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नासिक कुंभ के बजट का 0.1% हिस्सा भी बच जाता तो बंद नहीं होते मराठी माध्यम के 100 से अधिक स्कूल: जस्टिस प्रसन्ना बी. वरालेमहाराष्ट्र
24 अग॰ 2026, 8:21 pm (2 घंटे पहले)· 2

नासिक कुंभ के बजट का 0.1% हिस्सा भी बच जाता तो बंद नहीं होते मराठी माध्यम के 100 से अधिक स्कूल: जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने महाराष्ट्र में बंद हो रहे सरकारी स्कूलों को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि बड़े धार्मिक आयोजनों और कॉरिडोर परियोजनाओं पर भारी भरकम खर्च की तुलना में यदि मामूली राशि भी शिक्षा को मिल जाए, तो संकट में फंसे स्कूलों को बचाया जा सकता है।

महाराष्ट्र में सरकारी स्कूलों की बदहाली और घटते संसाधनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने तीखी टिप्पणी की है। धुले जिले के एक हाईस्कूल में स्मार्ट क्लासरूम के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने राज्य में शिक्षा के बजट और बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स के बीच वित्तीय प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि यदि बड़े आयोजनों के लिए तय राशि का एक बहुत छोटा हिस्सा भी प्राथमिक शिक्षा के लिए मोड़ दिया जाए, तो कई जरूरतमंद स्कूलों का भविष्य सुरक्षित हो सकता है।

नासिक कुंभ और कॉरिडोर खर्च पर सवाल

कार्यक्रम के दौरान जस्टिस वराले ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि नासिक कुंभ के आयोजन के लिए लगभग 32 से 34 हजार करोड़ रुपये का भारी भरकम बजट तय किया गया है। इसके अलावा विभिन्न कॉरिडोर परियोजनाओं पर भी लगभग 11 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यदि नासिक कुंभ के विशाल बजट का मात्र 0.1 प्रतिशत हिस्सा भी मराठी माध्यम के स्कूलों को पुनर्जीवित करने के लिए उपयोग में लाया जाता, तो महाराष्ट्र में करीब 100 से 125 स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था। उनके हिसाब से यह मामूली सा 0.1 प्रतिशत हिस्सा लगभग 32 करोड़ रुपये बैठता है, जो इन संस्थानों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी होता।

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अपनी पढ़ाई और क्षेत्रीय भाषा का अनुभव

अपने निजी जीवन और स्कूली शिक्षा को याद करते हुए न्यायाधीश ने मातृभाषा में पढ़ाई के महत्व पर रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी दसवीं कक्षा तक की पूरी पढ़ाई नगर निगम और जिला परिषद के सरकारी स्कूलों से ही मराठी माध्यम में पूरी की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा प्राप्त करने से उनके पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन में कभी कोई रुकावट या बाधा नहीं आई, बल्कि इससे उनकी समझ का दायरा और अधिक विस्तृत हुआ। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार की पहली प्राथमिकता बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना होना चाहिए। एनडीटीवी के साथ बाद की बातचीत में भी उन्होंने दोहराया कि शिक्षा की स्थिति पर उन्होंने जो भी विचार रखे, वे उनके दिल की सच्ची आवाज हैं।

बच्चों का भविष्य और ग्रामीण स्कूलों की त्रासदी

देश के नौनिहालों को भविष्य की नींव बताते हुए जस्टिस वराले ने कहा कि शिक्षण संस्थानों में बच्चों के लिए सभी आवश्यक बुनियादी और सुरक्षित सुविधाएं होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य को भी देश के हर नागरिक का एक बुनियादी अधिकार माना। इसके साथ ही उन्होंने ग्रामीण अंचल के स्कूलों की दयनीय स्थिति पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने एक दिल दहला देने वाली घटना का जिक्र किया जिसमें एक धार्मिक संस्था से जुड़े स्कूल में पर्याप्त सुविधाएं न होने के कारण तीन छात्राओं को मजबूरन फर्श पर सोना पड़ा था और बाद में सांप के डसने से उन तीनों बच्चियों की मौत हो गई थी।

प्राथमिकताओं में बदलाव की जरूरत

इस तरह की त्रासदियों को बड़े आयोजनों और विकास कार्यों पर पानी की तरह बहने वाले धन के साथ जोड़ते हुए उन्होंने अपनी बात रखी। उनका साफ मानना था कि बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा जैसी बुनियादी और अनिवार्य जरूरतों को सरकारी प्राथमिकताओं में उचित स्थान मिलना ही चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र के कुल शिक्षा बजट को लेकर भी गहरी निराशा व्यक्त की। उन्होंने आंकड़े सामने रखते हुए बताया कि स्कूलों में छात्रों की संख्या में लगातार इजाफा होने के बावजूद, पिछले कई वर्षों से शिक्षा क्षेत्र के लिए आवंटित होने वाला कुल बजट 13 प्रतिशत के आंकड़े से नीचे ही बना हुआ है।

सवाल-जवाब

जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने किस कार्यक्रम में बयान दिया?
उन्होंने धुले जिले के एक हाईस्कूल में स्मार्ट क्लासरूम के उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान यह बात कही।
नासिक कुंभ के लिए कितना बजट तय किया गया है?
नासिक कुंभ के लिए लगभग 32 से 34 हजार करोड़ रुपये का बजट बताया गया है।
कितने मराठी स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था?
कुंभ के बजट का 0.1 फीसदी हिस्सा इस्तेमाल करने पर लगभग 100 से 125 स्कूलों को बचाया जा सकता था।
जस्टिस वराले ने अपनी स्कूली शिक्षा कहां से पूरी की थी?
उन्होंने कक्षा 10 तक नगर निगम और जिला परिषद के स्कूलों से मराठी माध्यम में पढ़ाई की थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 मिनट पहले

न्यायाधीश की यह टिप्पणी सिर्फ वित्तीय प्राथमिकताओं पर सवाल नहीं है, बल्कि सार्वजनिक धन के प्रबंधन और व्यवस्थागत लापरवाही पर एक गंभीर कानूनी व सामाजिक बहस छेड़ती है। ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी सुरक्षा का अभाव और प्रशासनिक उदासीनता कई बार सीधे तौर पर आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आ जाती है। यदि शिक्षा और बच्चों की सुरक्षा जैसे मौलिक अधिकारों के हनन पर नीतिगत स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की गई, तो इस तरह की व्यवस्थागत चूक भविष्य में भी गंभीर त्रासदियों का कारण बनती रहेंगी।

Rohan Verma@rohan-verma·13 मिनट पहले

यह मामला सीधे तौर पर नीतिगत प्राथमिकताओं और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब तक बड़े आयोजनों के बजट और बुनियादी शिक्षा के फंड के बीच संतुलन नहीं बनेगा, तब तक ग्रामीण और सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार असंभव है। इस तरह की व्यवस्थागत चूक न केवल बच्चों के मौलिक अधिकारों का हनन करती है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के साथ खिलवाड़ भी है। यदि समय रहते नीति निर्माताओं ने इस दिशा में सख्त कदम नहीं उठाए, तो क्षेत्रीय शिक्षा का ढांचा और अधिक चरमरा जाएगा।

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