देश की सर्वोच्च अदालत ने सीवर, सेप्टिक टैंक और हाथों से मैला साफ करने के दौरान जान गंवाने वाले कर्मचारियों के आश्रितों को 30 लाख रुपये की सहायता राशि देने के नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराने का हुक्म दिया है। अदालत ने चेतावनी भरे लहजे में यह भी स्पष्ट किया है कि जिन सूबों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इन आदेशों की अनदेखी की जाएगी, उनके मामलों को बेहद गंभीरता से परखा जाएगा।
राज्यों की प्रगति रिपोर्ट की समीक्षा
मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत के सामने 15 अलग-अलग राज्यों की तरफ से अनुपालन हलफनामे और रिपोर्ट्स पेश की गईं। इन दस्तावेजों में मृतकों के परिवारों को आर्थिक मदद मुहैया कराने, पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करने और दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई शुरू करने से जुड़े विवरण दिए गए थे। हालांकि, अदालत ने गौर किया कि कई मामलों में केवल मुआवजा स्वीकृत किए जाने का दावा किया गया था, लेकिन इस बात का कोई पुख्ता सबूत या स्पष्टता नहीं थी कि वह धन वास्तव में पीड़ित परिवारों तक पहुंच भी पाया है या नहीं। इसी तरह, एफआईआर दर्ज किए जाने की स्थिति पर भी कई जगह असमंजस बना हुआ था। खामियों को देखते हुए पीठ ने सभी संबंधित राज्यों को आगामी चार सप्ताह के भीतर अपनी अद्यतन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।
निजी ठेकेदारों की जवाबदेही तय
न्यायालय के नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, सूबों को अब यह अनिवार्य रूप से बताना होगा कि क्या सहायता राशि का वितरण हो चुका है, मुकदमे दर्ज किए गए हैं या नहीं और दोषियों के खिलाफ क्या विधिक कदम उठाए गए हैं। इसके साथ ही, अदालत ने यह बात बिल्कुल साफ कर दी है कि यदि किसी कर्मचारी की जान किसी प्राइवेट ठेकेदार या संस्थान के अधीन काम करने के दौरान जाती है, तो भी राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से किनारा नहीं कर सकती है। सरकार की यह प्राथमिक जिम्मेदारी होगी कि वह पीड़ित परिवार को मुआवजा दिलाए और बाद में संबंधित दोषी पक्ष से उस रकम की वसूली करे। देश के अलग-अलग हिस्सों में सेप्टिक टैंक और सीवर में उतरने से मजदूरों की दम घुटने से मौत की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं, जिनमें ओडिशा के रायगढ़ा जैसे हादसे भी शामिल हैं जहां इस तरह की दुर्घटनाएं लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं।
मुआवजे की मॉडल योजना पर मंथन
सुनवाई के दौरान सफाई कर्मियों और सीवर वर्करों के लिए एक व्यापक मॉडल मुआवजा योजना पर भी विचार-विमर्श किया गया। इस प्रस्तावित रूपरेखा को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के साथ व्यापक मंत्रणा के बाद तैयार किया गया है। इस रूपरेखा के तहत मैला ढोने या सफाई के दौरान होने वाली मौतों अथवा स्थायी दिव्यांगता के मामलों को रिकॉर्ड करने, तुरंत पुलिस मामला दर्ज कराने, पीड़ित परिवारों को मुफ्त कानूनी सहायता देने और समयबद्ध तरीके से मुआवजा राशि का भुगतान सुनिश्चित करने की पुख्ता व्यवस्था सुझाई गई है। अदालत ने राज्यों को अपनी प्रशासनिक कमियों को दुरुस्त करने के लिए एक और अवसर प्रदान किया है और निर्धारित चार सप्ताह के भीतर अतिरिक्त अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दोहराया है। बिहार के गोपालगंज में हुई ऐसी ही घटनाओं और दिल्ली के मुंडका क्षेत्र में जहरीली गैस के रिसाव से मजदूरों की जान जाने के मामले इस प्रकार की व्यवस्थाओं की सख्त जरूरत को रेखांकित करते हैं।

















