राजस्थान के पाली जिले में स्थित रोहट क्षेत्र के किसान बीते कई वर्षों से सिंचाई के लिए उपलब्ध खारे पानी की समस्या से परेशान थे। अत्यधिक लवणीय जल के कारण यहां की भूमि को खेती के लिहाज से अनुपयोगी मान लिया गया था, जिससे कृषि पैदावार लगातार घट रही थी। इस विकट स्थिति के बीच केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जिसे संक्षेप में काजरी कहा जाता है, के वैज्ञानिकों ने एक आधुनिक कृषि तकनीक विकसित की है। यह नवोन्मेषी तकनीक खारे जल वाले क्षेत्रों में भी बेहतर फसल उत्पादन को संभव बनाती है। इस नई प्रणाली के जरिए रोहट के उन खेतों में अब उन्नत किस्म के बेर और ड्रैगन फ्रूट की बागवानी की जाएगी, जिन्हें अब तक बंजर समझा जाता था। यह वैज्ञानिक पहल रोहट के कृषक समुदाय के जीवन स्तर को संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
लवणता की चुनौती और बूंद-बूंद सिंचाई का वैज्ञानिक समाधान
काजरी की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कमला चौधरी ने खारे पानी से खेती करने के दौरान उत्पन्न होने वाली वैज्ञानिक बाधाओं का विस्तृत ब्योरा दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब लवणीय जल का उपयोग पारंपरिक रूप से खेतों में बहाव बनाकर किया जाता है, तब सूर्य की गर्मी से जल वाष्पित होकर उड़ जाता है। इस प्रक्रिया के कारण भूमि की ऊपरी सतह पर नमक की एक मोटी परत जम जाती है। नमक का यह जमाव पौधों की जड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचाता है और उन्हें सुखा देता है, जिससे फसल पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
इस जटिल समस्या से निपटने के लिए काजरी के विशेषज्ञों ने ड्रिप इरिगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली को एक प्रभावी समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है। डॉ. कमला चौधरी ने कहा, "ड्रिप तकनीक के माध्यम से पानी सीधे पौधे की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे मिट्टी में लवणता का असर बहुत कम हो जाता है।" इस सिंचाई पद्धति के साथ ही वैज्ञानिकों ने एक विशेष न्यूट्रिशन प्लान भी तैयार किया है। इसके अंतर्गत प्रतिकूल मौसमी स्थितियों और लवणीय वातावरण में भी पौधों के त्वरित विकास के लिए प्रति पौधा 50 ग्राम का विशेष पोषण प्रबंधन दिया जा रहा है। इस तकनीक के सफल क्रियान्वयन के बाद रोहट क्षेत्र के खेतों में उन्नत गुणवत्ता वाले बेर तथा ड्रैगन फ्रूट के पौधों का रोपण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है।
फसल विविधीकरण से किसानों की आय में तीन गुने इजाफे की उम्मीद
पाली तथा रोहट के भूजल में खारेपन की बहुलता को ध्यान में रखते हुए काजरी के अनुसंधानकर्ताओं ने विभिन्न फलदार फसलों पर कई गहन अध्ययन किए। काजरी के वैज्ञानिक डॉ. विजय सिंह के अनुसार, विभिन्न किस्मों पर किए गए परीक्षणों में ड्रैगन फ्रूट का प्रदर्शन सबसे ज्यादा आशाजनक और उत्साहजनक रहा है। लवणीय जल और कम नमी वाली स्थितियों को सहन करने में ड्रैगन फ्रूट अत्यधिक सक्षम साबित हुआ है।
कृषि में विविधीकरण के महत्व पर जोर देते हुए डॉ. विजय सिंह ने बताया, "पारंपरिक खेती की तुलना में यदि किसान फसल विविधीकरण अपनाएं, तो उनकी आय सीधे दोगुनी से तीन गुनी तक हो सकती है।" ड्रैगन फ्रूट वर्तमान समय में एक उच्च मूल्य वाली वाणिज्यिक फसल है, जिसकी शहरी तथा क्षेत्रीय बाजारों में भारी मांग बनी रहती है। कम जल खपत और उच्च सहनशीलता के कारण यह फल खारे पानी से प्रभावित क्षेत्रों के लिए बेहद लाभदायक माना जा रहा है। इसके साथ ही बेर की उन्नत किस्में भी किसानों के लिए आर्थिक रूप से काफी फायदेमंद सिद्ध हो रही हैं।
प्रयोगशाला से खेतों तक: काजरी का जमीनी प्रशिक्षण अभियान
वैज्ञानिक शोध को केवल प्रयोगशालाओं और शोध पत्रों तक सीमित न रखते हुए काजरी पाली केंद्र ने किसानों को व्यावहारिक रूप से सक्षम बनाने की दिशा में व्यापक प्रयास शुरू किए हैं। काजरी के विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम रोहट क्षेत्र में जमीनी स्तर पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है। इन अभियानों का मुख्य उद्देश्य कृषकों के मन से लवणीय जल के उपयोग से जुड़े भ्रम और भय को पूरी तरह दूर करना है।
इन प्रशिक्षण सत्रों के दौरान किसानों को काजरी के खुद के प्रदर्शन खेतों में लाया जाता है। वहां उन्हें प्रत्यक्ष रूप से दिखाया जाता है कि कैसे सही वैज्ञानिक तकनीक, ड्रिप सिंचाई और 50 ग्राम विशेष पोषण प्रबंधन के संयोजन से खारे पानी में भी बंपर फसल प्राप्त की जा सकती है। जो किसान पहले अपनी जमीनों को अनुपजाऊ मानकर हताश हो चुके थे, वे अब काजरी के वैज्ञानिकों से नियमित मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे हैं। रोहट के अनेक कृषक अब अपनी भूमि पर ड्रैगन फ्रूट और बेर के नए बाग स्थापित करने की तैयारियों में जुट गए हैं।



















