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पॉक्सो कानून पर्सनल लॉ से ऊपर, हलाला के नाम पर नाबालिग से दुष्कर्म मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसलाउत्तर प्रदेश
5 जुल॰ 2026, 1:01 am (70 दिन पहले)· 0

पॉक्सो कानून पर्सनल लॉ से ऊपर, हलाला के नाम पर नाबालिग से दुष्कर्म मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला की आड़ में नाबालिग लड़की से बार-बार दुष्कर्म के आरोपियों की एफआईआर रद्द करने वाली याचिका खारिज कर दी और कहा कि पॉक्सो अधिनियम पर्सनल लॉ से ऊपर है।

प्रयागराज में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला की आड़ में एक नाबालिग लड़की के साथ बार-बार दुष्कर्म के आरोपियों को तगड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने आरोपियों की प्राथमिकी रद्द करने वाली याचिका खारिज करते हुए साफ कहा कि पॉक्सो अधिनियम पर्सनल लॉ से ऊपर है, यानी किसी भी धार्मिक रस्म की आड़ में नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।

क्या है पूरा मामला

यह पूरा विवाद 2016 से जुड़ा है, जब शिकायतकर्ता लड़की नाबालिग थी। आरोप है कि उस दौरान निकाह हलाला के नाम पर नौ व्यक्तियों ने उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया। इसके बाद 2025 में जब लड़की वयस्क हो गई, तो उसके साथ फिर से 'डबल हलाला' के नाम पर सामूहिक दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगा। इस पूरे मामले में अमरोहा जिले के सैदनागली थाने में भारतीय न्याय संहिता, मुस्लिम महिला (विवाह के अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 और पॉक्सो अधिनियम की संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया गया।

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याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में क्या दलील दी

तैय्यब और तीन अन्य आरोपियों ने अपनी प्राथमिकी को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। उनके वकील ने अदालत में दलील दी कि 2016 में शरिया कानून के तहत तीन तलाक की व्यवस्था लागू थी और निकाह हलाला एक मान्य धार्मिक रस्म है। वकील का कहना था कि चूंकि लड़की ने बालिग होने के बाद एक साल के भीतर इस निकाह को अस्वीकार नहीं किया, इसलिए यह शादी वैध मानी जानी चाहिए और इस आधार पर एफआईआर रद्द कर दी जाए।

राज्य सरकार और शिकायतकर्ता पक्ष का पलटवार

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश सरकार और शिकायतकर्ता के वकील ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उनकी दलील थी कि आरोप साफ तौर पर एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण की कहानी बयां करते हैं, जिसके बाद उसी लड़की के साथ 'डबल हलाला' की आड़ में सामूहिक दुष्कर्म किया गया। उन्होंने कहा कि पर्सनल लॉ को भारतीय न्याय संहिता के तहत सामूहिक दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों से बचने के लिए ढाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि अगर हलाला की आड़ में किसी नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं, तो पॉक्सो अधिनियम के प्रावधान निश्चित तौर पर लागू होंगे, भले ही लड़की ने बाद में तलाक देने वाले व्यक्ति से दोबारा शादी करने की इच्छा जताई हो। खंडपीठ ने माना कि प्रथम दृष्टया यह मामला पहले एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म का है और फिर उसी आड़ में बेहद बर्बर और वीभत्स सामूहिक दुष्कर्म का। अदालत ने अपनी टिप्पणी में उच्चतम न्यायालय के 'इंडिपेंडेंट थॉट बनाम केंद्र सरकार' मामले के ऐतिहासिक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने पॉक्सो अधिनियम को सर्वोच्च मानते हुए 18 साल से कम उम्र की किसी भी लड़की के साथ कानूनी तौर पर शारीरिक संबंध बनाए जाने की हर संभावना को खत्म कर दिया था।

सभी आरोपियों की भूमिका पर कोर्ट सख्त

सुनवाई के दौरान यह दलील भी दी गई थी कि निकाह पढ़ाने वाले काजी और कुछ दूर के रिश्तेदारों जैसे आरोपियों की इस मामले में महज मामूली भूमिका रही है, इसलिए उन्हें राहत दी जानी चाहिए। कोर्ट ने इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि सभी आरोपी इस गंभीर अपराध में समान रूप से शामिल पाए जाते हैं। खंडपीठ ने एक जुलाई को सुनाए अपने फैसले में साफ किया कि इस मामले में लगे आरोपों की पुलिस को गहराई से जांच करनी होगी, ताकि पूरी सच्चाई सामने आ सके।

सवाल-जवाब

यह मामला कहां का है?
अमरोहा जिले के सैदनागली थाना क्षेत्र का है, जबकि एफआईआर रद्द करने की याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर की गई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
कोर्ट ने आरोपियों की एफआईआर रद्द करने वाली याचिका खारिज कर दी और कहा कि पॉक्सो अधिनियम पर्सनल लॉ से ऊपर है।
आरोपियों पर क्या आरोप हैं?
2016 में नौ व्यक्तियों ने निकाह हलाला के नाम पर नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म किया और 2025 में वयस्क होने पर 'डबल हलाला' के नाम पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया।
बेंच में कौन-कौन से जज शामिल थे?
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।
याचिकाकर्ताओं का तर्क क्या था?
उनके वकील ने कहा कि 2016 में तीन तलाक लागू था, निकाह हलाला वैध रस्म है और लड़की ने एक साल के भीतर शादी को अस्वीकार नहीं किया, इसलिए वह वैध है।
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता पक्ष ने क्या दलील दी?
उन्होंने कहा कि आरोप नाबालिग के यौन शोषण और बाद में डबल हलाला के नाम पर सामूहिक दुष्कर्म को दिखाते हैं, और पर्सनल लॉ को इससे बचने की ढाल नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने किस पुराने फैसले का हवाला दिया?
कोर्ट ने 'इंडिपेंडेंट थॉट बनाम केंद्र सरकार' मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला दिया, जिसमें पॉक्सो अधिनियम को प्राथमिकता दी गई थी।
क्या सभी आरोपियों की भूमिका बराबर मानी गई?
हां, कोर्ट ने काजी और दूर के रिश्तेदारों की मामूली भूमिका होने की दलील खारिज कर दी और सभी को समान रूप से जिम्मेदार माना।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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