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पलामू में सितंबर में धान की रोपाई पर मंडरा रहा है ठंड का खतरा, कृषि वैज्ञानिकों ने बताए बचाव के उपायझारखंड
4 सित॰ 2026, 2:59 pm (21 दिन पहले)· 2

पलामू में सितंबर में धान की रोपाई पर मंडरा रहा है ठंड का खतरा, कृषि वैज्ञानिकों ने बताए बचाव के उपाय

पलामू में मानसून की शुरुआत में कम बारिश होने के कारण कई किसानों ने सितंबर महीने में धान की रोपाई की है। कृषि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि देर से रोपाई करने पर ठंड का असर फसल की बढ़वार और दाना भरने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

पलामू जैसे क्षेत्रों में खेती का पूरा गणित मानसून की मेहरबानी पर टिका रहता है। यह इलाका रेन शैडो जोन के अंतर्गत आता है, जहां अमूमन अन्य जगहों की तुलना में कम बारिश दर्ज की जाती है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण खरीफ सीजन में किसानों को हमेशा से ही अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है। पारंपरिक फसलों की सूची में धान यहां के किसानों की पहली पसंद रहा है। किसान सबसे पहले धान का बिचड़ा तैयार करते हैं और फिर खेतों में पानी भरने का इंतजार करते हैं ताकि रोपाई का काम शुरू किया जा सके।

मानसून की देरी और सितंबर में रोपाई

पलामू जिले के कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, इस साल मानसून की शुरुआत धीमी रही और कम बारिश के चलते किसानों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। हालांकि, अगस्त के महीने में बाद में हुई अच्छी और कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा बारिश ने किसानों की उम्मीदों को फिर से जगा दिया। खेतों में पर्याप्त पानी इकट्ठा होने के बाद अब कई किसान सितंबर के महीने में भी धान की रोपाई करने में जुटे हुए हैं। किसानों का मानना है कि भले ही प्रक्रिया में देरी हुई है, लेकिन उनकी धान की फसल अंततः पककर तैयार हो जाएगी।

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कम तापमान और ठंड का बढ़ता जोखिम

सितंबर के दौरान धान की रोपाई करने वाले किसानों को कुछ बेहद खास तकनीकी बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। आमतौर पर तय समय पर रोपाई होने पर फसल को अपने सभी विकास चरणों को पूरा करने के लिए भरपूर समय मिलता है। लेकिन जब रोपाई सितंबर तक खींच जाती है, तो फसल का चक्र आगे खिसक जाता है और वह नवंबर से दिसंबर के ठंड के महीनों तक खेतों में खड़ी रहती है। इस समयावधि के दौरान वातावरणीय तापमान में लगातार गिरावट दर्ज की जाती है।

फसल के विकास और दाना भरने पर असर

तापमान में भारी कमी का सीधा असर धान के पौधों की बढ़वार, कल्ले फूटने की प्रक्रिया और बालियों में दाना भरने की अवस्था पर पड़ता है। जब ठंड बढ़ने लगती है, तो पौधों में नए फुटाव और अनाज के निर्माण की प्राकृतिक क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। इस पूरी स्थिति का अंतिम परिणाम कुल उत्पादन में गिरावट के रूप में सामने आता है। यही मुख्य कारण है कि कृषि विशेषज्ञों ने देर से रोपाई करने वाले किसानों को फसल प्रबंधन पर बहुत बारीकी से नजर रखने की सलाह दी है।

उर्वरक प्रबंधन और संतुलित पोषण

विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा है कि ऐसी विलंब से लगाई गई फसलों को सही समय पर और पर्याप्त पोषण देना अनिवार्य है। किसानों को अपनी मिट्टी की मौजूदा स्थिति और फसल की वास्तविक मांग के अनुसार ही संतुलित मात्रा में खाद और उर्वरक का उपयोग करना चाहिए। विशेष रूप से पोटाश का इस्तेमाल पौधों को अंदरूनी मजबूती देने और बदलते मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में फसल की सहनशक्ति बढ़ाने के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। हालांकि, बिना सोचे-समझे उर्वरकों की मात्रा बढ़ाने के बजाय मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में ही खाद डालना सबसे सुरक्षित तरीका माना गया है।

चारे की जरूरत और खेत खाली न रखने की मजबूरी

इसके बावजूद कि रोपाई में काफी देरी हो चुकी है, किसान अपने खेतों को खाली छोड़ने से बचना चाहते हैं। इसके पीछे एक बड़ा व्यावहारिक कारण यह भी है कि धान की खेती से केवल खाने के लिए अनाज ही नहीं मिलता, बल्कि पशुओं के लिए पौष्टिक चारा भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है। इसका मतलब यह है कि भले ही समय पर लगाई गई फसल की तुलना में कुल उत्पादन थोड़ा कम मिल सके, लेकिन किसान इसे अपने मवेशियों के लिए एक अतिरिक्त और जरूरी उपयोग के रूप में देखते हैं।

नियमित निगरानी और जल प्रबंधन

अंत में, सितंबर के महीने में धान की रोपाई करने वाले तमाम किसानों के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि वे अपनी फसल की हर गतिविधि पर लगातार नजर रखें। खेतों में नमी और पानी की जरूरत को संतुलित बनाए रखना तथा पौधों में किसी भी पोषक तत्व की कमी न होने देना सफलता की कुंजी है। मौसम में ठंड पूरी तरह से दस्तक दे, उससे पहले ही फसल को सही पोषण मुहैया कराना और समय पर खेत का उचित प्रबंधन करना ही उत्पादन के स्तर को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकता है।

सवाल-जवाब

पलामू में इस साल धान की रोपाई देरी से क्यों हुई?
मानसून के शुरुआती दौर में कम बारिश होने के कारण कई किसानों को समय पर रोपाई करने में परेशानी आई थी।
सितंबर में धान की रोपाई करने वाले किसानों को किस मुख्य समस्या का सामना करना पड़ सकता है?
नवंबर और दिसंबर में तापमान गिरने से धान की बढ़वार, कल्ले फूटने और दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
देर से रोपाई करने पर कृषि वैज्ञानिकों ने कौन सा उर्वरक इस्तेमाल करने की सलाह दी है?
वैज्ञानिकों ने पौधों को मजबूती देने और सहनशीलता बढ़ाने के लिए संतुलित मात्रा में पोटाश के प्रयोग की सलाह दी है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने किसानों को खाद डालने से पहले क्या करने को कहा है?
उन्होंने बिना सलाह के मात्रा बढ़ाने के बजाय मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेने को कहा है।
देर से रोपाई के बावजूद किसान खेत खाली क्यों नहीं छोड़ना चाहते?
धान की फसल से अनाज के साथ-साथ पशुओं के लिए बहुमूल्य चारा भी प्राप्त होता है।
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