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रक्षाबंधन पर सखी मंडल का बड़ा कदम, पलामू में 40,000 राखियां तैयार कर आर्थिक रूप से मजबूत हो रहीं महिलाएंझारखंड
26 अग॰ 2026, 9:19 pm (29 दिन पहले)· 3

रक्षाबंधन पर सखी मंडल का बड़ा कदम, पलामू में 40,000 राखियां तैयार कर आर्थिक रूप से मजबूत हो रहीं महिलाएं

झारखंड के पलामू जिले में सखी मंडल से जुड़ी महिलाएं रक्षाबंधन के अवसर पर 40 हजार राखियां तैयार कर रही हैं। कम लागत और स्थानीय बिक्री के जरिये यह पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वावलंबन और आय का जरिया साबित हो रही है।

रक्षाबंधन का पर्व बहनों और भाइयों के बीच पवित्र प्रेम का प्रतीक माना जाता है, लेकिन झारखंड के पलामू जिले में इस साल यह त्यौहार केवल परंपरा तक सीमित नहीं है। पर्व के नजदीक आते ही बाजारों में तरह-तरह की राखियों की मांग तेजी से बढ़ने लगी है। इस माहौल का लाभ उठाते हुए पलामू में सखी मंडल से जुड़ी ग्रामीण महिलाएं अपनी मेहनत और हुनर के बल पर रोजगार के नए द्वार खोल रही हैं। रंग-बिरंगे रेशमी धागों से भाई की कलाई सजाने के साथ-साथ ये दीदियां आर्थिक स्वावलंबन की एक नई मिसाल पेश कर रही हैं। जिले के विभिन्न हिस्सों में तैयार की जा रही इन आकर्षक राखियों की मांग अब स्थानीय बाजारों से निकलकर अन्य इलाकों तक भी पहुंचने लगी है।

तीन प्रखंडों में जोर-शोर से चल रहा निर्माण कार्य

पलामू जिले के तीन अलग-अलग प्रखंडों में सखी मंडल की सदस्य महिलाएं इन दिनों दिन-रात राखी बनाने के काम में जुटी हुई हैं। समूह की महिलाओं ने इस बार कुल मिलाकर 40 हजार राखियां तैयार करने का एक बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है। अगर पांडव प्रखंड की बात करें, तो वहां की 10 महिलाएं आपस में मिलकर करीब 10 हजार राखियां तैयार करने में लगी हैं। ये सभी महिलाएं पिछले लगभग एक महीने से लगातार इस शिल्प कार्य में व्यस्त हैं। राखियों को सुंदर और आकर्षक रूप देने के लिए रेशम के धागे, चमकीले मोती, स्वस्तिक चिह्न और अन्य सजावटी सामग्रियों का उपयोग किया जा रहा है। अलग-अलग डिजाइनों और शैलियों में बनाई जा रही ये राखियां ग्राहकों का ध्यान अपनी ओर खींच रही हैं।

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कम लागत और बेहतरीन मुनाफे का गणित

सखी मंडल से जुड़ी सुनीता देवी ने इस काम के आर्थिक पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी। उनके अनुसार राखी निर्माण का कार्य ग्रामीण महिलाओं को घर बैठे आत्मनिर्भर बनाने का एक अत्यंत सुलभ जरिया बन गया है। एक साधारण या आकर्षक राखी बनाने में अमूमन दो से तीन मिनट का समय लगता है। इसे तैयार करने में प्रति राखी लगभग चार से पांच रुपये की लागत आती है। जब इन राखियों को थोक बाजार में बेचा जाता है, तो उनकी कीमत करीब 10 रुपये तय होती है, जबकि खुदरा बाजार में ग्राहक इन्हें 15 से 20 रुपये तक की कीमत पर खुशी-खुशी खरीद रहे हैं।

स्टॉल के जरिये बिक्री और परिवार को आर्थिक मजबूती

सुनीता देवी ने बताया कि महिलाओं की टीम अब तक लगभग 10 से 15 हजार राखियां बनाकर पूरी तरह तैयार कर चुकी है। इन तैयार राखियों की सुगम बिक्री सुनिश्चित करने के लिए पलामू जिले के विभिन्न प्रमुख स्थानों पर विशेष स्टॉल भी लगाए जा रहे हैं। त्यौहारों के समय बाजारों में राखियों की मांग कई गुना बढ़ जाती है, जिससे सखी मंडल की महिलाओं को इस सीजन में बेहतरीन आय होने की उम्मीद है। इस पूरे व्यवसाय की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए किसी भारी पूंजी या बड़े निवेश की जरूरत नहीं पड़ती। महिलाएं अपने घरों में या समूह स्तर पर बैठकर इसे आसानी से बना सकती हैं। स्थानीय संसाधनों और अपने हुनर का सही इस्तेमाल कर पलामू की महिलाएं न केवल अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधार रही हैं, बल्कि त्योहार के मौके पर स्वावलंबन का एक प्रेरक संदेश भी दे रही हैं।

सवाल-जवाब

पलामू में सखी मंडल की महिलाओं ने राखी बनाने का क्या लक्ष्य रखा है?
पलामू जिले के तीन प्रखंडों में सखी मंडल की महिलाओं ने इस साल कुल 40,000 राखियां बनाने का लक्ष्य रखा है।
पांडव प्रखंड की महिलाएं कितनी राखियां तैयार कर रही हैं?
पांडव प्रखंड में 10 महिलाओं का समूह मिलकर करीब 10,000 राखियां तैयार कर रहा है।
एक राखी बनाने में कितनी लागत और समय लगता है?
एक राखी बनाने में लगभग 2 से 3 मिनट का समय लगता है और इसकी निर्माण लागत करीब 4 से 5 रुपये आती है।
इन राखियों की थोक और खुदरा बिक्री दर क्या है?
इन राखियों को थोक बाजार में लगभग 10 रुपये और खुदरा बाजार में 15 से 20 रुपये प्रति राखी की दर से बेचा जा रहा है।
तैयार राखियों की बिक्री के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
महिलाओं ने अब तक 10,000 से 15,000 राखियां तैयार कर ली हैं और इनकी बिक्री के लिए पलामू जिले के विभिन्न हिस्सों में स्टॉल लगाए जा रहे हैं।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·29 दिन पहले

पलामू में सखी मंडल की यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का एक बेहतरीन उदाहरण है। हालांकि, अपराध और कानून-व्यवस्था की दृष्टि से ऐसे आर्थिक आयोजनों में महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा, बिचौलियों से बचाव और स्थानीय बाजारों में व्यापारिक विवादों को रोकने के लिए प्रशासन को उचित निगरानी रखनी चाहिए ताकि इस मेहनत का पूरा लाभ सीधे ग्रामीण महिलाओं तक पहुँचे।

Rohan Verma@rohan-verma·29 दिन पहले

सहकर्मी की बात को आगे बढ़ाते हुए, यह समझना आवश्यक है कि इस प्रकार के स्थानीय आर्थिक अभियानों में दीदी समूहों को बिचौलियों के शोषण से बचाने के लिए जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग को सीधे विपणन और डिजिटल भुगतान के माध्यमों से जोड़ना चाहिए। यदि इन महिलाओं को उचित मूल्य पर थोक आपूर्ति के दीर्घकालिक अनुबंध मिल जाएं, तो यह मौसमी रोज़गार स्थायी आजीविका का सशक्त मॉडल बन सकता है, जिससे ग्रामीण अंचलों में आर्थिक असमानता को कम करने में भी सीधी मदद मिलेगी।

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