झारखंड के पलामू जिले में बहुफसली और एकीकृत कृषि का एक व्यावहारिक उदाहरण सामने आया है, जहां एक किसान ने बागवानी की खाली पड़ी जमीन को अतिरिक्त कमाई के साधन में बदल दिया है। प्रगतिशील किसान सतीश दुबे ने अपने चार एकड़ के मौसमी बाग में पौधों के बीच खाली बची जगह पर कुरथी की बुआई की है। इस समन्वित खेती का मुख्य मकसद बगीचे की खुली जमीन का व्यवस्थित इस्तेमाल कर एक ही खेत से दोहरा उत्पादन और मुनाफा हासिल करना है।
बागवानी में पौधों के बीच की दूरी का स्मार्ट उपयोग
सतीश दुबे को कृषि कार्य पारिवारिक विरासत के रूप में मिला है। उन्होंने करीब चार एकड़ क्षेत्र में मौसमी के पौधे लगाए हैं, जिनमें कतार और पौधों के बीच लगभग 10-10 फीट का फासला रखा गया है। चूंकि मौसमी के पेड़ अभी विकास की शुरुआती अवस्था में हैं और पूरी तरह बड़े नहीं हुए हैं, इसलिए दो कतारों के बीच काफी खुली जगह बची हुई थी। जमीन के इस खाली हिस्से को अनुपयोगी छोड़ने के बजाय उन्होंने इंटरक्रॉपिंग यानी अंतरवर्ती फसल प्रणाली अपनाते हुए कुरथी बोने का फैसला किया।
खरपतवार की रोकथाम और अतिरिक्त फसल का दोहरा फायदा
बगीचे में पर्याप्त खाली जमीन होने की वजह से वहां जंगली घास और खरपतवार तेजी से पनप रहे थे। इस समस्या से निपटने के लिए किसान ने खाली पड़ी जमीन की विधिवत जुताई कराई और उसमें दलहनी फसल कुरथी के बीज डाल दिए। जुताई और नई फसल लगने से खेत में अवांछित घास की समस्या पर काफी हद तक काबू पा लिया गया। इसके साथ ही उसी खेत से बिना किसी भारी अतिरिक्त खर्च के दो महीने के भीतर एक स्वतंत्र फसल पककर तैयार होने की राह खुल गई है।
दुधारू पशुओं के लिए सूखे चारे की पक्की व्यवस्था
कुरथी की अंतरवर्ती खेती से केवल व्यावसायिक लाभ ही नहीं मिलता, बल्कि पशुपालकों की रोजमर्रा की मुश्किलें भी हल होती हैं। सतीश दुबे के पास करीब 8 से 10 गाय हैं, जिनके लिए नियमित चारे का प्रबंध करना पड़ता है। कुरथी के अवशेष और उसका सूखा भूसा मवेशियों के लिए बेहद पौष्टिक भोजन का काम करते हैं। ठंड के मौसम में जब हरे चारे की उपलब्धता कम होने लगती है, तब यह सूखा चारा कई महीनों तक मवेशियों की खुराक की जरूरत को आसानी से पूरा कर सकता है।
दाल उत्पादन से बाजार में अतिरिक्त कमाई का अनुमान
पशु आहार के अलावा कुरथी पोषण से भरपूर दाल के रूप में भी रसोई में इस्तेमाल की जाती है। चार एकड़ के इस मौसमी बाग से तकरीबन 10 से 12 क्विंटल कुरथी पैदा होने का अनुमान लगाया गया है। इस पैदावार से किसान के परिवार की घरेलू दाल की आवश्यकता पूरी हो जाएगी, जबकि बची हुई उपज को स्थानीय मंडी या बाजार में बेचकर नकद आय हासिल की जा सकेगी।
सालभर जमीन का इस्तेमाल, कुरथी के बाद आलू की तैयारी
सतीश दुबे अपनी कृषि भूमि से साल के बारहों महीने चक्रवार उत्पादन लेने की सुनियोजित रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने तय किया है कि करीब साठ दिनों में कुरथी की कटाई पूरी होते ही मौसमी के पौधों के बीच वाली जमीन को खाली नहीं रखा जाएगा। इसके तुरंत बाद उसी खाली जमीन पर आलू की बुआई की जाएगी। बाग के भीतर मौसम के अनुसार लगातार नई फसलें लेकर जमीन की उपजाऊ क्षमता का दोहन करने का यह तरीका छोटे और मझोले किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।


















