खुशी अक्सर बड़े मौकों में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी चीजों में छिपी होती है — और ओडिशा के एक शारीरिक शिक्षा शिक्षक ने इसी सोच को अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया है। स्कूल की ड्यूटी निपटाने के बाद यह टीचर अपना कैमरा उठाता है और सड़कों पर निकल पड़ता है। किसी मजदूर, किसी राहगीर या किसी गरीब बुजुर्ग को उसकी रोजमर्रा की जिंदगी जीते हुए वह चुपचाप कैमरे में कैद कर लेता है, फिर अपने ही पैसों से उस तस्वीर को फ्रेम (लैमिनेट) कराता है और उसे एक अनमोल तोहफे की तरह वापस उसी इंसान के हाथ में थमा देता है। इस अनोखी मुहिम का नाम है ‘तिकिए खुसी’, यानी ‘एक छोटी सी खुशी’।
कौन हैं इस कहानी के नायक
इस भावुक पहल के पीछे का चेहरा हैं रंजन पात्रा। रंजन ‘ओडिशा आदर्श विद्यालय’ में एक युवा पीटी मास्टर यानी शारीरिक शिक्षा शिक्षक हैं। दिनभर बच्चों को खेलकूद और अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले रंजन के भीतर एक कलाकार भी बसता है — एक ऐसा शख्स जिसका दिल फोटोग्राफी के लिए धड़कता है।
आमतौर पर शौकिया फोटोग्राफर शानदार शादियों, खूबसूरत वादियों या मशहूर चेहरों को कैमरे में उतारकर लाखों रुपये कमाते हैं। लेकिन रंजन ने अपने लेंस का रुख ठीक उल्टी दिशा में मोड़ दिया — उन चेहरों की ओर, जिन्हें मुख्यधारा का समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। सड़क पर झाड़ू लगाने वाले, खेतों में पसीना बहाने वाले और किसी कोने में अपनी गरीबी के साथ जिंदगी काट रहे आम और अनजान लोग ही उनकी तस्वीरों के असली ‘हीरो’ हैं।
2020 में लगी थी नींव, अब तक 1,000 से ज्यादा तोहफे
रंजन ने इस सिलसिले की शुरुआत साल 2020 में की थी। बीते 6 सालों में वे अपनी जेब से खर्च कर 1,000 से ज्यादा लोगों को उनकी लैमिनेटेड तस्वीरें भेंट कर चुके हैं। इसके पीछे उनका इरादा बेहद साफ है।
रंजन बताते हैं कि कई बुजुर्गों और गरीब ग्रामीणों के पास अपनी पूरी जिंदगी में एक भी ऐसी तस्वीर नहीं होती, जिसे वे याद के तौर पर संभालकर रख सकें। जब वे ऐसे किसी इंसान को उसके अपने ही काम में डूबे हुए — मसलन मुर्गियों को दाना खिलाते या यूं ही मुस्कुराते हुए — कैमरे में कैद करते हैं, तो दरअसल वे उसकी जिंदगी का एक पल हमेशा के लिए अमर कर देते हैं। लैमिनेशन की वजह से कागज का यह टुकड़ा सालों-साल खराब नहीं होता और घर की दीवार की शान बन जाता है।
मुर्गियों को दाना खिलाते बुजुर्ग की वह तस्वीर
रंजन के काम की खूबसूरती को समझना हो तो उनकी खींची एक तस्वीर पर गौर कीजिए। इसमें एक बेहद साधारण बुजुर्ग ग्रामीण जमीन पर उकड़ू बैठे हैं और बांस के सूप से अपनी मुर्गियों तथा नन्हे चूजों को दाना खिला रहे हैं। बगल में एक पुरानी साइकिल खड़ी है और पीछे लकड़ियों का ढेर लगा है। बिना किसी बनावट के, ठेठ ग्रामीण भारत के सीधे-सादे जीवन का यह एक ऐसा शॉट है जिसे रंजन ने उस बुजुर्ग के बिल्कुल प्राकृतिक अंदाज में उतारा।
जब अपनी ही तस्वीर देख छलक उठीं आंखें
कहानी का सबसे भावुक मोड़ तब आता है, जब रंजन उसी तस्वीर को प्रिंट और लैमिनेट कराकर दोबारा उस बुजुर्ग तक पहुंचते हैं। एक दूसरी तस्वीर में हरे रंग की शर्ट पहने खुद रंजन उस बुजुर्ग के घर के बाहर खड़े नजर आते हैं, और बुजुर्ग के हाथ में वही लैमिनेटेड फोटो है जो पहले रंजन ने खींची थी। अपनी ही सुंदर तस्वीर को हाथ में थामे उस बुजुर्ग के चेहरे पर जो अचरज और गर्व झलकता है, उसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल है। उनके साथ परिवार की दो छोटी बच्चियां भी खड़ी हैं, जिनके चेहरे पर एक अनजानी-सी खुशी तैर रही है। यह महज एक फोटो का लेन-देन नहीं, बल्कि एक इंसान की ओर से दूसरे इंसान को दिया गया ‘सम्मान’ है — वही खुशी, जो दरअसल छोटी-छोटी चीजों में बसती है।
एक भी पैसा नहीं लेते रंजन
खास बात यह है कि इस पूरे काम के बदले रंजन किसी से एक नया पैसा नहीं लेते। स्कूल की नौकरी से मिलने वाली सैलरी का ही एक हिस्सा वे इन अजनबियों की ‘तिकिए खुसी’ यानी छोटी सी खुशी के लिए डिजिटल प्रिंटिंग और लैमिनेशन पर खर्च कर देते हैं। उनके इसी निस्वार्थ जज्बे ने आज ओडिशा के सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय गलियारों तक खूब सुर्खियां बटोरी हैं।













