देश में 1975 के आपातकाल की याद एक बार फिर ताज़ा हो गई है। राजनाथ सिंह ने सोशल मीडिया मंच X पर एक पोस्ट साझा करते हुए उस दौर को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे स्याह अध्याय करार दिया। उन्होंने लिखा कि आज ही के दिन 1975 में देश पर आपातकाल थोपा गया था, और यही वजह है कि यह तारीख लोकतंत्र के लिए एक कठिन याद बनकर रह गई है।
राजनाथ सिंह ने क्या कहा
अपनी पोस्ट में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आपातकाल आज भी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में गिना जाता है। उनके मुताबिक उस दौर में बोलने और अपनी बात रखने की आज़ादी, यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधी रोक लगा दी गई थी। उन्होंने यह भी बताया कि उस समय न्यायपालिका को नियंत्रित करने और उसे कमज़ोर करने की कोशिशें की गईं।
उनकी इस पोस्ट का लहजा बताता है कि वे आज की पीढ़ी को उस दौर की सच्चाई से जोड़ना चाहते हैं, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों की अहमियत समझी जा सके।
आपातकाल को लेकर बहस क्यों
हर साल 25 जून को आपातकाल की वर्षगांठ पर सियासी और सामाजिक स्तर पर इसकी चर्चा तेज़ हो जाती है। इसे लोकतंत्र पर लगे एक ऐसे ग्रहण के तौर पर देखा जाता है, जब आम नागरिक के बुनियादी अधिकार सीमित कर दिए गए थे। राजनाथ सिंह की पोस्ट इसी सिलसिले की एक कड़ी है, जिसमें उस दौर की ज्यादतियों की ओर ध्यान दिलाया गया है।
पृष्ठभूमि
खबरों के मुताबिक, 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी, जिसे भारतीय लोकतंत्र के सबसे विवादित और मुश्किल दौर में गिना जाता है। इस दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर कड़ी पाबंदियां लगाई गई थीं। हाल के वर्षों में सरकार ने इसकी 50वीं वर्षगांठ को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में याद करने की पहल की है, ताकि लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई जा सके। अमित शाह जैसे नेताओं ने इसे सत्ता बचाने के लिए उठाया गया कदम बताया है, वहीं नरेंद्र मोदी पहले भी उस दौर को देश के लिए अंधकारमय और न भूलने वाला बता चुके हैं।
जनता की प्रतिक्रिया
इस पोस्ट पर लोगों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई यूज़र्स ने उस दौर को लोकतंत्र के लिए तानाशाही भरा बताते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प दोहराया, तो कुछ ने आपातकाल का विरोध करने वाले लोगों को याद कर उन्हें नमन किया।




















