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प्रशांत में उबलता समंदर और सुपर अल नीनो की आहट: 180 विशेषज्ञों ने दी पर्यावरण संकट की चेतावनीमध्य प्रदेश
20 सित॰ 2026, 11:18 am (39 दिन पहले)· 0

प्रशांत में उबलता समंदर और सुपर अल नीनो की आहट: 180 विशेषज्ञों ने दी पर्यावरण संकट की चेतावनी

प्रशांत महासागर की सतह के अप्रत्याशित रूप से तपने के बाद 180 से अधिक वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने सुपर अल नीनो के उभरते खतरे को लेकर आगाह किया है। इस मौसमी उथल-पुथल से सूखे, भीषण गर्मी, वर्षावन की आग और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर संकट गहराने की आशंका जताई गई है।

उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह पर दर्ज हो रही असामान्य गर्माहट ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक बिरादरी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। समुद्र के गर्म होते जलक्षेत्र साधारण समुद्री हलचल से आगे बढ़कर अब ‘सुपर अल नीनो’ जैसे अत्यंत विकराल मौसमी चक्र की ओर संकेत कर रहे हैं। देश के 180 से अधिक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, अनुसंधानकर्ताओं और पर्यावरण विशेषज्ञों ने गहन विचार-विमर्श के बाद इस प्राकृतिक चुनौती के मद्देनजर अभी से चौकन्ना रहने और रणनीतिक तैयारी करने का साझा आह्वान किया है। जानकारों का स्पष्ट मत है कि प्रशांत के जलस्तर में होने वाला यह तापीय बदलाव केवल दूरस्थ सागर तक सीमित रहने वाला मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा और व्यापक असर दुनिया भर के वर्षा प्रारूप, मौसमी मिजाज, कृषि प्रणालियों और जंगलों के पारिस्थितिक संतुलन पर पड़ सकता है।

वैज्ञानिकों की यह सामूहिक चेतावनी ठीक उस नाजुक मोड़ पर सामने आई है, जब भारत से दक्षिण-पश्चिम मानसून की आधिकारिक वापसी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के ताजे आकलनों के मुताबिक, मानसूनी हवाएं पश्चिमी राजस्थान के हिस्सों से विदा ले चुकी हैं। आने वाले तीन से चार दिनों की अवधि में राजस्थान के शेष इलाकों, पंजाब और सौराष्ट्र-कच्छ के कुछ क्षेत्रों से भी मानसूनी बादलों की वापसी के लिए वायुमंडलीय परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल बन चुकी हैं। विदाई की इस वेला में इस वर्ष मानसूनी वर्षा का समूचा ब्योरा भी बहुत संतोषजनक नहीं रहा है। 4 जून से 19 सितंबर के मध्य देश भर में दीर्घावधि औसत के मुकाबले 15 फीसदी कम वर्षा रिकॉर्ड की गई। विशेष रूप से दक्षिणी प्रायद्वीप में यह कमी 29 फीसदी तक पहुंच गई। शुरुआती महीने जून में वर्षा का अभाव 35 फीसदी दर्ज हुआ था। यद्यपि जुलाई के दौरान औसत से बेहतर पानी बरसा, परंतु अगस्त महीने में केवल 213.3 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई। यह आंकड़ा वर्ष 2001 के पश्चात अगस्त के महीने में सातवीं सबसे कम वर्षा के रूप में दर्ज हुआ है।

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सुपर अल नीनो की दस्तक और महासागरीय तापमान में तेज उछाल

अल नीनो मूलतः उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के सतही जल के अत्यधिक और असामान्य रूप से गर्म होने की एक व्यापक भू-भौतिकीय घटना है। सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत के जल का तापमान एक निश्चित संतुलन में रहता है, परंतु जब यह असामान्य तापीय बढ़ोतरी कई महीनों तक अनवरत बनी रहती है, तब यह वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को उलट-पुलट कर रख देती है। इसी गंभीर खतरे को भांपते हुए शोधकर्ता प्रशांत के हर सूक्ष्म बदलाव की सघन ट्रैकिंग कर रहे हैं।

विशेषज्ञों द्वारा जारी अपील में उल्लेख किया गया है कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में अल नीनो के स्पष्ट और शुरुआती चेतावनी संकेत दिखाई देने लगे हैं। समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी दर्ज की गई है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार अगस्त में तापमान का सामान्य से अंतर 2.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। विभिन्न वैज्ञानिक अनुमानों में यह आशंका भी जताई जा रही है कि आगे चलकर यह तापीय विसंगति 4 डिग्री सेल्सियस के स्तर को भी पार कर सकती है। हालांकि शोधकर्ता यह भी रेखांकित करते हैं कि 4 डिग्री का यह उछाल एक भावी गणितीय व मौसमी संभावना है और इसे अंतिम व निश्चित सत्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, फिर भी मौजूदा संकेत बड़े खतरे की ओर इशारा करने के लिए पर्याप्त हैं।

मानसूनी उतार-चढ़ाव और घटती वर्षा का गणित

समुद्री तापमान में आ रहे इस बदलाव का सीधा संबंध भारत के मानसूनी चक्र और कृषि अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। 4 जून से 19 सितंबर की अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर 15 प्रतिशत की मानसूनी कमी और दक्षिणी राज्यों में 29 प्रतिशत का भारी घाटा स्पष्ट करता है कि मौसमी तंत्र पहले से ही काफी दबाव में है। जून की 35 फीसदी बारिश की कमी के बाद जुलाई की अच्छी बारिश ने कुछ संभलने का मौका दिया था, लेकिन अगस्त में महज 213.3 मिलीमीटर बारिश ने जल संचयन के मोर्चे पर नई मुश्किलें खड़ी कर दीं। चूंकि साल 2001 के बाद से यह अगस्त का सातवां सबसे सूखा महीना साबित हुआ है, ऐसे में प्रशांत महासागर से उठने वाली इस नई गर्म लहर ने भारतीय मौसम विज्ञानियों और नीति-निर्माताओं की चिंता को दोगुना कर दिया है।

सूखा, लू और पारंपरिक आजीविका पर गहराता संकट

वैज्ञानिकों के समूह ने अपनी विस्तृत चेतावनी में यह साफ किया है कि अगर सुपर अल नीनो वास्तव में अपनी पूरी ताकत के साथ सक्रिय होता है, तो इसके सीधे परिणाम विनाशकारी सूखे और जानलेवा गर्मी के रूप में सामने आएंगे। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका सबसे पहला और सीधा झटका खेती-किसानी पर पड़ेगा। फसलों के चक्र प्रभावित होंगे और भूजल स्तर में भारी गिरावट आ सकती है।

किसानों के अलावा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार यानी पशुपालकों, चरवाहों और मछुआरों के जीवन पर भी बड़ा संकट मंडरा सकता है। चारागाहों के सूखने से पशुधन के लिए चारे का संकट खड़ा हो जाएगा, वहीं तटीय तापमान बढ़ने से मछलियों की उपलब्धता में भारी गिरावट आ सकती है। इसके अतिरिक्त, भीषण गर्मी और सूखे की संयुक्त मार से जंगलों में आग लगने की घटनाओं में कई गुना बढ़ोतरी होने का अंदेशा है। प्राकृतिक पर्यावरण पहले से ही मानवजनित गतिविधियों के दबाव से जूझ रहा है, ऐसे में तापमान और वर्षा का यह चरम असंतुलन पूरे सामाजिक-आर्थिक ढांचे को हिला सकता है।

कोरल ब्लीचिंग और वर्षावनों पर दोहरा प्रहार

सुपर अल नीनो की यह भयावह परिकल्पना केवल जमीनी सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्र के भीतर पनपने वाले जीवन के लिए भी यह काल साबित हो सकती है। महासागरीय जल के अत्यधिक गर्म होने से कोरल रीफ यानी प्रवाल भित्तियों में बड़े पैमाने पर कोरल ब्लीचिंग की आशंका जताई गई है। जब समुद्री तापमान असहनीय सीमा तक बढ़ जाता है, तो प्रवाल अपने ऊतकों में रहने वाले शैवाल को निष्कासित कर देते हैं, जिससे वे पूरी तरह सफेद पड़ जाते हैं और अंततः नष्ट हो जाते हैं। इस तरह समुद्री जीवन की नर्सरी कहे जाने वाले इन आवासों का एक बड़ा हिस्सा तबाह हो सकता है।

वहीं दूसरी ओर, स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में वर्षावनों के विशालकाय वृक्षों के जीवन चक्र पर भी गंभीर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। लंबे समय तक पानी न मिलने और तीखी धूप के चलते वृक्षों के सूखने और जंगल की आग की चपेट में आने का जोखिम बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों ने यह भी रेखांकित किया है कि ऐसे मौसमी संकटों के चलते वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार में बदलाव आ सकते हैं और पेड़-पौधों में फल लगने की सामान्य प्रक्रिया में भारी देरी दर्ज हो सकती है।

धीमे पर्यावरणीय बदलाव और सतत निगरानी की आवश्यकता

180 से अधिक विशेषज्ञों ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि प्रकृति में घटित होने वाले हर नुकसान का असर तत्काल खुली आंखों से नहीं दिखता। वर्षा में आई गिरावट या पारे में हुई अचानक वृद्धि को तो मनुष्य तुरंत भांप लेता है, परंतु वन्यजीवों के स्वभाव में आ रहे सूक्ष्म रूपांतरण, परागण चक्र की गड़बड़ी अथवा फलों के पकने में हो रही देरी जैसे प्रभाव अत्यंत धीमी गति से धरातल पर उतरते हैं। जब तक इनका स्पष्ट एहसास होता है, तब तक परिस्थितिकी को अपूरणीय क्षति पहुंच चुकी होती है।

इसी गूढ़ वैज्ञानिक पहलू को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों ने रिसर्च के दायरे को विस्तार देने, जमीनी निगरानी तंत्र को चाक-चौबंद करने और प्राकृतिक तंत्रों में दर्ज हो रहे हर छोटे बदलाव का दस्तावेजीकरण करने की पुरजोर सिफारिश की है। इस सतत वैज्ञानिक निगरानी से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भविष्य में इस प्रकार के चरम मौसमी बदलाव हमारे पर्यावरण को किस हद तक झकझोर सकते हैं।

हिंद महासागर और प्रशांत की दोहरी निगरानी की दरकार

भारत की संपूर्ण सामाजिक, खाद्य और जल सुरक्षा सीधे तौर पर मानसूनी स्थिरता पर टिकी हुई है। खेती की बुवाई से लेकर विशाल जलाशयों के जलस्तर तक, सब कुछ मानसूनी बूंदों के रुख से तय होता है। यही कारण है कि प्रशांत महासागर में पैदा होने वाली हर तापीय हलचल के साथ-साथ वैज्ञानिक हिंद महासागर के व्यवहार और तापमान पर भी बारीक नजर बनाए हुए हैं।

विशेषज्ञों का स्पष्ट निष्कर्ष है कि वर्तमान समय केवल आशंकाएं जताने का नहीं, बल्कि ठोस वैज्ञानिक निगरानी और अग्रिम जमीनी तैयारियों का है। देश के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों की तत्काल पहचान की जानी चाहिए और उन पर पड़ रहे मानवीय व प्राकृतिक दबावों को यथासंभव न्यूनतम किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में संभावित सुपर अल नीनो के झटकों को सहन किया जा सके।

सवाल-जवाब

वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर को लेकर क्या चेतावनी दी है?
देश के 180 से अधिक वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने और सुपर अल नीनो के उभरते खतरे को लेकर आगाह किया है।
अगस्त में प्रशांत महासागर के तापमान में क्या अंतर देखा गया?
अगस्त में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2.6 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज हुआ, जिसके आगे 4 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने की आशंका जताई गई है।
इस वर्ष भारत में मानसूनी बारिश की क्या स्थिति रही?
4 जून से 19 सितंबर के बीच देश में सामान्य से 15 फीसदी कम बारिश हुई, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीप में यह कमी 29 फीसदी तक पहुंच गई।
अगस्त महीने में देश में कितनी बारिश दर्ज की गई?
अगस्त में देश भर में 213.3 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जो साल 2001 के बाद से अगस्त की सातवीं सबसे कम बारिश का रिकॉर्ड है।
सुपर अल नीनो से प्राकृतिक तंत्र और जंगलों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
इससे भीषण सूखे और गर्मी के कारण जंगलों में आग का खतरा बढ़ सकता है, वर्षावनों के पेड़ों को नुकसान पहुंच सकता है और फलों के उत्पादन में देरी हो सकती है।
समुद्री जीवन पर इस तापमान वृद्धि का क्या असर हो सकता है?
समुद्र का पानी अधिक गर्म होने से प्रवाल भित्तियों में बड़े पैमाने पर कोरल ब्लीचिंग हो सकती है, जिससे समुद्री जीवन के बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचेगा।
मानसून की वापसी को लेकर मौसम विभाग का क्या आकलन है?
मानसून पश्चिमी राजस्थान से पीछे हट चुका है और अगले तीन-चार दिनों में पंजाब, सौराष्ट्र-कच्छ तथा राजस्थान के अन्य हिस्सों से इसकी विदाई के अनुकूल परिस्थितियां हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·38 दिन पहले

एक वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार के रूप में, मैं इस रिपोर्ट को देश की विकास दर और वित्तीय बाजारों के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखता हूँ। मानसून में 15% की कमी और सुपर अल नीनो की आहट सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी। इससे कृषि उत्पादन घटने और खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ने का गंभीर खतरा है। शेयर बाजार में एफएमसीजी, ऑटो और फर्टिलाइजर कंपनियों के शेयरों पर इसका सीधा दबाव दिखेगा। निवेशकों और नीति निर्माताओं को अब जलवायु जोखिम को अपनी वित्तीय रणनीतियों में प्राथमिकता देनी होगी, क्योंकि पर्यावरण का यह संकट सीधे देश की आर्थिक सेहत से जुड़ा है।

Arshdeep Ahluwalia@arshdeep-ahluwalia·38 दिन पहले

रविकाश जी की आर्थिक चिंता से आगे बढ़कर, एक क्षेत्रीय पत्रकार के रूप में मैं इसके गंभीर जमीनी प्रभाव देख रहा हूँ। मानसून के इस असंतुलन का सीधा असर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के कृषि चक्र पर पड़ेगा। कम बारिश के कारण जलाशयों में कम पानी और मिट्टी में कम नमी की वजह से आगामी रबी फसलों, विशेषकर गेहूं की बुवाई प्रभावित होगी। पंजाब-हरियाणा में पहले से ही गिरते भूजल स्तर के बीच किसानों को सिंचाई के लिए बिजली पर अधिक निर्भर रहना होगा, जिससे खेती की लागत बढ़ेगी। राज्य सरकारों को सिंचाई प्रबंधन और अतिरिक्त बिजली आपूर्ति के लिए अभी से ठोस नीतिगत तैयारी करनी होगी ताकि खाद्य सुरक्षा पर संकट न आए।

Rohan Verma@rohan-verma·38 दिन पहले

मानसून में 15 फीसदी की गिरावट और सुपर अल नीनो की आहट कृषि-आधारित व्यवस्था और शासन प्रणाली के लिए एक गंभीर नीतिगत चुनौती है। इस तरह के मौसमी संकट के समय केवल पर्यावरण चेतावनियों तक सीमित रहने के बजाय जल प्रबंधन, वैकल्पिक फसल रणनीति और ग्रामीण राहत ढांचे पर प्रशासनिक तैयारी तेज करनी होगी। यदि समुद्र का तापीय असंतुलन आगे भी बना रहता है, तो खाद्य सुरक्षा, पेयजल आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ना तय है। सरकार को जमीनी स्तर पर जोखिम का आकलन कर समय रहते ठोस नीतिगत कदम उठाने की सख्त जरूरत है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·38 दिन पहले

रोहन की बात को आगे बढ़ाते हुए नीतिगत और शासन की दृष्टि से देखें तो मानसूनी कमी और सुपर अल नीनो का खतरा केंद्र और राज्यों के बीच अंतर-मंत्रालयी व अंतर-राज्यीय समन्वय की कठिन परीक्षा लेगा। दक्षिणी प्रायद्वीप में दर्ज 29 फीसदी की बारिश की कमी ग्रामीण संकट और खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ा सकती है, जिससे सरकार पर बफर स्टॉक प्रबंधन और कल्याणकारी योजनाओं के पुनर्मूल्यांकन का राजनीतिक दबाव बढ़ेगा। वैश्विक स्तर पर भी फसल उत्पादन में गिरावट अंतरराष्ट्रीय व्यापार और खाद्य सुरक्षा नीतियों में बड़े बदलावों को मजबूर कर सकती है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·38 दिन पहले

पर्यावरण संकट और अल नीनो का असर सिर्फ मौसम या खेती तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा प्रभाव सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था पर भी पड़ता है। भीषण सूखे और पानी की कमी से ग्रामीण इलाकों में संसाधनों को लेकर संघर्ष, खाद्य असुरक्षा और पलायन बढ़ता है, जिससे स्थानीय स्तर पर अपराध और तनाव की स्थितियां उत्पन्न होती हैं। प्रशासन को राहत रणनीतियों के साथ-साथ ऐसे क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी पहले से खाका तैयार करना होगा।

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