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उत्तराखंड के बागेश्वर और कुमाऊं के गांवों से पलायन की मार, बुजुर्गों के भरोसे बची बस्तियांउत्तराखंड
16 अक्तू॰ 2026, 7:18 pm (21 दिन पहले)· 1

उत्तराखंड के बागेश्वर और कुमाऊं के गांवों से पलायन की मार, बुजुर्गों के भरोसे बची बस्तियां

उत्तराखंड के बागेश्वर और कुमाऊं क्षेत्र के पर्वतीय गांवों में पलायन के कारण स्थिति बदल रही है, जहां रोजगार और शिक्षा की कमी के चलते युवा शहरों का रुख कर रहे हैं और गांवों में केवल बुजुर्ग ही बचे हैं।

उत्तराखंड के बागेश्वर समेत कुमाऊं मंडल के तमाम पर्वतीय इलाकों में ग्रामीण जीवन का स्वरूप बीते कुछ दशकों में काफी बदला है। एक वक्त था जब सुबह की शुरुआत मवेशियों के गले की घंटियों, महिलाओं की आपसी बातचीत, खेतों में पसीना बहाते किसानों और बच्चों की किलकारियों से हुआ करती थी। हर घर में लोगों का आना-जाना लगा रहता था और मेल-जोल पहाड़ी संस्कृति की पहचान हुआ करता था, लेकिन आज कई गांवों की तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आने लगी है। रोजगार, उच्च शिक्षा और बेहतर नागरिक सुविधाओं की चाहत में युवा और परिवार लगातार मैदानों की ओर रुख कर रहे हैं, जिसका सीधा असर गांवों की आबादी, कृषि और पारंपरिक रहन-सहन पर पड़ रहा है।

बीते दौर में हर घर में हुआ करती थी रौनक

स्थानीय जानकारों के मुताबिक, पुराने समय में पहाड़ी गांवों में भौतिक सुविधाएं भले ही कम थीं, लेकिन सामाजिक ताना-बाना बहुत मजबूत हुआ करता था। लोग एक-दूसरे के सुख और दुख में हमेशा साथ खड़े रहते थे। शादी-ब्याह, पर्व और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पूरा गांव एक परिवार की तरह मिलजुलकर जुटता था। खेतों में रोपाई और फसल कटाई के वक्त सामूहिक रूप से काम करने की परंपरा थी। महिलाओं के पारंपरिक लोकगीत, बच्चों के देसी खेल और बुजुर्गों की चौपालें रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा थीं। उस दौर में सड़क, बिजली, पेयजल और चिकित्सा जैसी आधुनिक सुविधाएं सीमित थीं, फिर भी लोग स्थानीय संसाधनों और पशुपालन के भरोसे जीवन गुजारते थे।

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खेती-किसानी और पशुपालन हुआ करता था मुख्य सहारा

पहाड़ की पुरानी आजीविका में कृषि और पशुपालन की रीढ़ की हड्डी जैसी भूमिका हुआ करती थी। ग्रामीण धान, गेहूं, मंडुवा, झंगोरा जैसी स्थानीय फसलें उगाते थे। हर घर में गाय, बैल और बकरियां पालना आम बात थी। मवेशियों के लिए जंगलों से चारा लाना, खेतों में जैविक खाद डालना और परिवार के सभी सदस्यों का खेती में हाथ बंटाना दिनचर्या का हिस्सा था। वक्त के साथ खेती-किसानी के तरीकों में भी बदलाव आया है। आज कई इलाकों में पारंपरिक खेती का दायरा सिमट गया है। गांवों से युवाओं के बाहर चले जाने के कारण कृषि कार्यों के लिए पर्याप्त श्रम नहीं मिल पा रहा है, जिससे कई खेत बंजर हालत में पड़े हैं। इसके अलावा जंगली जानवरों द्वारा फसलों को पहुंचाया जाने वाला नुकसान और खेती से बेहद सीमित कमाई भी किसानों के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। हालांकि कुछ ग्रामीण आज भी बागवानी और पशुपालन के बल पर डटे हुए हैं।

गांवों में रह गए हैं बुजुर्ग, शहर चले गए युवा

पहाड़ के गांवों से हो रहे इस बड़े पैमाने पर पलायन का सबसे बुरा प्रभाव सामाजिक जीवन पर पड़ा है। पढ़ाई और नौकरी की तलाश में युवा हल्द्वानी, देहरादून, दिल्ली समेत अन्य बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं। कई परिवार अपने बच्चों की बेहतर तालीम और स्वास्थ्य सुविधाओं की खातिर गांव छोड़ने के लिए विवश हैं। इसका परिणाम यह है कि अनेक बस्तियों में अब केवल बुजुर्ग माता-पिता ही शेष रह गए हैं। अधिकांश घरों पर ताले लटके हुए हैं, आंगनों की रौनक गायब हो चुकी है और बच्चों की हंसी-खुशी की आवाजें बमुश्किल सुनाई देती हैं। पर्वों और छुट्टियों के दौरान जब बाहर रहने वाले लोग वापस लौटते हैं, तो कुछ दिनों के लिए चहल-पहल जरूर बढ़ती है, लेकिन बाकी महीनों में गांव वीरान नजर आते हैं।

किन वजहों से खाली हो रहे हैं पहाड़ के गांव

ग्रामीण इलाकों से आबादी के घटने के पीछे कई ठोस कारण जिम्मेदार हैं। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों की भारी कमी, उच्च शिक्षा के बेहद सीमित विकल्प, स्वास्थ्य सेवाओं तक समय पर पहुंच न होना और कृषि से नाममात्र की आय प्रमुख समस्याओं में शामिल हैं। सड़क और परिवहन नेटवर्क में कुछ सुधार के बावजूद दूरदराज के गांवों में बुनियादी जरूरतें आज भी आसानी से नहीं मिल पाती हैं। युवा वर्ग के मन में अपने उज्ज्वल भविष्य को लेकर अनगिनत सवाल हैं, जिसके चलते वे स्थायी नौकरी और आधुनिक जीवनशैली की उम्मीद में शहरों में बस रहे हैं। इस वजह से गांवों का डेमोग्राफिक संतुलन बिगड़ रहा है और पारंपरिक आजीविका को सहेजने वाले लोग कम होते जा रहे हैं।

क्या दोबारा लौट सकती है पहाड़ी गांवों की पुरानी रौनक

पहाड़ी बस्तियों को फिर से आबाद करने के लिए स्थानीय स्तर पर आजीविका के नए साधन विकसित करना बेहद जरूरी है। पर्यटन, होमस्टे संचालन, स्थानीय उत्पादों के विपणन, बागवानी, पशुपालन और स्वरोजगार की योजनाओं को गति देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सकता है। इसके साथ ही गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, ब्रॉडबैंड इंटरनेट और सुगम परिवहन जैसी सुविधाओं का विस्तार करना भी अनिवार्य है। बागेश्वर जैसे पर्वतीय जनपदों में प्राकृतिक सौंदर्य, अनूठी सांस्कृतिक थाती और पारंपरिक खानपान की अपार संभावनाएं छिपी हैं। यदि इन तमाम संसाधनों को सुनियोजित ढंग से रोजगार से जोड़ दिया जाए, तो स्थानीय युवाओं को अपने ही क्षेत्र में काम मिल सकेगा।

सवाल-जवाब

बागेश्वर और कुमाऊं के गांवों से पलायन क्यों हो रहा है?
रोजगार के अवसरों की कमी, उच्च शिक्षा की समस्या, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और खेती से कम आमदनी के कारण लोग पलायन कर रहे हैं।
पहाड़ के गांवों में अब मुख्य रूप से कौन रह रहा है?
युवाओं और परिवारों के शहरों में बस जाने के कारण कई गांवों में मुख्य रूप से बुजुर्ग ही रह गए हैं।
पहाड़ी गांवों की कृषि पर पलायन का क्या असर पड़ा है?
श्रम की कमी और जंगली जानवरों के नुकसान के कारण कई खेत बंजर पड़े हैं और पारंपरिक खेती का दायरा घट गया है।
गांवों की रौनक दोबारा लौटाने के लिए क्या उपाय सुझाए गए हैं?
पर्यटन, होमस्टे, स्वरोजगार, बागवानी को बढ़ावा देने और गांवों में शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई है।
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टिप्पणियाँ 5

Neha Verma@neha-verma·20 दिन पहले

मवेशियों के गले की घंटियाँ और चौपालें अब सिर्फ यादों में ही बची हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·20 दिन पहले

पलायन की बात सही है, पर क्या सिर्फ रोजगार और शिक्षा ही वजह है? सुविधाएं अब गांवों में भी पहुंच रही हैं, फिर भी लोग लौट नहीं रहे। मुझे लगता है शहरों की चमक-धमक भी एक बड़ा कारण है जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है।

Ravikash Gupta@ravikash·20 दिन पहले

अर्जुन, चमक-धमक तो है ही, पर जब तक ढंग की कमाई और अस्पताल नहीं होंगे, कोई वापस नहीं आएगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·20 दिन पहले

पहाड़ खाली हो रहे हैं और गांवों में सिर्फ बुजुर्ग बचे हैं, ये दृश्य बहुत दर्दनाक है। रोजगार और शिक्षा के बिना ये पलायन रुकेगा नहीं।

Rohan Verma@rohan-verma·20 दिन पहले

करण भाई, सच कह रहे हो। मैं पिछले महीने ही कुमाऊं के एक गांव गया था, वहां ताले लटके मिले और बस दो बुजुर्ग मिले जो अकेले रहते हैं।

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