विज्ञापन और प्रचार सामग्री की लगातार बढ़ती जरूरत ने बैनर और फ्लेक्स निर्माण को एक टिकाऊ स्वरोजगार का रूप दे दिया है। बोकारो जिले के पेटरवार में ब्रदर फ्लेक्स प्रिंटिंग का संचालन करने वाले लकी पिछले 5 वर्षों से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनका अनुभव बताता है कि नया कारोबार शुरू करने की इच्छा रखने वाले युवाओं को शुरुआत में ही भारी-भरकम पूंजी फंसाने की जरूरत नहीं होती, बल्कि समझदारी भरी योजना के साथ कदम दर कदम आगे बढ़ा जा सकता है।
शुरुआती आउटसोर्सिंग मॉडल और तीस हजार का निवेश
लकी के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पास सीमित पूंजी है, तो वह बिना अपनी प्रिंटिंग मशीन खरीदे केवल आउटसोर्सिंग पद्धति से काम की शुरुआत कर सकता है। इस व्यवस्था को खड़ा करने के लिए लगभग 30 हजार रुपये की आरंभिक पूंजी पर्याप्त होती है। इस बजट में एक छोटा कमरा किराए पर लेकर उसमें बुनियादी कंप्यूटर सेटअप तैयार किया जा सकता है। संचालक के पास ग्राफिक्स और डिजाइनिंग से जुड़ी बुनियादी समझ होना बेहद जरूरी है, जिससे वह ग्राहक की आवश्यकता के अनुसार डिजाइन तैयार कर सके और छपाई का काम बाहरी प्रिंटिंग प्रेस से करवा सके।
खुद का प्रिंटिंग सेटअप लगाने की चरणबद्ध लागत
जब काम में निरंतरता आ जाए और ग्राहक आधार मजबूत हो जाए, तब अपने खुद के प्रिंटिंग उपकरण लगाने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है। यदि कोई उद्यमी छोटे स्तर पर अपना निजी प्रिंटिंग ढांचा तैयार करना चाहता है, तो उसे करीब 5 से 6 लाख रुपये की व्यवस्था करनी होगी। दूसरी ओर, यदि कोई सीधे पेशेवर स्तर पर बड़े पैमाने का व्यवसाय खड़ा करना चाहता है, तो निवेश की राशि लगभग 20 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। इस बड़े बजट में मुख्य प्रिंटिंग मशीन के साथ-साथ कंप्यूटर सिस्टम, बिजली बैकअप के लिए इन्वर्टर, अनुकूल तापमान बनाए रखने के लिए एसी और सहायक कर्मचारियों का खर्च शामिल होता है।
बाजार में मांग और संभावित ग्राहकों का दायरा
फ्लेक्स और बैनर के क्षेत्र में ग्राहकों की कमी नहीं होती क्योंकि समाज का लगभग हर तबका प्रचार पर निर्भर है। इस काम में कोचिंग संस्थान, स्कूल, सरकारी कार्यालय, चिकित्सालय, खुदरा दुकानें और स्थानीय व्यापारिक प्रतिष्ठान नियमित रूप से ऑर्डर देते रहते हैं। इसके अलावा सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों जैसे जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ और अन्य उत्सवों के लिए भी बैनर तैयार करवाए जाते हैं। व्यापार की सीधी सी नीति यही है कि जितने अधिक ऑर्डर मिलेंगे, मुनाफा उतना ही तेजी से बढ़ेगा।
मुनाफे का गणित, मासिक आमदनी और मशीन खरीद के नियम
प्रिंटिंग के इस काम में सामान्य तौर पर 25 से 30 फीसदी तक का शुद्ध लाभ मार्जिन रखा जा सकता है। हालांकि कुल आमदनी ऑर्डरों की कुल संख्या, पोस्टर के आकार और स्थानीय बाजार में प्रचलित दरों पर टिकी होती है। बिना मशीन वाले आउटसोर्सिंग मॉडल में प्रतिदिन 20 ऑर्डर मिलने पर भी महीने में 15 से 2000 हजार रुपये की कमाई की जा सकती है। वहीं 20 लाख रुपये के पूर्ण सेटअप और कुशल प्रबंधन के दम पर हर महीने करीब डेढ़ से 2 लाख रुपये तक की कमाई संभव है।
प्रिंटिंग मशीनें खरीदने के लिए मुख्य रूप से दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र के बाजार प्रमुख माने जाते हैं। उपकरण खरीदते समय केवल कीमत देखने के बजाय उसकी कार्यक्षमता, वारंटी, सर्विसिंग की सुविधा, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और नियमित रखरखाव की लागत की बारीकी से पड़ताल करना जरूरी होता है। इसके साथ ही ग्राहकों से बेहतर संवाद और समय पर आपूर्ति बनाए रखना व्यवसाय को लंबे समय तक सफल रखने की बुनियादी शर्त है।





















