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पश्चिम बंगाल के रानीगंज में रेलवे की जमीन पर चला बुलडोजर, मुआवजे को लेकर गरमाया विवादपश्चिम बंगाल
31 अग॰ 2026, 8:29 pm (12 दिन पहले)· 3

पश्चिम बंगाल के रानीगंज में रेलवे की जमीन पर चला बुलडोजर, मुआवजे को लेकर गरमाया विवाद

पश्चिम बंगाल के रानीगंज के साहेबगंज इलाके में रेलवे लाइन के विस्तार के लिए प्रशासन ने भारी सुरक्षा के बीच एक मकान पर बुलडोजर चला दिया। मकान मालिक का आरोप है कि उन्हें पूरा मुआवजा नहीं मिला है, जिसके कारण स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी और विवाद पैदा हो गया है।

पश्चिम बंगाल के रानीगंज में रेलवे लाइन के विस्तार की परियोजना के तहत सोमवार दोपहर को साहेबगंज इलाके में प्रशासन की मौजूदगी में अतिक्रमण हटाने की एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया गया। इस दौरान बाईपास के किनारे भारी पुलिस बल और केंद्रीय सुरक्षा बलों के कड़े पहरे के बीच एक आवासीय मकान को बुलडोजर की मदद से पूरी तरह से जमींदोज कर दिया गया। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे।

रेलवे विस्तार के लिए अधिग्रहित की गई थी जमीन

प्राप्त जानकारी के अनुसार, साहेबगंज और उसके आसपास के बड़े क्षेत्र को रेलवे लाइन के दोहरीकरण या विस्तार कार्य के लिए पहले ही आधिकारिक रूप से अधिग्रहित किया जा चुका है। इस प्रक्रिया के तहत ज्यादातर खाली जमीनों और ढांचों को पहले ही हटाया जा चुका था, लेकिन कुछ आवासीय मकान अब तक अपनी जगह पर टिके हुए थे। सोमवार को प्रशासन ने इसी कड़ी में एक बचे हुए मकान को बुलडोजर से गिराने की कार्रवाई पूरी की।

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मुआवजे को लेकर मकान मालिक और परिवार का दर्द

दूसरी ओर, इस पूरी कार्रवाई के बीच मकान मालिक ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि प्रशासन और रेलवे की तरफ से उन्हें उनकी जमीन और मकान का पूरा मुआवजा अभी तक नहीं दिया गया है। इसके बावजूद उन्हें अपना घर खाली करने के लिए विवश किया गया। जब बुलडोजर ने घर पर अपनी पहली कार्रवाई की, तो दीवारें ढह गईं और देखते ही देखते पूरी इमारत मलबे के ढेर में तब्दील हो गई। इस मंजर को देखकर परिवार के सदस्य और वहां मौजूद लोग काफी मायूस और असहाय नजर आए।

प्रशासनिक अमला और भारी सुरक्षा बल रहा मौजूद

सोमवार की दोपहर अचानक जब बुलडोजर इस मकान के सामने पहुंचा, तो वहां हड़कंप मच गया। इस अभियान के दौरान आसनसोल-दुर्गापुर पुलिस कमिश्नरेट के कई वरिष्ठ अधिकारी और अन्य प्रशासनिक पदों पर बैठे नुमाइंदे मौके पर डटे हुए थे। रेलवे प्राधिकारियों के आग्रह पर केंद्र से भेजे गए सुरक्षा बलों को भी तैनात किया गया था। इस चौतरफा सुरक्षा घेरे और भारी बंदोबस्त के बीच ही तोड़फोड़ की इस कार्रवाई को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया गया।

स्थानीय स्तर पर सुलग उठा विरोध का स्वर

इस घटना के बाद से साहेबगंज के स्थानीय निवासियों में गहरा रोष व्याप्त है और कई तरह के गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। लोगों का तर्क है कि यदि मुआवजे के भुगतान को लेकर मकान मालिक की तरफ से कोई वैध आपत्ति या विवाद लंबित था, तो उसका पूर्ण समाधान निकाले बिना इतनी जल्दबाजी में घर को ढहाना कहां तक उचित है। इस सवाल ने पूरे इलाके में चर्चा का एक नया दौर शुरू कर दिया है।

विकास कार्य और विवादों के बीच फंसा साहेबगंज

प्रशासनिक गलियारों से जुड़े सूत्रों का ऐसा मानना है कि रेलवे लाइन के इस महत्वपूर्ण विस्तार कार्य को तय समयसीमा के भीतर तेजी से पूरा करने के लिए ही सभी अधिग्रहित जमीनों को फौरन खाली कराया जाना जरूरी था। हालांकि, एक तरफ रेलवे और प्रशासन की यह तेज रफ्तार कार्रवाई है, तो दूसरी तरफ मकान मालिक द्वारा मुआवजा न मिलने का गंभीर दावा है। इन दोनों पक्षों के बीच उपजे इस असमंजस ने रानीगंज के साहेबगंज में एक नया और बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है, जिस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

सवाल-जवाब

रानीगंज के किस इलाके में बुलडोजर कार्रवाई की गई?
यह कार्रवाई रानीगंज के साहेबगंज इलाके में बाईपास के किनारे की गई।
यह तोड़फोड़ किस उद्देश्य से की गई थी?
यह कार्रवाई रेलवे लाइन के विस्तार और विकास कार्यों के लिए अधिग्रहित जमीन को खाली कराने के लिए की गई थी।
मकान मालिक का मुख्य आरोप क्या है?
मकान मालिक का आरोप है कि उन्हें उनके मकान और जमीन का पूरा मुआवजा अभी तक नहीं मिला है।
कार्रवाई के दौरान कौन-कौन से सुरक्षा बल तैनात थे?
मौके पर भारी पुलिस बल के साथ-साथ केंद्रीय बलों की भी तैनाती की गई थी।
इस कार्रवाई में कौन से प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे?
आसनसोल-दुर्गापुर पुलिस कमिश्नरेट के वरिष्ठ अधिकारी और अन्य प्रशासनिक नुमाइंदे मौके पर मौजूद थे।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·11 दिन पहले

रेलवे विस्तार परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण और मुआवजे के भुगतान के बीच का यह असमंजस केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई राज्यों में ढांचागत विकास के दौरान गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक संकट पैदा करता है। जब तक विस्थापन और मुआवजे के मामलों का पारदर्शी तरीके से अंतिम निपटारा नहीं होता, तब तक ऐसी त्वरित कार्रवाई से स्थानीय जनता और प्रशासन के बीच अविश्वास और विरोध की खाई गहरी होती जाएगी, जिसका असर भविष्य की अन्य परियोजनाओं पर भी पड़ना तय है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·11 दिन पहले

एक अपराध और कानूनी मामलों के संवाददाता के रूप में मेरा अनुभव यह बताता है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम और रेलवे अधिनियम के तहत जब तक विस्थापितों को अवार्ड की पूरी राशि का भुगतान नहीं होता, तब तक ऐसी दंडात्मक या ध्वस्तीकरण कार्रवाई कानूनी विवादों का नया दौर शुरू कर देती है। यदि प्रभावित परिवार इस मामले में उच्च न्यायालय का रुख करता है, तो यह प्रशासनिक और पुलिस बल की तैनाती के बावजूद परियोजना की गति को अनिश्चित काल के लिए रोक सकता है। इसके अलावा, बिना पुनर्वास और पूर्ण मुआवजे के ऐसी जल्दबाजी में की गई कार्रवाई से कानून-व्यवस्था की स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है, जिससे भविष्य में स्थानीय स्तर पर और कड़ा प्रतिरोध देखने को मिल सकता है।

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