अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर मंडराते युद्ध के बादलों और आर्थिक अनिश्चितताओं के दौर में भारत चौथी बार ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आयोजन को पूर्व राजदूत महेश सचदेव ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के हित में एक बेहद निर्णायक मोड़ करार दिया है। उनका मानना है कि वर्तमान समय में दुनिया जिस तरह से रूस और यूक्रेन के बीच जारी सैन्य संघर्ष, अमेरिका तथा ईरान के मध्य बढ़ते तनाव, सख्त व्यापारिक प्रतिबंधों और आपूर्ति प्रणालियों में आई बाधाओं से जूझ रही है, उसमें ब्रिक्स का यह मंच एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित होने वाला यह सम्मेलन न केवल वैश्विक समस्याओं पर नए दृष्टिकोण प्रस्तुत करेगा, बल्कि विकासशील और विकसित देशों के बीच संवाद स्थापित करने का सशक्त माध्यम भी बनेगा।
वैश्विक आर्थिक दबाव और आपूर्ति श्रृंखला के संकट
मौजूदा दौर में चल रहे अंतरराष्ट्रीय संघर्ष केवल संबंधित देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि इनका नकारात्मक प्रभाव पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। रूस और यूक्रेन के युद्ध के साथ-साथ मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच गहराते विवाद ने दुनिया भर में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता को प्रभावित किया है। इसके कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, खाद्यान्न और कृषि के लिए आवश्यक उर्वरकों की दरों पर अत्यधिक दबाव बना है। पूर्व राजदूत महेश सचदेव का कहना है कि इन संकटों को समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जितने भी प्रयास किए गए हैं, वे अब तक अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सके हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि संघर्ष में शामिल कोई भी पक्ष ऐसे किसी समझौते पर सहमत नहीं हो सका है जो सभी पक्षों को समान रूप से स्वीकार्य हो। इस गतिरोध ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है।
व्यापारिक प्रतिबंध और वैश्विक मंदी की आशंका
आर्थिक मोर्चे पर विभिन्न देशों द्वारा लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों और व्यापार नीति में आए कड़े बदलावों ने वैश्विक आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर दिया है। अमेरिका द्वारा लागू किए गए विभिन्न प्रतिबंधों और संरक्षणवादी व्यापारिक कदमों से उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर अत्यधिक बोझ पड़ा है। इन परिस्थितियों ने दुनिया भर में आर्थिक मंदी की आशंकाओं को और अधिक गहरा कर दिया है। महेश सचदेव के अनुसार ऐसे तनावपूर्ण माहौल में ब्रिक्स सम्मेलन का भारत में आयोजित होना एक बड़ा अवसर है। यह मंच दुनिया की प्रमुख और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष प्रतिनिधियों को एक साथ लाकर मौजूदा आर्थिक चुनौतियों पर सीधे विचार-विमर्श करने की सुविधा देता है। भारत को अपनी मेजबानी का उपयोग इन आर्थिक रुकावटों को दूर करने और वैश्विक व्यापार को पुनर्गठित करने के लिए प्रभावी ढंग से करना होगा।
पश्चिमी देशों की आशंकाएं और संस्थागत विकल्प
पश्चिम के विकसित राष्ट्र ब्रिक्स संगठन के बढ़ते प्रभाव को हमेशा से संदेह और सतर्कता की दृष्टि से देखते आए हैं। पश्चिमी थिंक टैंकों और कूटनीतिज्ञों में यह आम धारणा रही है कि इस समूह पर चीन और रूस का दबदबा अधिक है, जिससे इसकी नीतियां पश्चिम-विरोधी दिशा में झुक सकती हैं। हालांकि ब्रिक्स ने पिछले कुछ वर्षों में अपने स्वयं के मजबूत संस्थागत तंत्र विकसित किए हैं, जिनमें न्यू डेवलपमेंट बैंक और कंटिजेंसी रिजर्व अरेंजमेंट (CRA) जैसी प्रमुख वित्तीय प्रणालियां शामिल हैं। इसके साथ ही वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने यानी डी-डॉलराइजेशन पर चल रही चर्चाओं ने पश्चिमी दुनिया में गहरी चिंता पैदा कर दी है। उन्हें डर है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से स्थापित वैश्विक वित्तीय ढांचा और पश्चिमी संस्थाओं का वर्चस्व अब इस नए विकल्प से सीधे तौर पर चुनौती प्राप्त कर रहा है।
भारत की कूटनीतिक भूमिका और मध्यस्थ के रूप में पहचान
इन जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच भारत की स्थिति अत्यंत अनूठी और प्रभावी बन जाती है। महेश सचदेव का स्पष्ट रूप से मानना है कि भारत न तो ब्रिक्स के भीतर किसी पश्चिम-विरोधी एजेंडे का हिस्सा बनता है और न ही वह पश्चिमी देशों के किसी पारंपरिक गुट का अंधानुकरण करता है। यही तटस्थता और स्वतंत्र विदेश नीति भारत को ब्रिक्स और पश्चिमी दुनिया के बीच एक मजबूत कूटनीतिक पुल बनाने की अद्वितीय क्षमता प्रदान करती है। भारत इस सम्मेलन के दौरान आने वाले संयुक्त प्रस्तावों और घोषणा पत्रों को एक संतुलित, व्यावहारिक और सर्वसमावेशी दिशा दे सकता है। भारत की कोशिश होगी कि ब्रिक्स का रुख किसी एक ध्रुव के समर्थन या विरोध में जाने के बजाय सीधे समस्याओं के यथार्थवादी समाधान की ओर केंद्रित रहे।
औपचारिक वार्ताओं से आगे व्यावहारिक समाधान की आवश्यकता
18वें ब्रिक्स सम्मेलन में यूक्रेन युद्ध, अमेरिका और ईरान के संबंध तथा वैश्विक टैरिफ विवादों पर गहन चर्चा होने की पूरी संभावना है। पूर्व राजदूत ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि इन वैश्विक समस्याओं का हल किसी एक पक्ष के पक्षपातपूर्ण ध्रुवीकरण से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए धरातल पर लागू होने योग्य व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। भारत अपनी मेजबानी का लाभ उठाकर ऐसी पहलों को प्राथमिकता दे सकता है जो टकराव को बढ़ावा देने के स्थान पर आपसी संवाद और शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करें। ब्रिक्स संगठन उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अधिक प्रभावी भागीदारी दिलाने का एक मजबूत जरिया बन सकता है। भारत के पास यह सुनहरा मौका है कि वह इस सम्मेलन को मात्र एक औपचारिक बैठक तक सीमित न रखकर वैश्विक स्थिरता, वित्तीय सुधारों और आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुदृढ़ता के लिए एक ऐतिहासिक मंच के रूप में स्थापित करे।





















