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सीतापुर के महमूदाबाद में सामाजिक परंपरा तोड़ 60 वर्षीय विमला देवी ने 55 वर्षीय भाई लालू पटवा को दी मुखाग्निउत्तर प्रदेश
14 अग॰ 2026, 8:24 am (30 दिन पहले)· 1

सीतापुर के महमूदाबाद में सामाजिक परंपरा तोड़ 60 वर्षीय विमला देवी ने 55 वर्षीय भाई लालू पटवा को दी मुखाग्नि

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में परिवार में कोई पुरुष सदस्य न होने पर 60 वर्षीय विमला देवी ने आगे बढ़कर अपने 55 वर्षीय भाई लालू पटवा के अंतिम संस्कार की रस्में निभाईं और रमुआपुर मुक्तिधाम में मुखाग्नि दी।

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में पारिवारिक जिम्मेदारी और भाई-बहन के अटूट प्रेम की एक भावुक कर देने वाली घटना सामने आई है। महमूदाबाद नगर के कुरैशी मार्ग में रहने वाले 55 वर्षीय लालू पटवा के बीमारी के कारण निधन के बाद उनकी 60 वर्षीय बहन विमला देवी ने सामाजिक रूढ़ियों को दरकिनार करते हुए स्वयं अंतिम संस्कार की कमान संभाली। घर में कोई पुरुष सदस्य मौजूद न होने के कारण विमला देवी ने पूरे धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ अपने भाई का अंतिम संस्कार संपन्न कराया और रमुआपुर मुक्तिधाम में उन्हें मुखाग्नि देकर विदाई दी।

लालू पटवा का अकेला जीवन और अचानक निधन

महमूदाबाद के कुरैशी मार्ग निवासी 55 वर्षीय लालू पटवा संकटा देवी मंदिर परिसर में एक छोटी सी दुकान चलाकर अपना जीवन यापन करते थे। कुछ वर्ष पूर्व उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर चली गई थीं, जिसके बाद से वे घर में अकेले ही रह रहे थे। वे अपने परिवार के इकलौते पुरुष सदस्य थे। अचानक बीमारी की चपेट में आने से उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई, जिसके चलते उनका निधन हो गया। उनके गुजर जाने के बाद परिवार में ऐसा कोई पुरुष सदस्य नहीं बचा था जो पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार अंतिम संस्कार की रस्मों को पूरा कर सके।

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बहन विमला देवी ने संभाली अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी

भाई के निधन की सूचना मिलते ही उनकी 60 वर्षीय बड़ी बहन विमला देवी तुरंत मौके पर पहुंचीं। परिवार में किसी पुरुष सदस्य के न होने से उपजे संकट के बीच विमला देवी ने बिना किसी हिचकिचाहट के भाई की अंतिम यात्रा और दाह संस्कार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेने का फैसला किया। उन्होंने पारंपरिक सामाजिक प्रथाओं से ऊपर उठकर एक बहन के कर्तव्य को प्राथमिकता दी। विमला देवी अपने भाई लालू पटवा के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए रमुआपुर स्थित मुक्तिधाम लेकर गईं और सभी आवश्यक व्यवस्थाएं स्वयं कीं।

रमुआपुर मुक्तिधाम में नम आंखों से दी मुखाग्नि

अंतिम संस्कार के दौरान सबसे भावुक क्षण तब आया जब रमुआपुर मुक्तिधाम में विमला देवी ने वैदिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए अपने भाई को मुखाग्नि दी। सामान्य तौर पर हिंदू परंपराओं में अंतिम संस्कार के समय मुखाग्नि देने की जिम्मेदारी परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा निभाई जाती है। लेकिन इस विषम परिस्थिति में विमला देवी का यह साहसिक कदम देखकर वहां उपस्थित सभी लोगों का हृदय भर आया। मुक्तिधाम में मौजूद हर व्यक्ति की आंखें इस दृश्य को देखकर नम हो गईं।

स्थानीय लोगों ने विमला देवी के साहस की सराहना की

लालू पटवा की अंतिम यात्रा और दाह संस्कार के समय महमूदाबाद के बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक एकत्र हुए थे। सभी ने दिवंगत लालू पटवा को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित की और दुखी बहन विमला देवी के प्रति गहरी संवेदनाएं व्यक्त कीं। वहां उपस्थित लोगों ने कहा कि विमला देवी ने यह सिद्ध कर दिया कि भाई-बहन का अटूट रिश्ता केवल सुख-दुख के मौकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन के अंतिम सफर तक साथ निभाने का नाम है। कठिन समय में विमला देवी द्वारा दिखाया गया यह धैर्य और साहस पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

सवाल-जवाब

यह घटना उत्तर प्रदेश के किस क्षेत्र की है?
यह घटना उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के महमूदाबाद नगर स्थित कुरैशी मार्ग की है।
मृतक लालू पटवा की आयु कितनी थी और वे क्या कार्य करते थे?
लालू पटवा 55 वर्ष के थे और महमूदाबाद के संकटा देवी मंदिर परिसर में दुकान चलाकर अपना जीवन यापन करते थे।
विमला देवी को अपने भाई का अंतिम संस्कार क्यों करना पड़ा?
लालू पटवा घर में अकेले रहते थे और परिवार में कोई पुरुष सदस्य मौजूद नहीं था, जिसके कारण उनकी 60 वर्षीय बहन विमला देवी ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभाली।
लालू पटवा का दाह संस्कार किस स्थान पर किया गया?
उनका दाह संस्कार महमूदाबाद के रमुआपुर स्थित मुक्तिधाम में पूर्ण धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ किया गया।
बहन विमला देवी द्वारा मुखाग्नि दिए जाने पर स्थानीय लोगों की क्या प्रतिक्रिया रही?
मुक्तिधाम में मौजूद स्थानीय लोगों की आंखें नम हो गईं और सभी ने विमला देवी के साहस व भाई के प्रति उनके समर्पण की सराहना की।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Arjun Mehta@arjun-mehta·29 दिन पहले

यह घटना पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंडों के उस लचीलेपन को दर्शाती है जो संकट के समय व्यावहारिक और मानवीय संवेदनाओं के आगे झुकता है। सीतापुर की इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत कर्तव्य और पारिवारिक दायित्व अब पारंपरिक रूढ़ियों की सीमाओं को पार कर रहे हैं, जो भारतीय समाज में अंतर्निहित बदलाव का एक सकारात्मक संकेत है।

Arshdeep Ahluwalia@arshdeep-ahluwalia·29 दिन पहले

अर्शदीप अहलूवालिया: उत्तर भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इस तरह के मामले इस बात का प्रमाण हैं कि जब पारंपरिक व्यवस्थाएं या पुरुष प्रधान परिवार असमर्थ होते हैं, तब समाज की गतिशीलता स्वतः ही इन रूढ़ियों को तोड़ देती है। सीतापुर की यह घटना केवल एक परिवार का व्यक्तिगत प्रसंग नहीं है, बल्कि यह इस ओर संकेत करती है कि संकट की घड़ी में मानवीय संवेदनाएं और कर्तव्य बोध पितृसत्तात्मक दायरों से कहीं अधिक मजबूत साबित होते हैं, जो आने वाले समय में सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·29 दिन पहले

सीतापुर की यह घटना पारंपरिक पितृसत्तात्मक मान्यताओं को चुनौती देती है। कानूनी और सामाजिक दृष्टि से अंतिम संस्कार का अधिकार व्यक्तिगत नहीं बल्कि मानवीय और पारिवारिक कर्तव्य है। ऐसे मामलों में महिलाओं द्वारा आगे आना यह दर्शाता है कि समय के साथ रूढ़िवादिता टूट रही है और न्यायोचित समानता की दिशा में यह समाज का एक सकारात्मक बदलाव है।

Ravikash Gupta@ravikash·29 दिन पहले

यह घटना महज़ एक व्यक्तिगत पारिवारिक प्रसंग नहीं है, बल्कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में सामाजिक संरचना के भीतर आ रहे गहरे बदलाव का संकेत है। जब परिवार में पुरुष सदस्य के न होने पर महिलाओं ने अंतिम संस्कार जैसी परंपराओं की कमान अपने हाथ में ली है, तो यह पितृसत्तात्मक दायित्वों के विभाजन को चुनौती देता है। आने वाले समय में यह आर्थिक और पारिवारिक अधिकारों के मामलों में भी महिलाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को अधिक प्रगतिशील बनाने में मदद करेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·29 दिन पहले

सीतापुर की यह घटना उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी समाज में धीमी गति से आ रहे वैचारिक बदलाव का एक सशक्त उदाहरण है। जब परिवार में पुरुष सदस्य का अभाव होता है, तब रूढ़िवादिता को तोड़कर महिलाओं का ऐसे कठिन प्रशासनिक और धार्मिक उत्तरदायित्वों को संभालना यह दर्शाता है कि लैंगिक पूर्वाग्रहों की दीवारें अब दरकने लगी हैं। ऐसी खबरें न केवल पारिवारिक बंधनों की मजबूती को रेखांकित करती हैं, बल्कि समाज को पितृसत्तात्मक दायित्वों से परे एक नई व्यावहारिक दृष्टि भी प्रदान करती हैं।

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