करीब तीन दशक बीत जाने के बावजूद इतिहास के पन्नों में दर्ज एक भयानक विमान दुर्घटना की डरावनी यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। उस वक्त जब सामान्य दिनों की तरह यात्री विमान हजारों फीट की ऊंचाई पर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे, तब किसी को इस बात का आभास तक नहीं था कि कुछ ही पलों में हवा में एक ऐसा कोहराम मचने वाला है जो पूरी दुनिया को हिलाकर रख देगा। यह घटना 12 नवंबर 1996 की रात की है, जब हरियाणा के चरखी दादरी के ऊपर आसमान में दो विमान आपस में टकरा गए थे। इस दिल दहलाने वाले हादसे में कुल 349 लोगों की मौत हो गई थी और दोनों विमानों में सवार कोई भी शख्स सुरक्षित नहीं बच पाया था।
न्यूयॉर्क में गूंजी 1996 के हादसे की गूंज
हाल ही में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम जिसका शीर्षक 'वन वर्ल्ड वन ह्यूमैनिटी' था, वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने इस दर्दनाक वाकये को याद किया। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए बताया कि जब यह भीषण दुर्घटना हुई थी, तब संघ के स्वयंसेवक फौरन राहत और बचाव कार्य के लिए घटनास्थल पर पहुंच गए थे। मोहन भागवत ने इस बात पर प्रकाश डाला कि उस समय हादसे का शिकार हुए विमानों में जान गंवाने वाले अधिकांश यात्री मुस्लिम थे, लेकिन मदद करने पहुंचे कार्यकर्ताओं के मन में कभी यह विचार तक नहीं आया कि पीड़ित किस धर्म या संप्रदाय से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वयंसेवकों ने सेवा करते वक्त कभी यह नहीं सोचा कि वे लोग कौन थे।
बिना किसी स्वार्थ के चलती है राहत सेवा
अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए मोहन भागवत ने संगठन के काम करने के तौर-तरीकों का जिक्र किया। उनके अनुसार, आरएसएस के स्वयंसेवक इस तरह की आपदाओं के समय किसी भी प्रकार के राजनीतिक लाभ या बदले की भावना की उम्मीद रखे बिना पूरी निष्ठा से काम करते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि संगठन अपने ऐसे मानवीय राहत कार्यों का बहुत अधिक प्रचार-प्रसार नहीं करता है, क्योंकि जरूरतमंदों की मदद करने के बाद प्रतिफल में किसी चीज की अपेक्षा रखना उचित नहीं माना जाता है।
आखिर उस रात आसमान में क्या हुआ था
घटना के दिन यानी 12 नवंबर 1996 को दो बड़े विमान राजधानी दिल्ली के समीप एक ही एयरस्पेस में उड़ान भर रहे थे। इनमें से पहला विमान सऊदी अरेबियन एयरलाइंस का एक विशाल बोइंग 747 था, जो सऊदी अरब के जेद्दा शहर से अपनी उड़ान पूरी करके दिल्ली की तरफ आ रहा था। इस विमान के भीतर कुल 312 लोग सवार थे। इसके विपरीत दिशा में कजाखस्तान एयरलाइंस का एक इल्यूशिन आईएल-76 विमान दिल्ली से उड़ान भरकर कजाखस्तान के चिमकेंट शहर की ओर जा रहा था, जिसमें 37 लोग सवार थे। दोनों विमानों को मिलाकर कुल 349 यात्री और क्रू मेंबर आसमान में सफर कर रहे थे।
हरियाणा के आसमान में टरकराए दो विमान
दिल्ली से लगभग 100 किलोमीटर पश्चिम दिशा में स्थित हरियाणा के चरखी दादरी क्षेत्र के ऊपर जब ये दोनों विमान पहुंचे, तो दोनों एक ही एयरस्पेस की सीमा में आ गए। नियमानुसार कजाखस्तान के विमान को लगभग 15000 फीट की ऊंचाई बनाकर चलने का निर्देश दिया गया था। मगर तकनीकी कारणों या अन्य वजहों से वह विमान अपनी निर्धारित ऊंचाई से नीचे उतरने लगा। ठीक उसी समय दूसरी तरफ से आ रहा सऊदी एयरलाइंस का बोइंग विमान भी उसी वायुक्षेत्र से गुजर रहा था। जब कजाख विमान नीचे उतरते हुए करीब 14000 फीट की ऊंचाई तक पहुंचा, तो दोनों विमान एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए और इसके बाद वह खौफनाक टक्कर हो गई।
मची तबाही और तिनके की तरह बिखरे विमान
अचानक हुई इस जोरदार टक्कर के बाद दोनों विमानों से पायलटों का नियंत्रण पूरी तरह छूट गया। विमानों के बड़े-बड़े हिस्से हवा में ही चीरकर अलग हो गए और फिर विकराल आग की लपटों तथा मलबे के साथ सीधे जमीन पर आ गिरे। चरखी दादरी और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में चारों तरफ तबाही का खौफनाक मंजर फैल गया। दोनों विमानों में कुल मिलाकर जितने भी 349 लोग सवार थे, उन सबकी मौत हो गई। इस भीषण दुर्घटना में किसी के भी बचने की कोई गुंजाइश बाकी नहीं रही थी।
कम्युनिकेशन गैप बना सबसे बड़ा कारण
इस पूरे विमान हादसे की जब आधिकारिक जांच की गई, तो यह बात खुलकर सामने आई कि दुर्घटना के पीछे सबसे मुख्य वजह संवादहीनता यानी कम्युनिकेशन की बड़ी दिक्कत थी। कजाखस्तान एयरलाइंस के विमान के चालक दल को अंग्रेजी भाषा में बातचीत करने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। एयर ट्रैफिक कंट्रोल यानी एटीसी से मिलने वाले कई निर्देश सीधे पायलट तक पहुंचने के बजाय एक रेडियो ऑपरेटर के माध्यम से पहुंच रहे थे। यहीं से विमान की ऊंचाई यानी एल्टीट्यूड को लेकर भारी भ्रम पैदा हो गया। जांच रिपोर्ट में यह बात भी स्थापित हुई कि कजाख विमान को जिस ऊंचाई पर रहना था, वह लगातार उससे नीचे आ रहा था। दूसरी तरफ सऊदी एयरलाइंस का विमान भी उसी रास्ते से गुजर रहा था और दोनों के बीच का अंतर इतना कम हो गया कि उन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला। चरखी दादरी का यह विमान हादसा न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के विमानन इतिहास के सबसे काले और दर्दनाक अध्यायों में दर्ज हो चुका है, जिसने सुरक्षा प्रणालियों पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।





















