नैनीताल जिले में मानसून की सक्रियता के साथ ही भूस्खलन और जमीन धंसने का संकट फिर से गहरा गया है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में पहाड़ियों से मलबा आने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इस समय सबसे गंभीर स्थिति 'सात नंबर' यानी अल्मा कॉटेज इलाके में बनी हुई है। यहां करीब दो साल पहले भूस्खलन के कारण सड़क का एक बड़ा हिस्सा टूट गया था। उस समय उचित सुरक्षा उपायों के अभाव में यह समस्या सुलझ नहीं पाई, जिसका परिणाम यह है कि अब लगातार हो रही बारिश के चलते यहां की जमीन तेजी से खिसकने लगी है।
मरम्मत में देरी और स्थानीय लोगों का दर्द
इस क्षेत्र में रहने वाले परिवारों का कहना है कि वे बीते दो वर्षों से एक निरंतर डर के साये में जी रहे हैं। हाल ही में हुए भूस्खलन की घटनाओं के बाद प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से मकान खाली करने के आदेश जारी किए हैं। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि जब मौसम खुला था और समय हाथ में था, तब मरम्मत का काम नहीं किया गया। अब जबकि बारिश का दौर शुरू हो चुका है और जमीन नीचे गिर रही है, प्रशासन ने उन्हें घर छोड़ने को कह दिया है, लेकिन उनके सामने यह बड़ा सवाल खड़ा है कि वे आखिर जाएं तो कहां जाएं।
स्थानीय निवासी तनुजा आर्या ने स्थिति की गंभीरता को बयां करते हुए बताया कि उनके मकान के ठीक नीचे वाली सड़क पूरी तरह धंस चुकी है। प्रशासन ने घर छोड़ने का फरमान तो सुना दिया, लेकिन उनके रहने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर कोई ठोस जानकारी नहीं दी गई है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले साल भी यहीं पर भूस्खलन हुआ था, लेकिन तब कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। उनका मानना है कि यदि समय रहते सड़क की मरम्मत कर दी जाती, तो आज स्थिति इतनी विकट नहीं होती। हरि प्रसाद आर्या का कहना है कि प्रशासन ने छह महीने का किराया देने का वादा जरूर किया है, लेकिन सबसे पहले यह तय होना चाहिए कि इन परिवारों को सुरक्षित रूप से कहां शिफ्ट किया जाएगा।
किराए के मकान और प्रशासनिक लापरवाही का बोझ
नैनीताल जैसे पर्वतीय शहर में किराये का मकान ढूंढना आसान काम नहीं है, और यहां रहने के लिए अक्सर 15 हजार रुपये या उससे अधिक का मासिक किराया चुकाना पड़ता है। हरि प्रसाद के अनुसार, उनके पांच भाइयों समेत कुल 11 परिवारों को घर खाली करने के निर्देश मिले हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सड़क चौड़ीकरण के बाद इस मार्ग पर भारी वाहनों का दबाव बढ़ा, जिससे जमीन का कटाव और अधिक खतरनाक हो गया। पिछले साल जो मलबा गिरा था, उसे भी पूरी तरह साफ नहीं किया गया, जिससे मिट्टी की पकड़ कमजोर होती चली गई।
तनुजा और हरि प्रसाद जैसे निवासियों का स्पष्ट मानना है कि यह सब प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है। यदि सड़क का ट्रीटमेंट समय पर हो गया होता, तो आज उनके आवास सुरक्षित होते। वहीं, कमला देवी ने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया कि भूस्खलन के डर से उनका परिवार रात भर सो नहीं पा रहा है। उनके साथ छोटे बच्चे और बुजुर्ग भी हैं, जिससे उनकी चिंता दोगुनी हो गई है। उनका कहना है कि वर्षों से क्षतिग्रस्त सड़क की मरम्मत न होना प्रशासन की उदासीनता को दर्शाता है। भारी सामान और परिवार के साथ अचानक कहीं और शिफ्ट होना हर किसी के लिए संभव नहीं है।
प्रशासन का पक्ष और भविष्य की कार्ययोजना
इस मामले पर उपजिलाधिकारी (एसडीएम) नवाजिश खलीक का कहना है कि प्रभावित परिवारों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन पूरी तरह गंभीर है और यह उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने जानकारी दी कि सात नंबर क्षेत्र से कुल 11 परिवारों की पहचान की गई है जो इस भूस्खलन की जद में हैं। प्रशासन इन सभी को आवश्यक सुविधाओं के साथ सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की योजना बना रहा है। साथ ही, प्रभावित इलाके के स्थायी समाधान के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार की जा रही है।
इस काम के लिए संबंधित विभागों को जिम्मेदारी सौंपी गई है और मंडलायुक्त ने भी जल्द से जल्द रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया है। हालांकि, मानसून के मौसम में पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा हर वर्ष बढ़ जाता है। सात नंबर क्षेत्र के निवासियों के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता सुरक्षित पुनर्वास की है। लोगों का स्पष्ट रूप से कहना है कि अस्थायी राहत के साथ-साथ यदि जल्द ही स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले दिनों में खतरा और बढ़ सकता है।











