक ऐसी खास मेहमान पहुंची है, जिसे देखने के लिए स्थानीय लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है। यह कोई आम जानवर नहीं, बल्कि आंध्र प्रदेश की बेहद दुर्लभ 'पुंगनूर' प्रजाति की गाय है। अपनी आश्चर्यजनक रूप से छोटी ऊंचाई, लाखों रुपये की भारी-भरकम कीमत और औषधीय गुणों से भरपूर महंगे दूध के कारण यह छोटी गाय पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। सागर में निर्माणाधीन इस्कॉन मंदिर के परिसर में इस नन्ही गाय की मौजूदगी ने देसी नस्लों के संरक्षण और उनके गहरे धार्मिक महत्व पर एक बार फिर से सबका ध्यान खींचा है।
तिरुपति बालाजी से गहरा नाता और प्रजाति का महत्व
भारत में प्राचीन सनातन काल से ही गौवंश का अत्यंत सम्मान रहा है और इनका गहरा सामाजिक महत्व है। वर्तमान समय में देश भर में बावन से अधिक देसी प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से आंध्र प्रदेश की पुंगनूर नस्ल को सबसे अनूठा और पवित्र माना जाता है। इस प्रजाति का धार्मिक महत्व इस बात से भी साफ समझा जा सकता है कि विश्व प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर का पवित्र अभिषेक इसी पुंगनूर गाय के दूध से किया जाता है। इसके दूध में मौजूद उच्च वसा और अद्वितीय पोषक तत्वों के कारण इसकी मांग बहुत ज्यादा है। सामान्य दिनों में भी इसका दूध काफी महंगे दामों पर बिकता है, लेकिन धार्मिक अनुष्ठानों और विशेष पूजा-पाठ में इसके उपयोग के कारण इसकी कीमत और भी कई गुना बढ़ जाती है।
सागर इस्कॉन में आकर्षण का केंद्र: रति मंजरी और बलराम
वर्तमान में आंध्र प्रदेश से यह विशेष जोड़ा सागर के इस्कॉन मंदिर में लाया गया है, जहां इनकी बहुत कम ऊंचाई हर किसी को हैरान कर रही है। एक पूर्ण विकसित पुंगनूर गाय की अधिकतम ऊंचाई महज पौने तीन फीट तक होती है। इस्कॉन मंदिर में लाए गए इस जोड़े का रंग हल्का लाल और भूरा है। मंदिर के सेवादारों ने बड़े ही स्नेह से इस बछिया का नाम 'रति मंजरी' रखा है, जबकि उसके साथी नर का नाम 'बलराम' है। बलराम की ऊंचाई लगभग तीन फीट है। रति मंजरी अभी ठीक बारह महीने की है और मंदिर प्रबंधन के अनुसार, जब वह दो साल और तीन महीने की उम्र पूरी कर लेगी, तब वह दूध देना शुरू कर देगी। यह जोड़ा देखने में भले ही बहुत छोटा हो, लेकिन शारीरिक रूप से यह पूरी तरह से विकसित है।
सीमित आहार और शहरी वातावरण के लिए सबसे अनुकूल
इस्कॉन मंदिर से जुड़े गौरी दास महाराज ने इस दुर्लभ नस्ल की कई खूबियां विस्तार से गिनाई हैं। उनका कहना है कि पुंगनूर मूल रूप से दक्षिण भारत की एक अत्यंत प्राचीन देसी प्रजाति है, जिसकी संख्या अब भारत में बहुत कम बची है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे बड़े शहरों और महानगरों में भी बेहद आसानी से पाला जा सकता है। इसके लिए किसी बड़े खेत या विशाल गौशाला की बिल्कुल भी जरूरत नहीं होती। अपने छोटे आकार के कारण यह बहुत कम जगह घेरती है और सीमित संसाधनों में भी आराम से रह लेती है। यदि इसके खान-पान की बात करें, तो इसकी दैनिक खुराक बहुत कम है। यह पूरे दिन में केवल चार किलो सूखा भूसा, एक किलो हरा चारा और थोड़ा सा आटा सानी खाती है। इसका स्वभाव इतना शांत और सौम्य होता है कि घर के छोटे बच्चे से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक आसानी से इसकी देखभाल कर सकते हैं। इसके अलावा, यह प्रजाति भारत के किसी भी हिस्से की जलवायु के अनुकूल खुद को बहुत जल्दी ढाल लेती है।
लाखों में कीमत और औषधीय गुणों वाला महंगा दूध
इस गाय की कीमत और इसके दूध के दाम किसी को भी आश्चर्य में डाल सकते हैं। गौरी दास महाराज के अनुसार, एक उच्च गुणवत्ता वाली, शुद्ध वंशावली या गर्भित पुंगनूर गाय की बाजार में कीमत तीन लाख रुपये से शुरू होकर दस लाख रुपये या उससे भी अधिक तक जाती है। वहीं, इसकी छोटी बछिया भी चालीस हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक में बिकती है। यह नस्ल प्रतिदिन अधिकतम डेढ़ से दो लीटर तक ही दूध का उत्पादन करती है। उत्पादन कम होने और औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण, बड़े महानगरों में इसका दूध एक हजार रुपये से लेकर पंद्रह सौ रुपये प्रति लीटर तक के भारी-भरकम दामों पर आसानी से बिक जाता है।
सागर इस्कॉन का भव्य मंदिर और गौ-संरक्षण का संकल्प
देसी गायों के संरक्षण की इस अनूठी पहल के पीछे एक बड़ा उद्देश्य छिपा है। गौरी दास बताते हैं कि सागर में पचास करोड़ रुपये की भारी लागत से एक बेहद भव्य इस्कॉन मंदिर का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। इस भव्य मंदिर परिसर में एक अत्यंत विशाल गौशाला का निर्माण किया जाएगा। इस गौशाला का मुख्य उद्देश्य केवल दूध उत्पादन नहीं होगा, बल्कि यहां पूरे भारत के हर राज्य से देसी नस्ल की विशेष प्रजातियों को लाकर उनका संरक्षण किया जाएगा। इसके माध्यम से मंदिर प्रबंधन आम लोगों को इन दुर्लभ देसी प्रजातियों के बारे में जागरूक करेगा और उन्हें गौ-सेवा से दोबारा जोड़ने का एक सार्थक प्रयास करेगा।


















