राजस्थान के झुंझुनूं जिला मुख्यालय से लगभग 5 से 6 किलोमीटर की दूरी पर बसा आबूसर गांव अपने भीतर एक अनोखा इतिहास समेटे हुए है। यह क्षेत्र न केवल अपने प्राचीन अतीत के लिए जाना जाता है, बल्कि आधुनिक कृषि के क्षेत्र में मिली राष्ट्रीय ख्याति के कारण भी खास महत्व रखता है। इस गांव की स्थापना की कहानी करीब 18वीं सदी से जुड़ी है, जब बंजारा सरदार आबूजी ने यहां अपना डेरा डाला था। किंवदंतियों और लोक मान्यताओं के अनुसार, पुत्र रत्न की प्राप्ति के बाद बंजारा सरदार ने रास्ते से गुजरने वाले राहगीरों की प्यास बुझाने के मकसद से एक कुएं का निर्माण करवाया था। आगे चलकर इसी कुएं की वजह से इस पूरी बस्ती का नाम आबूसर पड़ गया। कभी बंजारों के व्यापारिक कारवां के लिए ठहरने और आराम करने की प्रमुख जगह हुआ करता था, लेकिन समय के साथ यह इलाका एक विकसित गांव के रूप में फैल गया।
बंजारे के शिविर से हुई थी गांव की शुरुआत
स्थानीय निवासी नरेंद्र आबूसरिया के मुताबिक, पूर्णिमा की एक खास रात को बंजारा सरदार आबूजी का जत्था इसी भूभाग पर रुका हुआ था। इसी दौरान उनकी पत्नी ने चौथे बच्चे के रूप में एक बेटे को जन्म दिया, जिससे पूरा परिवार और कारवां बेहद आनंदित हो उठा। इस खुशी को मनाने और आम लोगों की भलाई के लिए आबूजी ने वहां एक जलस्रोत यानी कुएं का निर्माण कार्य शुरू करवाया। वर्तमान समय में इस ऐतिहासिक कुएं को बोड़िया कुआं के नाम से पुकारा जाता है और इसी को आबूसर नाम की उत्पत्ति का मुख्य आधार माना जाता है। इसके अलावा, बीरबल सिंह आबूसरिया द्वारा रचित पुस्तक ‘गाथा एक गांव की’ में भी इस बात का विस्तार से जिक्र मिलता है कि पुराने दौर में यह व्यापारिक रूट पर यात्रा करने वाले बंजारों के काफिलों का पसंदीदा विश्राम स्थल हुआ करता था। यहां आसानी से पानी मिलने के कारण दूर-दूर से आने वाले यात्री और व्यापारी रुकते थे, जो धीरे-धीरे इस बंजर और खुली जगह को एक स्थायी आबादी में तब्दील कर गए।
कृषि विज्ञान केंद्र के जरिए मिली राष्ट्रीय पहचान
आज के समय में आबूसर की सबसे बड़ी विशेषता यहां संचालित होने वाला कृषि विज्ञान केंद्र यानी केवीके है। इस महत्वपूर्ण केंद्र की स्थापना 30 मार्च 1990 को कुल 72.20 हेक्टेयर भूमि के विशाल भूभाग पर की गई थी। यह संस्थान आसपास के जिलों के किसानों को खेती की अत्याधुनिक विधियां, उत्तम क्वालिटी के बीज और कम लागत में अधिक पैदावार हासिल करने के गुर सिखाने में अहम भूमिका निभा रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक एवं प्रभारी डॉ. दयानंद की जानकारी के अनुसार, इस केंद्र ने साल 2006 और 2024 के दौरान बीज उत्पादन और कुल आय अर्जन के मामले में पूरे देश में पहला स्थान प्राप्त किया है। यहां मुख्य रूप से बाजरा, सरसों, ग्वार और मूंगफली जैसी कम पानी की खपत वाली फसलों पर वैज्ञानिक अनुसंधान किए जाते हैं। इसके साथ ही किसानों को ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक सिंचाई प्रणालियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है, ताकि वे खेतों में नए प्रयोगों को आसानी से अपना सकें।
शिक्षा और उन्नत खेती का बेहतरीन संगम
आबूसर गांव की पहचान केवल कृषि तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह शैक्षणिक रूप से भी काफी आगे है। लगभग 5 हजार की आबादी वाले इस गांव की कुल साक्षरता दर करीब 89 प्रतिशत दर्ज की जाती है, जो इसे ग्रामीण स्तर पर एक आदर्श गांव बनाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां अमूमन हर घर में कम से कम एक व्यक्ति स्नातक की डिग्री प्राप्त कर चुका है और कई घरों के युवा विभिन्न सरकारी तथा प्रतिष्ठित निजी नौकरियों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। हालांकि, कृषि आज भी यहां के अधिकांश परिवारों की आजीविका का मुख्य जरिया बनी हुई है। बाजरा, गेहूं, चना, सरसों, ग्वार, मूंग और मोठ इस क्षेत्र की प्रमुख फसलें हैं। मौजूदा समय में आबूसर ग्राम पंचायत के दायरे में आबूसर के अलावा दुर्जनपुरा और अणगासर गांव भी शामिल हैं। पंचायत प्रशासक रोहिताश कुमार के अनुसार, ये तीनों बस्तियां मिलकर पंचायत क्षेत्र का निर्माण करती हैं। इसके अतिरिक्त, गांव की सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था प्रसिद्ध नेतदादा मंदिर से भी गहरी जुड़ी हुई है। इस तरह एक अदृश्य कुएं की खुदाई से शुरू हुई आबूसर की यह यात्रा आज कृषि विज्ञान के सबसे बड़े राष्ट्रीय मंचों तक अपनी पहुंच बना चुकी है, जहां कभी बंजारे पानी की तलाश में रुकते थे, वही भूमि आज आधुनिक खेती के जरिए पूरे इलाके के किसानों की तकदीर बदलने का काम कर रही है।


















