उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित जिलाधिकारी (DM) कार्यालय परिसर में बनाई गई मस्जिद को ढहाए जाने की प्रशासनिक कार्रवाई का कानूनी विवाद अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की दहलीज तक पहुंच गया है। मस्जिद कमेटी के मुतवल्ली के बेटे मोहम्मद तनवीर अहमद ने इस संबंध में उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है। दायर की गई याचिका के माध्यम से जिला प्रशासन द्वारा की गई ध्वस्तीकरण की पूरी प्रक्रिया की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं और इसे अदालत के समक्ष चुनौती दी गई है।
याचिका में प्रशासन की कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया पर सवाल
हाईकोर्ट में दाखिल की गई याचिका में याचिकाकर्ता मोहम्मद तनवीर अहमद ने आरोप लगाया है कि स्थानीय प्रशासन की ओर से की गई यह सख्त कार्रवाई कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है। याचिका में कहा गया है कि मस्जिद के ध्वस्तीकरण से पहले न तो कोई वैध कानूनी नोटिस जारी किया गया था और ना ही किसी प्राधिकृत ध्वस्तीकरण आदेश का पालन किया गया। इसके अलावा, याचिका में यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया है कि प्रशासनिक बुलडोजर कार्रवाई पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के प्रावधानों का सीधा उल्लंघन करती है। मस्जिद समिति ने अदालत से आग्रह किया है कि वह प्रशासन द्वारा उठाए गए कदम की निष्पक्ष जांच करे और इसकी वैधता की समीक्षा करे। इस मामले की प्रारंभिक सुनवाई हाईकोर्ट की एकल पीठ (सिंगल बेंच) में होने की संभावना जताई जा रही है।
प्रशासन का पक्ष और सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम
दूसरी तरफ, जिला प्रशासन ने अपने इस कदम को पूरी तरह से नियमानुकूल और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया निर्णय करार दिया है। प्रशासनिक अधिकारियों का रुख यह रहा है कि जिला कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर बना यह ढांचा पूरी तरह से अवैध था और इसे हटाने के लिए तय न्यायिक प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन किया गया है। ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के उद्देश्य से कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास के संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल और सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई थी। इसके बाद भारी सुरक्षा घेरे के बीच बुलडोजर चलाकर मस्जिद के ढांचे को हटा दिया गया।
निचली अदालत से अपील खारिज होने के बाद हुई थी कार्रवाई
उल्लेखनीय है कि कलेक्ट्रेट परिसर स्थित इस मस्जिद को ध्वस्त करने से पहले जिला अदालत के स्तर पर कानूनी लड़ाई लड़ी गई थी। 4 सितंबर को जिला न्यायाधीश (डिस्ट्रिक्ट जज) की अदालत ने मुस्लिम पक्ष की ओर से दाखिल की गई उस अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया था, जिसमें सिटी मजिस्ट्रेट के पुराने ध्वस्तीकरण आदेश को चुनौती दी गई थी। जिला अदालत ने दोनों पक्षों द्वारा पेश की गई दलीलों, दस्तावेजों और साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद सिटी मजिस्ट्रेट के 17 जुलाई के फैसले को सही ठहराया था और उसे बरकरार रखा था।
मामले की पृष्ठभूमि, जुर्माना और प्रारंभिक शिकायत
इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय समन्वयक विकास त्यागी की ओर से दर्ज कराई गई एक आधिकारिक शिकायत से हुई थी। 17 जुलाई को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने अपना निर्णय सुनाते हुए मस्जिद परिसर को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण घोषित किया था। अदालत ने न केवल इस ढांचे को गिराने का आदेश दिया था, बल्कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे और उसके अनधिकृत इस्तेमाल के आरोप में कब्जाधारियों पर लगभग 6.41 करोड़ रुपये का भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया था। निचली अदालतों से राहत न मिलने के बाद अब पूरा मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के विचाराधीन है, जहां आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाई की वैधता पर महत्वपूर्ण सुनवाई होगी।



















