देशभर में मानसून की चाल इस समय दोतरफा रुख दिखा रही है. एक तरफ जहां सितंबर की शुरुआत सूखे जैसे हालात और भारी बारिश की कमी के साथ हुई है, वहीं दूसरी तरफ मौसम विभाग (IMD) ने आने वाले सात दिनों में देश के कई हिस्सों में झमाझम बारिश की उम्मीद जताई है. सितंबर के पहले सप्ताह में बारिश के आंकड़ों में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिसके पीछे अल नीनो के प्रभाव को मुख्य वजह माना जा रहा है. हालांकि, बंगाल की खाड़ी में बने एक नए निम्न दबाव के क्षेत्र और पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता ने अब राहत की उम्मीद जगा दी है. इस दोहरे मौसमी बदलाव के कारण उत्तर, पूर्व, मध्य और दक्षिण भारत के तमाम राज्यों में बादलों के बरसने का नया दौर शुरू होने जा रहा है.
अल नीनो का साया और सितंबर में बारिश का बड़ा घाटा
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, सितंबर के शुरुआती दिनों में देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है. आंकड़ों पर नजर डालें तो 3 सितंबर से लेकर 9 सितंबर के बीच देश में सामान्य से लगभग 36 प्रतिशत कम बारिश रिकॉर्ड की गई है. इस भारी गिरावट के कारण वर्तमान 2026 मानसून सीजन का कुल संचयी घाटा बढ़कर 15 प्रतिशत पर पहुंच गया है. सबसे गंभीर स्थिति दक्षिण प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में देखने को मिल रही है, जहां वर्षा का सबसे बड़ा अभाव दर्ज किया गया है. दूसरी ओर, उत्तर और पूर्वी भारत में इस दौरान लगातार मध्यम से लेकर तेज बारिश का सिलसिला जारी रहा, जिससे कुछ हद तक संतुलन बना रहा.
इस कमजोर मानसूनी गतिविधि के पीछे अल नीनो के रौद्र रूप को जिम्मेदार माना जा रहा है. दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिकों ने इस बार अल नीनो के बेहद मजबूत होने की चेतावनी पहले ही दे दी थी. इस भौगोलिक घटना के कारण प्रशांत महासागर का पानी गर्म हो जाता है, जिसका सीधा असर वैश्विक मानसून प्रणालियों पर पड़ता है. मजबूत अल नीनो के कारण न केवल भारत में मानसूनी बारिश प्रभावित हो रही है, बल्कि इससे औसत तापमान में लगातार बढ़ोतरी की आशंका भी बनी हुई है. मौसम पर बारीक नजर रखने वाली संस्था स्काईमेट वेदर से जुड़े मौसम विशेषज्ञ महेश पहलावत ने इस संबंध में चिंता जताई है. उन्होंने सोशल मीडिया मंच पर जानकारी साझा करते हुए बताया है कि यदि आने वाले हफ्तों में पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो यह अंतर और भी गहरा हो जाएगा, जिसका सीधा असर हमारी कृषि, जलाशयों के स्तर और अंततः पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मानसून का अत्यधिक महत्व है क्योंकि देश की आधी से अधिक आबादी आज भी सीधे तौर पर कृषि गतिविधियों से जुड़ी हुई है. खरीफ फसलों, जैसे धान, दलहन और तिलहन की बुआई और उनके विकास के लिए जून से सितंबर के दौरान होने वाली बारिश अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में सितंबर के पहले सप्ताह में दर्ज की गई 36% की कमी ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं. दक्षिण भारत के राज्यों जैसे कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में मिट्टी की नमी तेजी से घट रही है, जिसका सीधा असर फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है. मौसम विशेषज्ञ ने संकेत दिया है कि यदि यह सूखा लंबे समय तक खिंचता है, तो पानी की भारी किल्लत हो सकती है, जो न केवल फसलों को नुकसान पहुंचाएगी बल्कि घरेलू उपयोग और पनबिजली उत्पादन के लिए जलाशयों में पानी के स्तर को भी कम कर देगी.
एक साथ सक्रिय हुईं कई मौसमी प्रणालियां
इस भारी कमी के बीच राहत की खबर यह है कि भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार कई मौसमी प्रणालियां एक साथ सक्रिय हो रही हैं. बंगाल की खाड़ी के उत्तर-पश्चिम हिस्से में बना एक निम्न दबाव का क्षेत्र अब और मजबूत हो रहा है. शुक्रवार, 11 सितंबर की सुबह तक यह क्षेत्र उत्तर-पश्चिम और पश्चिम-मध्य बंगाल की खाड़ी के ऊपर, दक्षिण ओडिशा तथा उत्तरी आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों के समीप केंद्रित था. मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगले 24 घंटों में यह सिस्टम और अधिक स्पष्ट होकर पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर आगे बढ़ेगा, जिससे तटीय आंध्र प्रदेश और दक्षिणी ओडिशा में भारी बारिश की शुरुआत होगी.
इसके अतिरिक्त, मानसून की ट्रफ रेखा भी इस समय अनुकूल स्थिति में है, जो उत्तरी राजस्थान से होकर बंगाल की खाड़ी में बने निम्न दबाव के केंद्र तक फैली हुई है. साथ ही, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक से लेकर मन्नार की खाड़ी तक एक अन्य ट्रफ सक्रिय बनी हुई है. इसके अलावा, दक्षिण कोंकण के करीब पूर्व-मध्य अरब सागर के वायुमंडल में एक चक्रवाती परिसंचरण (साइक्लोनिक सर्कुलेशन) बना हुआ है. वहीं, उत्तर भारत के हिस्से में एक पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय है जो उत्तरी पंजाब और उसके आसपास के इलाकों में निचले और मध्यम क्षोभमंडल स्तर पर प्रभाव डाल रहा है. इन सभी प्रणालियों के संयुक्त प्रभाव से पूरे देश में मानसूनी बादल फिर से सक्रिय हो रहे हैं.
मौसमी प्रणालियों के आपस में जुड़ने से वायुमंडलीय दबाव में तेजी से बदलाव आ रहा है. बंगाल की खाड़ी के ऊपर बना निम्न दबाव का क्षेत्र मानसून को फिर से सक्रिय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है. शुक्रवार सुबह 8.30 बजे यह दबाव क्षेत्र आंध्र प्रदेश और ओडिशा के तटों के पास केंद्रित था और धीरे-धीरे उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ रहा था. इसकी वजह से समुद्र से नम हवाएं देश के जमीनी हिस्सों में तेजी से प्रवेश कर रही हैं. इसके अतिरिक्त, अरब सागर में कोंकण तट के समीप बने चक्रवाती सर्कुलेशन के कारण पश्चिमी तटों पर भी हवाओं का रुख मजबूत हो रहा है. उत्तरी पंजाब में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ जब इन नम मानसूनी हवाओं से टकराएगा, तो मैदानी इलाकों में भारी गर्जना के साथ बारिश की स्थिति पैदा होगी. इन सभी कारकों के कारण आने वाले सात दिनों तक देश के मध्य और पूर्वी राज्यों में भारी वर्षा की अनुकूल परिस्थितियां बनी रहेंगी.
दिल्ली-NCR और मैदानी राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट
इस नए बदलाव का असर देश की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में भी व्यापक रूप से दिखने वाला है. मौसम विभाग ने दिल्ली, हरियाणा और चंडीगढ़ में 11 सितंबर से लेकर 17 सितंबर के बीच लगातार हल्की से मध्यम बारिश होने का अनुमान व्यक्त किया है. हालांकि, सबसे अधिक ध्यान देने वाली तारीखें 13 और 14 सितंबर हैं, जब इन राज्यों में कुछ स्थानों पर बहुत भारी बारिश होने की आशंका है. मौसम विभाग ने इन दो दिनों के लिए विशेष सावधानी और सतर्कता बरतने की हिदायत दी है क्योंकि भारी जलभराव से सामान्य जनजीवन प्रभावित हो सकता है.
उत्तर प्रदेश के मौसम में भी इसी प्रकार का बदलाव देखने को मिलेगा. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों में 11 सितंबर को व्यापक रूप से घने बादलों के साथ बारिश होने की उम्मीद है. इसके बाद, 12 सितंबर से लेकर 17 सितंबर के दौरान राज्य के अलग-अलग हिस्सों में रुक-रुक कर बारिश का सिलसिला लगातार बना रहेगा. पर्वतीय राज्यों में भी मानसूनी गतिविधियां तेज होने वाली हैं. उत्तराखंड में 14 सितंबर तक कई स्थानों पर व्यापक रूप से भारी बारिश की संभावना व्यक्त की गई है, जिससे पहाड़ी रास्तों पर भूस्खलन का खतरा भी बढ़ सकता है. जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों में भी आने वाले दिनों में बादलों की मेहरबानी जारी रहने वाली है.
बिहार और ओडिशा में बाढ़ और मूसलाधार बारिश का खतरा
पूर्वी भारत के राज्यों के लिए आगामी कुछ दिन काफी संवेदनशील हो सकते हैं. बिहार में पहले से ही कई जिले बाढ़ की गंभीर विभीषिका का सामना कर रहे हैं. ऐसे नाजुक हालातों के बीच, मौसम विभाग ने पूर्वानुमान जताया है कि 16 और 17 सितंबर को बिहार के कई हिस्सों में मूसलाधार बारिश हो सकती है. यदि ऐसा होता है, तो पहले से ही उफान पर चल रही नदियों का जलस्तर और अधिक बढ़ जाएगा, जिससे बाढ़ की स्थिति बदतर होने की गंभीर आशंका है. स्थानीय प्रशासन को इस खतरे के प्रति अलर्ट कर दिया गया है.
इसके साथ ही, ओडिशा में भी अत्यंत भारी वर्षा होने के आसार जताए गए हैं. उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में भी 13 सितंबर तथा 16-17 सितंबर को मूसलाधार बारिश होने की संभावना है. इन क्षेत्रों में बारिश के साथ तेज हवाएं चलने, बिजली गिरने और भीषण गरज-चमक की भी चेतावनी जारी की गई है. छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कुछ इलाकों में 11 सितंबर को भी भारी से बहुत भारी बारिश दर्ज की जा सकती है. मौसम विभाग के इस व्यापक बदलाव से जहां एक तरफ सूखे का सामना कर रहे किसानों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ पहाड़ी और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह नई चुनौतियां भी खड़ा कर सकता है.



















