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उत्तराखंड के गंगोलीहाट में छात्राओं के लिए अनूठी मुहिम, शिक्षकों ने खरीदी साइकिलें ताकि आसान हो सके पढ़ाई का सफरउत्तराखंड
11 अक्तू॰ 2026, 7:46 pm (26 दिन पहले)· 1

उत्तराखंड के गंगोलीहाट में छात्राओं के लिए अनूठी मुहिम, शिक्षकों ने खरीदी साइकिलें ताकि आसान हो सके पढ़ाई का सफर

पिथौरागढ़ जिले के भूलीगांव इंटर कॉलेज में प्रभारी प्रधानाचार्य आनंद मेहरा और शिक्षकों ने छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्कूल समय से पहले साइकिल चलाने का विशेष प्रशिक्षण शुरू किया है।

पहाड़ी अंचलों में स्कूली बच्चों के लिए रोजाना स्कूल तक पहुंचना एक कठिन चुनौती बना रहता है, जहां कई किलोमीटर का दुर्गम रास्ता रोज पैदल नापना पड़ता है। इस दैनिक संघर्ष को कम करने और बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से पिथौरागढ़ जिले की गंगोलीहाट तहसील स्थित भूलीगांव इंटर कॉलेज में एक खास शुरुआत की गई है। कॉलेज के प्रभारी प्रधानाचार्य आनंद मेहरा ने साथी शिक्षकों के सहयोग से अपने व्यक्तिगत खर्च पर छात्राओं को साइकिल चलाना सिखाने का बीड़ा उठाया है। इस कार्य के लिए शिक्षकों ने मिलकर चार साइकिलों की व्यवस्था की है, जिससे छात्राओं की आवाजाही सुगम हो सके।

कक्षा में अंग्रेजी पढ़ाते वक्त आया बदलाव का विचार

इस नवाचार की प्रेरणा प्रभारी प्रधानाचार्य आनंद मेहरा को कक्षा 11 के विद्यार्थियों को अंग्रेजी विषय पढ़ाते समय मिली। शिक्षण के दौरान उनके मन में विचार आया कि सुदूर पर्वतीय क्षेत्र की छात्राओं के जीवन को व्यावहारिक रूप से संवारने के लिए कुछ उपयोगी कदम उठाया जाना चाहिए। शुरुआत में उन्होंने छात्राओं के लिए घुड़सवारी के प्रशिक्षण पर विचार किया था, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यावहारिक उपयोगिता को देखते हुए साइकिल चलाने को कहीं अधिक लाभकारी पाया गया। मेहरा के अनुसार, आयु बढ़ने के साथ नया कौशल सीखने में झिझक और कठिनाई बढ़ जाती है, इसलिए छोटी उम्र में ही संतुलन और पहियों पर नियंत्रण सीख लेना बेहतर रहता है। उनका मानना है कि साइकिल चलाने से मिला आत्मविश्वास आगे चलकर बालिकाओं को स्कूटी अथवा मोटरसाइकिल चलाने में भी मदद करेगा, जो उनके भविष्य के सफर में अत्यंत उपयोगी साबित होगा।

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स्कूल शुरू होने से एक घंटा पहले पहुंचती हैं छात्राएं

इस प्रशिक्षण सत्र के लिए छात्राएं सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों के शुरू होने से लगभग एक घंटा पहले ही विद्यालय परिसर में पहुंच जाती हैं। सुबह के इस अतिरिक्त समय में शिक्षक स्वयं मैदान में उपस्थित रहकर छात्राओं को साइकिल चलाने की तकनीकी बारीकियां और संतुलन सिखाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में एक प्रेरणादायी बात यह भी देखने को मिल रही है कि जो छात्राएं साइकिल चलाना सीख चुकी हैं, वे अब अपनी कनिष्ठ छात्राओं को सिखाने में सक्रिय सहयोग दे रही हैं। आपसी सहयोग की इस भावना से छात्राओं के भीतर झिझक दूर हो रही है और उनका आत्मविश्वास तेजी से बढ़ रहा है।

छह सदनों के आधार पर तय की गई प्रशिक्षण व्यवस्था

संस्थान में अध्ययनरत सभी छात्राओं को समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए एक व्यवस्थित कार्ययोजना तैयार की गई है। विद्यालय में कुल छह सदन बनाए गए हैं और इन्हीं सदनों के आधार पर बालिकाओं का प्रशिक्षण चक्र तय किया जाता है। इस सुविचारित व्यवस्था से प्रत्येक छात्रा को बारी-बारी से नियमित अभ्यास का अवसर प्राप्त हो रहा है। शिक्षक बालिकाओं को सिखाने के साथ-साथ इस बात की भी निगरानी करते हैं कि छात्राएं एक-दूसरे को सुरक्षित वातावरण में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें।

सवाल-जवाब

यह साइकिल प्रशिक्षण किस स्कूल में शुरू किया गया है?
यह प्रशिक्षण पिथौरागढ़ जिले की गंगोलीहाट तहसील स्थित भूलीगांव इंटर कॉलेज में शुरू किया गया है।
छात्राओं को साइकिल सिखाने की पहल किसने की?
यह पहल भूलीगांव इंटर कॉलेज के प्रभारी प्रधानाचार्य आनंद मेहरा ने अन्य शिक्षकों के सहयोग से की है।
प्रशिक्षण के लिए साइकिलें कैसे खरीदी गईं?
प्रभारी प्रधानाचार्य आनंद मेहरा और विद्यालय के अन्य शिक्षकों ने अपने व्यक्तिगत खर्चे पर चार साइकिलें खरीदी हैं।
साइकिल चलाने का प्रशिक्षण किस समय दिया जाता है?
छात्राएं रोज स्कूल शुरू होने से करीब एक घंटे पहले पहुंचती हैं, जहां शिक्षक उन्हें प्रशिक्षण देते हैं।
साइकिल सिखाने का विचार सबसे पहले कैसे आया?
प्रभारी प्रधानाचार्य आनंद मेहरा जब कक्षा 11 में अंग्रेजी पढ़ा रहे थे, तब उनके मन में छात्राओं को यह कौशल सिखाने का विचार आया था।
स्कूल में सभी छात्राओं के अभ्यास के लिए क्या व्यवस्था है?
स्कूल के छह सदनों के आधार पर व्यवस्था बनाई गई है, जिससे सभी छात्राएं बारी-बारी से साइकिल सीख सकें।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Nyra Kaif@nyra-kaif·25 दिन पहले

पहाड़ों की इन बेटियों के लिए साइकिल चलाना सिर्फ स्कूल जाने का जरिया नहीं, बल्कि असली आज़ादी है। जब गुरु खुद आगे आकर ऐसा रास्ता बनाएं, तो हौसला तो बढ़ना ही है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·25 दिन पहले

पहाड़ों में स्कूली बच्चियों की लंबी पैदल राह और दूरी हमेशा से एक बड़ा संकट रही है, जिस पर सरकारी नीतियों और बजट के भाषणों में अक्सर बात होती है पर ज़मीन पर ऐसे ही स्थानीय शिक्षक खुद पहल करके रास्ता निकालते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·25 दिन पहले

अर्जुन, बिल्कुल सही कहा। उत्तराखंड के पहाड़ी रास्तों पर जब मैं खुद रिपोर्टिंग के लिए गया था, तब मैंने इन बच्चियों को रोज मीलों पैदल चलते देखा था।

Rohan Verma@rohan-verma·25 दिन पहले

शुरुआत में घुड़सवारी सिखाने का सोचना वाकई दिलचस्प था, पर गनीमत है बाद में साइकिल का ख्याल आया वरना पहाड़ी रास्तों पर घोड़ा संभालना बच्चों का खेल थोड़ी है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·25 दिन पहले

रोहन भाई, सही कहा आपने! पिछले साल जब मैं उत्तराखंड के दौरे पर था, तब एक पहाड़ी स्कूल के बच्चों को मीलों पैदल चलते देखा था, सच में बहुत मुश्किल सफर होता है।

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