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पलामू में स्ट्रॉबेरी की खेती से किसान कमाएंगे बंपर मुनाफा, डॉ प्रमोद कुमार ने बताए वैज्ञानिक तरीके और सरकारी सब्सिडी का लाभझारखंड
18 सित॰ 2026, 7:07 pm (7 दिन पहले)· 2

पलामू में स्ट्रॉबेरी की खेती से किसान कमाएंगे बंपर मुनाफा, डॉ प्रमोद कुमार ने बताए वैज्ञानिक तरीके और सरकारी सब्सिडी का लाभ

पलामू में आधुनिक मल्चिंग तकनीक और सरकारी योजनाओं की मदद से किसान स्ट्रॉबेरी की खेती कर अपनी आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं।

पलामू के कृषि क्षेत्र में समय के साथ बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। यहां के किसान अब पारंपरिक फसलों के बजाय आधुनिक तकनीकों को अपनाकर उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इस बदलाव में स्ट्रॉबेरी की खेती एक बेहद लाभकारी विकल्प बनकर उभरी है, जो ठंड के मौसम में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी भारी मांग के कारण किसानों की किस्मत बदल सकती है। हालांकि, स्ट्रॉबेरी के नाजुक फलों के साथ एक बड़ी समस्या यह होती है कि जब वे सीधे गीली मिट्टी के संपर्क में आते हैं, तो उनमें सड़न, फंगल संक्रमण और गुणवत्ता खराब होने का जोखिम काफी बढ़ जाता है। इस गंभीर समस्या से निपटने और खेती को अधिक मुनाफेदार बनाने के लिए पलामू जिले के कृषि वैज्ञानिक डॉ प्रमोद कुमार ने किसानों के लिए कुछ बेहद उपयोगी और वैज्ञानिक सुझाव साझा किए हैं।

मल्चिंग तकनीक है बेहद जरूरी, पुआल से घटेगी लागत

स्ट्रॉबेरी के फलों को मिट्टी के सीधे संपर्क में आने से बचाने के लिए मल्चिंग तकनीक को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। सरल शब्दों में कहें तो मल्चिंग का अर्थ है पौधों के चारों ओर की खुली मिट्टी को किसी उपयुक्त सामग्री से ढक देना, ताकि फल जमीन को न छुएं। डॉ प्रमोद कुमार के अनुसार, वैज्ञानिक खेती में प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग काफी प्रभावी होता है, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के लिए इसकी शुरुआती लागत अधिक हो सकती है। ऐसे में किसान एक बेहद किफायती और पारंपरिक तरीका अपना सकते हैं। वे अपने खेतों में धान के पुआल या सूखी घास (भूसे) का उपयोग करके बेहद कम खर्च में मल्चिंग का काम पूरा कर सकते हैं। यह प्राकृतिक मल्च न केवल मिट्टी की नमी को लंबे समय तक बनाए रखता है, जिससे बार-बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि यह खेतों में अवांछित खरपतवार उगने की समस्या को भी काफी हद तक नियंत्रित करता है।

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अनुकूल जलवायु और मिट्टी की आवश्यकताएं

स्ट्रॉबेरी मूल रूप से ठंडी और समशीतोष्ण जलवायु में पनपने वाली फसल है। इसके पौधों के बेहतर विकास और फलों की अच्छी गुणवत्ता के लिए 15 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। मिट्टी के चयन की बात करें तो इसके लिए हल्की बलुई-दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है, जिसमें प्रचुर मात्रा में जैविक पदार्थ उपलब्ध हों। मिट्टी का pH मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए, जो इस फसल के लिए आदर्श है। इसके अलावा, खेत की तैयारी करते समय जल निकासी की उत्तम व्यवस्था करना अनिवार्य है। यदि खेत में पानी जमा होता है, तो स्ट्रॉबेरी के पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं और पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।

उन्नत किस्में, रोपाई का सही समय और दूरी

बेहतर उत्पादन हासिल करने के लिए किसानों को हमेशा प्रमाणित और रोगमुक्त पौधों का ही चयन करना चाहिए। स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए खेतों में ऊंची क्यारियां (बेड्स) बनाई जानी चाहिए और उन पर ड्रिप सिंचाई प्रणाली के साथ मल्चिंग का उपयोग करना चाहिए। इसकी रोपाई का सबसे अनुकूल समय अक्टूबर से नवंबर के बीच माना जाता है। खेत में रोपाई करते समय पौधों के बीच की दूरी लगभग 30×45 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए, ताकि हर पौधे को फैलने के लिए पर्याप्त जगह और धूप मिल सके। किसान उन्नत किस्मों का चयन कर सकते हैं, जिनमें कैमरोसा, चैंडलर, फेस्टिवल, स्वीट चार्ली और विंटर डॉन जैसी किस्में शामिल हैं, जो पलामू की जलवायु के अनुकूल हैं और बंपर पैदावार देती हैं।

ड्रिप सिंचाई, संतुलित पोषण और 90 प्रतिशत तक सरकारी अनुदान

स्ट्रॉबेरी के पौधों को पानी की सटीक और नियंत्रित मात्रा देने के लिए ड्रिप सिंचाई (टपक सिंचाई) को सबसे उपयोगी माना गया है। इससे पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है और पानी की बर्बादी भी नहीं होती। खाद प्रबंधन के लिए सड़ी हुई गोबर की खाद, केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट) और रासायनिक उर्वरकों के रूप में NPK का एक संतुलित अनुपात में इस्तेमाल करना चाहिए। जब पौधों में फूल आने शुरू हों, तब जैविक खाद के साथ-साथ आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व (माइक्रो न्यूट्रिएंट्स) देने से फलों का आकार और चमक बढ़ती है। इस पूरी प्रक्रिया में लागत को कम करने के लिए सरकार की ओर से बड़ी सहायता उपलब्ध है। विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत स्ट्रॉबेरी की खेती और मल्चिंग के लिए किसानों को 80 से 90 प्रतिशत तक का भारी अनुदान प्रदान किया जाता है। किसानों को इस वित्तीय लाभ को प्राप्त करने के लिए अपने स्थानीय जिले के कृषि या उद्यान विभाग से संपर्क कर वर्तमान में सक्रिय योजनाओं, अपनी पात्रता और आवेदन प्रक्रिया की पूरी जानकारी लेनी चाहिए।

सवाल-जवाब

स्ट्रॉबेरी की रोपाई का सबसे अच्छा समय क्या है?
स्ट्रॉबेरी के पौधों की रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर से नवंबर के बीच का माना जाता है।
स्ट्रॉबेरी के लिए आदर्श तापमान और मिट्टी कैसी होनी चाहिए?
इसके लिए 15 से 25 डिग्री सेल्सियस का तापमान और 5.5 से 6.5 pH मान वाली समृद्ध बलुई-दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है।
स्ट्रॉबेरी की खेती में मल्चिंग क्यों की जाती है?
मल्चिंग करने से फल सीधे मिट्टी के संपर्क में नहीं आते, जिससे वे सड़ने और फंगल संक्रमण से बच जाते हैं।
स्ट्रॉबेरी की कौन सी उन्नत किस्में सबसे लोकप्रिय हैं?
किसान कैमरोसा, चैंडलर, फेस्टिवल, स्वीट चार्ली और विंटर डॉन जैसी उन्नत किस्मों का चयन कर सकते हैं।
स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए सरकार कितना अनुदान देती है?
विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत किसानों को मल्चिंग और अन्य कृषि गतिविधियों के लिए 80 से 90 प्रतिशत तक का अनुदान मिल सकता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·6 दिन पहले

पलामू में पारंपरिक खेती से हटकर स्ट्रॉबेरी जैसे उच्च मूल्य वाले फल की ओर यह रुख कृषि अर्थव्यवस्था में विविधीकरण की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। पुआल जैसी कम लागत वाली मल्चिंग तकनीक और सरकारी सब्सिडी के मेल से छोटे और सीमांत किसानों के लिए वित्तीय जोखिम काफी कम हो जाता है। यदि इसे मूल्य संवर्धन और कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स से जोड़ा जाए, तो यह स्थानीय ग्रामीण आय में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है।

Ananya Iyer@ananya-iyer·6 दिन पहले

यह कृषि बदलाव केवल फसल विविधीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र को नए उपभोक्ता रुझानों से जोड़ने का अवसर है। सर्दियों के मौसम में उच्च मूल्य वाले फलों की यह खेती सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदल सकती है। जब छोटे और सीमांत किसान कम लागत वाली तकनीकों और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर ऐसी नाज़ुक और लाभकारी बागवानी अपनाते हैं, तो यह क्षेत्रीय कृषि परिदृश्य में एक बड़ा आर्थिक बदलाव साबित हो सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

पलामू जैसे नक्सल प्रभावित और सूखे की मार झेलने वाले क्षेत्र में किसानों का उच्च मूल्य वाली बागवानी की ओर मुड़ना आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से एक सकारात्मक बदलाव है। हालांकि, कृषि से जुड़ी ऐसी व्यावसायिक पहलों में सबसे बड़ी चुनौती फसल बीमा और बिचौलियों से मुक्त मजबूत आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) की होती है। यदि स्थानीय प्रशासन कोल्ड स्टोरेज और पारदर्शी विपणन प्रणाली की व्यवस्था सुनिश्चित करे, तो किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिल सकेगा और वे आपराधिक तत्वों द्वारा आर्थिक शोषण से सुरक्षित रह सकेंगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·6 दिन पहले

पलामू जैसे क्षेत्रों में कृषि विविधीकरण की यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है। कम लागत वाली मल्चिंग तकनीक और वैज्ञानिक तरीकों से किसानों की आय तो बढ़ेगी, लेकिन दीर्घकालिक सफलता के लिए यह जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर शीतगृह और बेहतर बाजार पहुंच जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएं, ताकि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिल सके और बिचौलियों पर निर्भरता खत्म हो।

Rohan Verma@rohan-verma·6 दिन पहले

पलामू जैसे क्षेत्रों में पारंपरिक खेती से हटकर उच्च मूल्य वाली बागवानी की ओर यह बदलाव किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम है। स्ट्रॉबेरी जैसी नाजुक फसल के लिए धान के पुआल जैसी स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री से मल्चिंग करना लागत को काफी हद तक नियंत्रित रखता है, जिससे सीमांत किसानों के लिए जोखिम कम होता है। जल निकासी और सही तापमान प्रबंधन जैसी वैज्ञानिक बारीकियों को अपनाकर इस शीतकालीन फसल से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है और रोजगार के नए अवसर सृजित हो सकते हैं।

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