झारखंड की समृद्ध जनजातीय लोक कलाओं में ऐसी कई अनूठी विधाएं शामिल हैं जो सदियों के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए हैं। इन्हीं में से एक बेहद आकर्षक और दुर्लभ लोक नृत्य घोड़ा नाच है। इस प्रस्तुति की सबसे बड़ी खूबी इसका खास ढांचा है, जिसे बेहद कारीगरी के साथ तैयार किया जाता है। नर्तक इस बनावटी घोड़े के मध्य भाग में स्वयं को स्थापित करता है और फिर विभिन्न मुद्राओं में थिरकते हुए दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। देखने में यह दृश्य जितना अनोखा प्रतीत होता है, उतना ही यह पारंपरिक विरासत के गहरे रंगों को भी उजागर करता है।
राजाओं की विजय और मांगलिक प्रसंगों से जुड़ा ऐतिहासिक महत्व
स्थानीय कलाकार दिनेश इस नृत्य की ऐतिहासिक जड़ों पर रोशनी डालते हुए समझाते हैं कि यह आदिवासी बिरादरी की एक अत्यंत प्राचीन विधा है। इसकी वास्तविक काल-गणना करना यद्यपि संभव नहीं है, परंतु यह निश्चित तौर पर हजारों वर्ष पुरानी परिपाटी है। प्राचीन काल में जब नरेश अथवा शासक युद्ध में विजय प्राप्त कर अपने क्षेत्र में लौटते थे, तब उनके विजयोत्सव तथा भव्य अगवानी के लिए इसी शैली में विशेष स्वागत नृत्य किया जाता था। समय बीतने के साथ यह कला वैवाहिक संस्कारों और अन्य सामुदायिक उत्सवों के आयोजनों का भी एक अनिवार्य हिस्सा बन गई।
विलुप्ति की दहलीज पर पहुंची विधा और नई पीढ़ी में विस्मृति
बदलते दौर के साथ इस प्राचीन लोक कला के अस्तित्व पर संकट गहराने लगा है। दिनेश के अनुसार, वर्तमान स्थिति यह है कि समाज के लगभग 90 प्रतिशत लोगों को इस पारंपरिक विधा की जानकारी तक नहीं रह गई है। लोक धरोहर को विस्मृति के गर्त में जाने से बचाने के उद्देश्य से कलाकार निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। वे प्रत्येक विवाह समारोह, स्थानीय मेलों और पारंपरिक आखड़ा परिसरों में जाकर इसकी प्रस्तुतियां दे रहे हैं। इसके माध्यम से कलाकारों का ध्येय जनमानस को यह स्मरण कराना है कि यह हमारी हजारों साल पुरानी पैतृक धरोहर है, जिसकी रक्षा के लिए सामूहिक स्तर पर आगे आना आवश्यक है।
पारंपरिक सामग्री और शिल्पकला से तैयार होता है मजबूत ढांचा
प्रस्तुति में प्रयुक्त होने वाले घोड़े की संरचना को बनाने की विधि भी अपने आप में काफी दिलचस्प है। इस ढांचे को तैयार करने में मिट्टी, सूती कपड़ा और गेहूं के भूसे का उपयोग किया जाता है। इन सभी सामग्रियों के मिश्रण से एक बेहद ठोस परत तैयार होती है, जो बच्चों के परीक्षा देने वाले मजबूत कार्डबोर्ड जैसी सख्त बन जाती है। पूरे ढांचे को भीतर से मजबूत सहारा देने के लिए बांस की खपच्चियों का ढांचा तैयार किया जाता है। बाहरी सतह पर बारीक व आकर्षक पारंपरिक चित्रकारी उकेरी जाती है। यह बनावट इतनी टिकाऊ होती है कि नृत्य के दौरान झटके लगने पर भी आसानी से क्षतिग्रस्त नहीं होती।
ढांचे के भीतर खुद को बांधकर प्रस्तुति देते हैं नर्तक
इस विधा के प्रदर्शन का तरीका भी काफी श्रमसाध्य और व्यवस्थित होता है। कलाकार पहले घोड़े का स्वरूप तैयार करते हैं और फिर उसके बीच में खड़े होकर स्वयं को उस ढांचे के साथ सुरक्षित रूप से बांध लेते हैं। इसके बाद लयबद्ध ताल पर नृत्य की मुद्राएं प्रदर्शित की जाती हैं। कलाकारों की एकमात्र अभिलाषा यही है कि पीढ़ियों पुरानी यह विरासत अपनी पहचान न खोए। इसी उद्देश्य से वे रात-दिन पसीना बहा रहे हैं और बड़े सार्वजनिक मेलों से लेकर विभिन्न सामाजिक जलसों में अपनी कला का प्रदर्शन कर इस परंपरा को नवजीवन दे रहे हैं।



















